गुरमीत राम रहीम के सत्संग और अमृतपाल की खिलाफत: ‘काले दिनों’ के मुहाने पर पंजाब

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भारत का सबसे प्रमुख दक्षिणपंथी दल भारतीय जनता पार्टी है और इस वक्त केंद्र की शासन-व्यवस्था नरेंद्र मोदी की अगुवाई में उसके हाथों में है। कई राज्यों में नापाक गठजोड़ और धनबल के बूते भाजपा की सरकारें हैं। दिल्ली से सटा हरियाणा भी उनमें से एक है। हरियाणा को ज्यादा सुर्खियां हासिल होती हैं गुरमीत राम रहीम सिंह की वजह से।

कत्ल और बलात्कार का मुजरिम गुरमीत राज्य के सिरसा स्थित विशाल-आलीशान डेरे का मुखिया बावजूद इसके है कि उसे अदालत ने उम्रकैद की सजा दी हुई है और वह रोहतक के सुनारिया जेल का सजायाफ्ता कैदी है। लेकिन एक विशिष्ठ कैदी! पैरोल और फरलों के जरिए उसे बार-बार छोड़ा जाता है और वह अपनी कारगुज़ारियों से बाज नहीं आता।

अब नंगे दिन की तरह साफ है कि उसे भाजपा का खुला संरक्षण हासिल है। पैरोल तथा फरलो जेल प्रशासन के तकनीकी शब्द हैं जिनका सार है कैदियों को चंद दिनों के लिए रिहाई, लेकिन उन कैदियों को इसके लिए बहुत लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जो बलात्कार व कत्ल सरीखे मामलों के मुजरिम होते हैं और जिनकी बाबत आशंका रहती है कि वे जेल से बाहर भेजे गए तो गड़बड़ी की आशंका है।

पैरोल तथा फरलो देना राज्य सरकार तथा मंडल व जिला प्रशासन का विशेषाधिकार है। कई कैदियों को जेल में अच्छे व्यवहार के बावजूद इस सुविधा से वंचित रखा जाता है। लेकिन जिन पर ‘सत्ता’ का हाथ होता है, ‘वंचित’ शब्द उनके लिए बेमतलब और बेकार है। डेरेदार गुरमीत राम रहीम सिंह इन्हीं में आता है।

वह एक साल की अवधि में तीन बार जेल से रिहाई ले चुका है और अब फिर 40 दिन की पैरोल पर उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बरनावा में बने अपने कथित आश्रम में है। उसकी कारगुजारियां अथवा गतिविधियां पूरी तरह पहले की मानिंद जारी हैं। फर्क आया है तो तकनीक में।

दीवारों पर साफ लिखा है कि संगीन धाराओं के तहत और सरासर समाज विरोधी माने जाने वाले इस डेरेदार को सत्तारूढ़ भाजपा का संरक्षण हासिल है। इसीलिए उसे जबरदस्त विरोध के बावजूद बार-बार किसी न किसी बहाने जेल से रिहाई दी जाती है और पंजाब तथा हरियाणा की सियासत में उबाल जाता है।

यह भी नंगे दिन की तरह साफ है कि रोहतक की सुनारिया जेल का उम्रकैद का कैदी गुरमीत राम रहीम सिंह 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों और खासकर भाजपा को पर्दे के पीछे से ‘ब्लैकमेल’ कर रहा है और संघ परिवार बाखुशी ब्लैकमेल हो रहा है। सिर्फ इसलिए कि डेरा सच्चा सौदा के पास आज भी एक निश्चित वोट बैंक है और वह कई सीटों पर हार-जीत के लिए निर्णायक साबित होता है।

कातिल और बलात्कारी तो वह कानून की नजरों में है। अपने लाखों अनुयायियों की नजर में आज भी ‘मसीहा’ है। उसके अनुयायी अंधविश्वास की जीती-जागती मिसाल हैं। ज्यादातर का मानना है कि उनके पिता (अनुयायी उसे यही कहते हैं) जेल, वहां की धरती को पवित्र करने के लिए गए हैं और उन पर लगाए गए इल्जाम झूठे हैं।

जबकि पत्रकार छत्रपति, जिनकी हत्या के आरोप में गुरमीत राम रहीम सजायाफ्ता है, के बेटे और मुख्य गवाह अंशुल छत्रपति के अनुसार, “वह (गुरमीत) आदतन अपराधी प्रवृत्ति का है और ऐसे हैवान को तो एक दिन की रिहाई भी नहीं मिलनी चाहिए।”

