Saturday, January 22, 2022

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया या ऑफ अडानी?

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देखिए! क्या विडंबना है कि देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अडानी इंटरप्राइजेज को ऑस्ट्रेलिया की कार्मिकेल खान प्रोजेक्ट के लिए एक बिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 5450 करोड़ रुपये) की रकम लोन देने जा रहा है। ये खबर हमें तब पता लगती है, जब ऑस्ट्रेलिया के सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चल रही वनडे सीरीज का पहले मैच में एक शख्स हाथ ऊपर उठा कर एक पोस्टर लेकर बीच पिच पर पहुंच जाता है, जिस पर लिखा होता है- ‘भारतीय स्टेट बैंक NO $1bn Adani loan’। …तब जाकर हमें पता लगता है कि SBI अडानी को एक बिलियन डॉलर का लोन देने जा रहा है।

कल खबर आई है कि फ्रांस के बड़े फंड हाउस आमुंडी ने कहा है कि भारतीय स्टेट बैंक (SBI) यदि ऑस्ट्रेलिया में अडानी के कार्मिकेल कोयला खदान को 5,000 करोड़ रुपये का लोन देगा, तो वह अपने पास मौजूद SBI ग्रीन बांड को बेच देगा। आमुंडी SBI के प्रमुख निवेशकों में से एक है। आमुंडी यूरोप का सबसे बड़ा फंड मैनेजर है और ग्लोबल टॉप 10 में शामिल है।

दरअसल अडानी की यह परियोजना पर्यावरण से जुड़ी हुई है और यह सारे वित्तीय संस्थान ग्रीन फाइनेंसिंग के लिए प्रतिबद्ध हैं। दुनिया के सभी बड़ी बैंक जैसे सिटी बैंक, डॉयशे बैंक, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड, HSBC और बार्कलेज ने इस प्रोजेक्ट पर अडाणी ग्रुप को लोन देने से इनकार कर दिया है। दो चीनी बैंक भी मना कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 में ऑस्ट्रेलिया यात्रा के समय ही एसबीआई ने अडानी समूह को ऑस्ट्रेलिया में कोयला खदानें संचालित करने के लिए एक अरब डॉलर कर्ज़ देने का समझौता किया था, लेकिन तब सिर्फ़ सहमति पत्र पर दस्तख़त हुए थे। बाद में जब SBI से RTI के माध्यम से पूछा गया कि वह अडानी को लोन देने जा रहा है? उसे पहले से कितना कर्ज दिया जा चुका है? और किस आधार पर कर्ज दिया गया है? तो SBI ने जवाब दिया कि उद्योगपति गौतम अडाणी द्वारा प्रवर्तित कंपनियों को दिए गए कर्ज से जुड़े रिकॉर्ड का खुलासा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय स्टेट बैंक ने संबंधित सूचनाओं को अमानत के तौर पर रखा है और इसमें वाणिज्यिक भरोसा जुड़ा है।

2016 में अडानी को दिए गए लोन का मामला राज्‍यसभा में भी गुंजा था। जनता दल यूनाइटेड के सांसद पवन वर्मा ने गुरुवार को सरकारी बैंकों के औद्योगिक घरानों पर बकाए कर्ज का मुद्दा उठाया। उन्होंने देश के बड़े बकाएदारों के नाम लेते हुए व्यापारिक समूहों पर सीधे तौर पर हमला बोला। उन्‍होंने अडाणी समूह का विशेष रूप से जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इस व्यापारिक समूह और उसकी कंपनी पर 72 हजार करोड़ रुपये बकाया है।

क्रेडिट सुइस ने 2015 के हाउस ऑफ डेट रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि अडानी समूह बैंकिंग क्षेत्र के 12 प्रतिशत कर्ज लेने वाली 10 कंपनियों में सबसे ज्यादा ‘गंभीर तनाव’ में है, लेकिन जैसे ही मोदी जी सत्ता में आए गौतम अडानी भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक बन गए।

अडानी को नरेंद्र मोदी बार-बार बचाते आए हैं। गुजरात के चीफ मिनिस्टर रहते हुए मोदी ने अडानी को बेहद सस्ती दर पर मुंद्रा पोर्ट की सैकड़ों किलोमीटर की जमीन आवंटित कर दी थी।

2012 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इसी मुंद्रा प्रोजेक्ट से पर्यावरण को हुए नुकसान के आरोपों की जांच के लिए सुनीता नारायण की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को हुए व्यापक नुकसान और अवैध तरीके से जमीन लेने जैसी बातों का खुलासा किया और इसकी सिफारिश के आधार पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कारण यूपीए सरकार ने अडानी समूह पर 200 करोड़ का जुर्माना लगाया, लेकिन जैसे ही मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने, उन्होंने वो जुर्माना निरस्त कर दिया। साफ है कि पर्यावरण के मामले में अडानी का रिकॉर्ड पहले से ही खराब रहा है।

कोरोना काल में अभी सरकारी बैंकों का NPA तेजी से बढ़ता जा रहा है और अभी सबसे ज्यादा NPA भारतीय स्टेट बैंक के हिस्से ही आ रहा है। ऐसे में अडानी को ऐसी विवादित परियोजना के लिए लोन दिया जाना कितना सही है?

(गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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