Friday, August 19, 2022

‘तन्हा सेल’ में रखे गए हैं स्वतंत्र पत्रकार रुपेश कुमार सिंह

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जनपक्षीय पत्रकारिता कोई फूलों का सेज नहीं है, रूपेश जी ने यह ठीक ही कहा था जब पिछले साल पेगासस जासूस मामले में उनका नाम आया था। हम इसे प्रूफ होता लगातार 17 जुलाई 2022 से देख सकते हैं, हमने देखा किस तरह से एक जमीनी पत्रकारिता करने वाले पत्रकार के घर में बिल्कुल सुबह 5:25 बजे भारी संख्या में पुलिस फोर्स पहुंचती है, बड़ी विनम्रता के साथ वे सर्च वारंट दिखाकर पूरे घर का सामान उथल पुथल कर देती है और अंत में अपनी धोखेबाज नीति के तहत अरेस्ट वारंट दिखाकर एक पत्रकार को अपने साथ ले जाती है  जिस अरेस्ट वारंट को उन्हें पहले दिखाना चाहिए था। कहने को और दिखाने को तो वह सरायकेला खरसावां की पुलिस रहती है पर उसी छल नीति के तहत उनके पीछे आईबी, एसआईबी, एनआईए की टीम घुसी रहती है जो बाद में पूछताछ भी करती है। 

27 घंटे के बाद कोर्ट में पेश करने के बाद जब जेल भेजा जाता है तब एक अज्ञात शख्स की तरह जेल प्रशासन उन्हें उन लोगों के बीच रख देता है जो टीबी, हेपेटाइटस बी, और कुष्ठ रोग जैसी संक्रामक बीमारी से ग्रसित हैं। गोया इन्हें उन बीमारियों के संक्रमण की कोई जानकारी ही न हो। हमारे विरोध करने का उन्हें इंतजार करना पड़ा। खैर फिर चार दिन का पुलिस रिमांड और उसके बाद शनिवार 23 जुलाई से जेल में। लेकिन अबकी जब वे जेल गए हैं तो जेल प्रशासन पूरा जागरूक हो गया है, इसलिए अब उन्हें ऐसी जगह रखा गया हैं जहां एक भी इंसान नजर न आए, जेल प्रशासन का कहना है कि उन्हें कोरेंटाइन में रखा गया है, अगर यह सच भी है तो कारेंटाइन के लिए उन्हें ऐसी जगह रखा गया है जहां दूर दूर तक एक भी इंसान नजर नहीं आते, चाहे तो हम उसे तन्हा सेल भी कह सकते हैं। जबकि कैदी उसे भूत बंगला कहते हैं।

बहुत पहले कभी वह महिला वार्ड हुआ करता था लेकिन अब जर्जर स्थिति में हैं। बिना इंसानी दुनिया के सामाजिक प्राणी का एकदम तन्हा रहना कितना मुश्किल हो सकता है कोई भी इस बात को आसानी से समझा सकता है, उस जगह रूपेश को 15 दिनों तक रखा जाएगा या आगे भी किसी को नहीं पता। आपको बता दें कि जेल में खाने की व्यवस्था भी बिल्कुल खराब है। जेल मैनुअल के हिसाब से कुछ नहीं दिया जा रहा है। साथ ही उनको मिलने वाले खाने की क्वालिटी भी एकदम खराब है।

जेल प्रशासन के इस खास मुश्तैदी और कोरेंटाइन के तरीके के पीछे का सच हम समझ सकते हैं। एक जन पक्षधर पत्रकार पर झूठे आरोप लगाकर उसके मस्तिष्क के साथ मानसिक प्रताड़ना का यह खेल किसी के लिए भी समझना मुश्किल नहीं है। जब पुलिस प्रशासन सत्ता के इशारे पर एक पत्रकार पर झूठा आरोप लगाकर, उसे कुख्यात करार देकर और एक बड़े अपराधी की तर्ज पर व्यवहार करके भी उसकी हिम्मत, लेखनी के प्रति प्रतिबद्धता और उसके साहस को नहीं तोड़ सकी तब उसने मानसिक तनाव पैदा करने के इस तरीके को अख्तियार किया है। आगे और क्या-क्या तरीके अपनाए जाएंगे अभी वो देखने बाकी हैं। हम देखेंगे कि विचारों और कलम से डरी सत्ता किस हद तक गिर सकती है और अपनी छल नीति को कब तक नियम कानून के आवरण में छुपा सकती है।

क्योंकि हमें इस बात की न केवल पूरी उम्मीद है बल्कि पूरा भरोसा भी है कि हमें हमेशा ऐसा ही नहीं देखना पड़ेगा। वह दिन भी आएगा जब इस छल का पर्दाफाश होगा, हम  अपने इन जन पक्षधरों को आजाद देखेंगे, इन्हें प्रताड़ित करने वालों को भी उनके गुनाहों की सजा मिलेगी। तमाम जन पक्षधरों को वाकई में स्वतंत्र देखेंगे, उम्मीद है वह सुबह कभी तो आएगी। वह सुबह हमीं से आयेगी। 

(इलिका प्रिय युवा लेखिका हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहती हैं।)

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