अगस्त 2017 को सीबीआई की विशेष अदालत ने डेरा सच्चा सौदा मुखिया को अपनी दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में सजा सुनाई थी और तब अदालत के मुख्य दरवाजे से बाहर और पंचकूला शहर की सड़कों पर खूब बवाल हुआ था। यह एक प्रयोजित दंगा था और इसमें सौ से ज्यादा लोग खेत हो गए और बेशुमार घायल।

सब जानते हैं कि यह दंगा गुरमीत राम रहीम सिंह के इशारे पर हुआ था और उसकी कथित मुंह बोली बेटी तथा हाल-फिलहाल सच्चा सौदा डेरा की संचालक हनीप्रीत कौर मुख्य सह अभियुक्त थी। लंबे अरसे तक लापता रहने के बाद उसने पुलिस के आगे आत्मसमर्पण किया था और थोड़े दिन की पुलिस तथा न्यायिक हिरासत के बाद उसे आसानी से जमानत मिल गई।

गुरमीत राम रहीम सिंह के साथ हनीप्रीत कौर

उस हिंसा का एक अन्य मुख्यारोपी आदित्य इंसा भगौड़ा करार दिया जा चुका है। कोई नहीं जानता कि उसे आसमां खा गया या जमीन निगल गई।

बलात्कार की सजा के बाद गुरमीत राम रहीम सिंह को सिरसा के पत्रकार छत्रपति की हत्या के आरोप में सजा सुनाई गई और फिर डेरे के पुराने प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या की साजिश में संलिप्त होने के लिए भी। तमाम सजाओ में वह उम्र कैद भुगत रहा है।

एक सजा पूरी होने के बाद दूसरी चलेगी और फिर तीसरी। इसका सीधा सा मतलब है कि अपने जीवित रहते गुरमीत राम रहीम सिंह जेल की सलाखों से बाहर नहीं आ सकता। सुप्रीम कोर्ट में कोई ‘चमत्कार’ हो जाए तो वह बरी भी हो सकता है।

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उसे 21 दिन की पैरोल पर छोड़ा गया। फिर हरियाणा के आदमपुर उपचुनाव एवं नगर निगम सहित स्थानीय निकायों के चुनाव आए तो उसे 30 दिन की पैरोल पर जेल की सलाखों से बाहर कर दिया गया। चंद हफ्तों के बाद ही उसे अब 40 दिन की पैरोल दी गई है।

इस बार की पैरोल में भी वह खुलकर गुल खिला रहा है। बागपत के बरनावा आश्रम में उसने अपने जन्मदिन का केक तलवार से काटा और एक वीडियो भी खूब वायरल हुआ जिसमें वह एक बोतल को फेंक रहा है; जिस पर तिरंगा बना हुआ है। पिछली पैरोल पर उसने वर्चुअल सत्संग किए थे और इस बार भी यह सिलसिला निर्बाध जारी है।

पिछली बार पंजाब में उसके सत्संग दिखाने पर सरकारी रोक थी लेकिन इस बार कोई रोक नहीं थी। यहीं यह भी बता दें कि हरियाणा में उसके वर्चुअल सत्संग में मुख्यमंत्री के ओएसडी सहित अनेक भाजपा नेता और कार्यकर्ता भी हाथ जोड़कर शामिल होते हैं। हर रविवार को बागपत से डेरेदार वर्चुअल सत्संग करता है और हरियाणा के तमाम जिलों में उसे बड़ी-बड़ी स्क्रीनों पर दिखाया जाता है।

वर्चुअल सत्संग

इस बार गौर करने लायक सबसे अहम बात यह है कि अब उसके वर्चुअल सत्संग पंजाब में भी होने लगे हैं। उनका तीखा विरोध भी। जो इसी रविवार को हिंसक झड़प में सामने आया।

पंजाब का जिला बठिंडा हरियाणा के सिरसा की सरहद से सटा हुआ है। डेरा सच्चा सौदा का पंजाब में सबसे बड़ा डेरा बठिंडा के सबालतपुरा में है। इसी डेरे से सिखों और डेरा मुखी के बीच अदावत का आगाज हुआ था। सन 2004 में गुरु गोविंद सिंह जैसी वेशभूषा धारण करके गुरमीत राम रहीम सिंह ने अपने अनुयायियों को ‘अमृतपान’ करवाया।

इससे पहले उसका झूठा प्रचार तंत्र फैला चुका था कि डेरेदार, दर्शन गुरु का ‘अवतार’ है। कहीं-कहीं कहा गया कि वह कृष्ण का अवतार है। यह समागम निश्चित तौर पर सिखों की भावनाओं को आहत करने वाला था। विश्व भर के सिख समुदाय ने इसका जबरदस्त विरोध किया। अलबत्ता शिरोमणि अकाली दल कमोबेश खामोश रहा। पंजाब की सत्ता तब उसके हवाले थी और भाजपा के साथ गठबंधन था।

भावनाओं को आहत करने की एक रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी गई लेकिन सिख इतने से न संतुष्ट होने वाले थे और न ही हुए। फिर सिलसिलेवार कई घटनाएं हुईं। गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्म के बहिष्कार के हिंसक विरोध से लेकर उसकी गाड़ी को आरडीएक्स के जरिए उड़ाने तक। सिख समुदाय उसे अपना अव्वल दुश्मन मानने लगा।

भाजपा अगर हिंदू दक्षिणपंथी दल है तो शिरोमणि अकाली दल सिख दक्षिणपंथी दल। दोनों भीतर ही भीतर गुरमीत राम रहीम सिंह को शह देते रहे। इसके पीछे मुख्य वजह हरियाणा और पंजाब की लगभग 30 विधानसभा सीटों पर डेरा अनुयायियों के निर्णायक मत हैं।

इसीलिए दोषी करार दिए जाने से पहले शिरोमणि अकाली दल, भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस के दिग्गज नेता भी इस हत्यारे और बलात्कारी डेरेदार के आगे सरेआम मत्था रगड़ते रहे हैं और चढ़ावे के रूप में मोटी रकम भी। एवज में गुरमीत राम रहीम सिंह तय करता था कि किस सीट पर किस पार्टी के प्रत्याशी को अनुयायियों के वोट दिलवाने हैं। सच्चा सौदा डेरा ने इसके लिए बाकायदा अपना एक राजनीतिक विंग बनाया हुआ है जो आज भी सक्रिय है।

अपने पिता प्रकाश सिंह बादल के साथ डेरे में कई बार जा चुके शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष, पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुखबीर सिंह बादल कहते हैं, “तब डेरे का अक्स साफ सुथरा था और हमें लगता था कि सच्चा सौदा मुख्यत: लोक भलाई के काम करता है। हम पर गलत इल्जाम है कि वोट हासिल करने के लिए हम वहां जाते थे।”

राम रहीम के डेरे में प्रकाश सिंह बादल

बड़े बादल के शुरुआती गहरे दोस्तों में से एक पूर्व सांसद बलविंदर सिंह भूंदड़ का कहना है, “डेरे का असली चेहरा बहुत बाद में सामने आया और तब हमने वहां जाना छोड़ दिया। कतिपय भाजपा नेताओं के कहने पर हम वहां जाने लगे थे।”

पूर्व अकाली सांसद प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा कहते हैं कि, “जैसे ही पता चला कि डेरेदार कई अपराधिक गतिविधियों में संलिप्त है और सिख विरोधी करतूतें करता है। शिरोमणि अकाली दल ने उससे दूरी बना ली लेकिन भाजपा ने नहीं।”

सर्वविदित है कि पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का सफाया इसलिए भी हुआ कि उसने किसान आंदोलन और बेअदबी की घटनाओं पर ठोस स्टैंड नहीं लिया जबकि यह पार्टी खुद को सिखों, किसानों और पंजाबियों का अभिभावक और प्रवक्ता बताती नहीं थकती। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन की हुकूमत थी जब सिलसिलेवार बेअदबी की घटनाएं शुरू हुईं।

सरकार और डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के अलावा लगभग सब ने माना कि यह सब एक बड़ी साजिश के तहत किया जा रहा है और इस साजिश में गुरमीत राम रहीम सिंह की भूमिका कहीं न कहीं जरूर है। बहुचर्चित बहबलकलां गोलीकांड भी शिरोमणि अकाली दल के माथे पर लगा एक शाश्वत दाग है।

तमाम सरकारी-गैर सरकारी जांच रिपोर्ट्स साफ इशारा करती हैं कि बेअदबी कांड और बहबलकलां गोलीकांड में अकाली दल और बादलों की भूमिका बेहद संदेहास्पद थी। सुखबीर सिंह बादल कहते हैं, “हम पर विपक्ष के झूठे आरोप हैं। मामले अदालत में हैं, इसलिए ज्यादा कुछ कहना मुनासिब नहीं।”

2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इसे मुख्य मुद्दा बनाया था और कहा था कि बेअदबी कांड के दोषियों को सत्ता में आने पर चौबीस घंटों के भीतर गिरफ्तार कर लिया जाएगा और वह बहबलकलां गोलीकांड प्रकरण में भी आनन-फानन में इंसाफ होगा।

कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने तो वह यह सब कुछ भूल गए। औपचारिक तौर पर पुलिसिया जांच टीमें बनाई गईं। असलियत से कोई भी पर्दाफाश इसलिए नहीं चाहता था कि कांग्रेस ने डेरा अनुयायियों के वोट लिए थे। कहना चाहिए कि ‘खरीदे’ भी थे।

अब भाजपा का हिस्सा बन गए पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कहते हैं, “शिरोमणि अकाली दल ने यह सारा ताना-बाना इतनी बुरी तरह से उलझाया कि इसे सुलझाने में अभी और वक्त लगना था लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने मुझे मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और कांग्रेस की सरकार चली गई। मुझसे जो संभव हुआ मैंने किया।”

कैप्टन अमरिंदर सिंह

कैप्टन से क्या संभव हुआ? अनेक जांच रिपोर्ट्स के बाद एक और एसआईटी तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह की अगुवाई में बनाई गई। उसने अतिरिक्त निष्पक्षता से जांच की और मुख्यमंत्री के हवाले अपनी पूरी रिपोर्ट कर दी लेकिन उस रिपोर्ट को दबा लिया गया।

कुंवर विजय प्रताप सिंह ने उस रिपोर्ट में वही दर्ज किया जो मौके का सच था। नाकि वो जो सत्ता के सौदागर चाहते थे। आखिरकार आईपीएस कुंवर विजय प्रताप सिंह ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अब वह अमृतसर (दक्षिण) से आम आदमी पार्टी के विधायक हैं।

बड़े-बड़े दावों के साथ सत्ता में आई यह पार्टी भी कुंवर विजय प्रताप सिंह की रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं करना चाहती। इसीलिए कुंवर अपनी पार्टी से खफा हैं। उनसे संपर्क करने की बहुत कोशिश की गई लेकिन लगातार उनका फोन स्विच ऑफ मिला और मालूम करने पर पता चला कि इन दिनों वह बीमार हैं।

आम आदमी पार्टी का कोई दूसरा नेता भी उस पूरे प्रकरण पर बोलने को तैयार नहीं। लीपापोती की भाषा में मुख्यमंत्री से लेकर उनके विधायक तक यह कहते मिल जाते हैं कि वक्त आने पर पूरा इंसाफ होगा। लेकिन वह ‘वक्त’ आएगा कब? इसका जवाब भी कोई नहीं देता।

खैर, गुरमीत राम रहीम सिंह और सिखों के बीच की अदावत तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के चलते अब पंजाब का माहौल फिर अति संवेदनशील हो गया है। क्या इसे राज्य सरकार ‘संवेदनशील’ और गंभीर जानबूझकर होने दे रही है?

यह ढका-छिपा सच नहीं है कि बठिंडा के डेरा सबालतपुरा में सजायाफ्ता गुरमीत राम रहीम सिंह का वर्चुअल सत्संग होने देना और वहां हजारों की तादाद में डेरा प्रेमियों तथा सिखों को इकट्ठे होने देना कतई समझदारी नहीं है। 29 जनवरी को वहां वर्चुअल सत्संग से पहले हिंसक मुठभेड़ हुई और भारी तादाद में पुलिस की तैनाती के बावजूद मामला बिगड़ा और यह संकेत दे गया कि आने वाले दिनों में गुरमीत राम रहीम सिंह के सत्संग पंजाब के अमन-सद्भाव के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकते हैं।

डेरा सच्चा सौदा हरियाणा और पंजाब का मुख्यालय

29 जनवरी को पंजाब में नया-नया उठा खालिस्तान समर्थक और संत जरनैल सिंह भिंडरांवाला का ‘दूसरा रूप’ कहलाने वाला अमृतपाल सिंह खालसा उस दिन बीमारी के चलते अस्पताल में दाखिल था। तय मानिए कि अगर वह पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक वहां होता तो हालात बेहद संगीन होने थे। अब वह सेहतमंद है और तत्पर एवं तैयार भी- डेरा अनुयायियों से दो-दो हाथ करने के लिए। (पहले राज्य में सक्रिय ईसाई मिशनरियों से वह भिड़ा था)।

इसके मायने भविष्य के पंजाब के लिए बखूबी समझे जा सकते हैं। अमृतपाल सिंह कहता है, “गुरमीत राम रहीम सिंह कातिल और बलात्कारी ही नहीं बल्कि बेअदबी कांडों का गुनाहगार भी है। उसे हम अपने तौर पर सजा देना चाहते हैं। तमाम सिख एकजुट होकर उसके वर्चुअल सत्संगों का बहिष्कार करें, डेरा सच्चा सौदा प्रेमियों का बहिष्कार करें।”

अमृतपाल सिंह का कहना है कि “पंजाब में गुरमीत राम रहीम सिंह का कोई नामलेवा नहीं होना चाहिए। जरूरत पड़ी तो हम हरियाणा जाकर उसका विरोध करेंगे। वह भाजपा का पाला हुआ गुंडा है और गुंडों के साथ जो सलूक किया जाता है, वही उसके साथ भी किया जाएगा।”

पिछले दिनों अमृतपाल सिंह खालसा ने अपने हथियारबंद समर्थकों को आदेश दिया था कि गुरुद्वारों से बुजुर्गों और बीमारों के लिए रखी गईं कुर्सियां उठाकर फेंक दी जाएं। अब पंजाब के किसी गुरुद्वारे में आपको कुर्सी की सहूलियत नहीं मिलेगी। खालसा का यह कदम सर्वोच्च सिख संस्था श्री अकाल तख्त साहिब और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के इस बाबत लिए गए फैसलों के खिलाफ जाता है लेकिन सूबे में उसका विरोध नहीं हुआ।

अमृतपाल सिंह खालसा

तोड़फोड़ के बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने कुछ गुरुद्वारों का दौरा किया था लेकिन वह भी अमृतपाल सिंह के खिलाफ कुछ नहीं बोले। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार छोटी-छोटी बात के लिए बड़े-बड़े नेताओं को तलब कर लेते हैं लेकिन वह भी इस पर खामोश हैं।

एसजीपीसी की पूर्व प्रधान और अब शिरोमणि अकाली दल को छोड़ चुकीं बीबी जागीर कौर कहतीं हैं, “अभी वह इस मामले पर कुछ नहीं कहना चाहतीं।” शिरोमणि अकाली दल भी इस प्रकरण पर खामोश है। सुखबीर सिंह बादल और हरसिमरत कौर बादल इस सवाल पर बातचीत का रुख ही मोड़ देते हैं।

जाहिरन अमृतपाल सिंह खालसा एक हौआ बनता जा रहा है। शीशे की मानिंद साफ है कि अगर उसे अभी काबू में नहीं किया गया तो आगे जाकर वह पंजाब के अमन और सद्भाव के लिए बहुत बड़े खतरे का सबब बनेगा और कानून- व्यवस्था के लिए भी।

अपनी गतिविधियों को पंजाब में फैलाने के लिए अमृतपाल सिंह खालसा को किसी ना किसी मौके की दरकार रहती है। अब मौका गुरमीत राम रहीम सिंह है। बखूबी कहा जा सकता है कि गुरमीत राम रहीम सिंह और अमृतपाल सिंह खालसा पंजाब का माहौल खराब कर रहे हैं और सरकार आराम कुर्सियों पर बैठकर आने वाले बुरे दौर को इत्मीनान से देख रही है।

भगवंत मान सरकार की उदासीनता तो यही बताती है। खुद आम आदमी पार्टी के एक आला विधायक बातचीत में कहते हैं, “हम खुद नहीं समझ पा रहे कि मुख्यमंत्री मामले की गंभीरता को अनदेखा क्यों कर रहे हैं? लोगों को मौका मिल रहा है यह कहने का कि ‘आप’ दरअसल भाजपा की बी-टीम ही है!”

पंजाब के प्रसिद्ध वामपंथी नेता मंगतराम पासला के मुताबिक अगर अमृतपाल सिंह खालसा गुरमीत राम रहीम सिंह के अनुयायियों को सीधे निशाने पर लेता है तो पंजाब का माहौल बेतहाशा खराब हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि वह दोनों को काबू में रखे। राज्य के एक उच्च पुलिस अधिकारी भी यही मानते हैं।

(अमरीक वरिष्ठ पत्रकार हैं और पंजाब में रहते हैं )

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