सुप्रीम कोर्ट ने लिया विकास दुबे एनकाउंटर का संज्ञान, यूपी से जवाब तलब

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कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या और उसके बाद गैंगस्टर विकास दुबे समेत 6 लोगों को पुलिस की तरफ से मार गिराए जाने के मामले पर उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य को गुरुवार, 16 जुलाई तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही सुनवाई के लिए अगली तारीख 20 जुलाई सोमवार नियत की है।उच्चतम न्यायालय  में कई याचिकाएं दाखिल हुई हैं जिनमें कहा गया है कि यूपी पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती।

हालांकि उच्चतम न्यायालय ने विकास दुबे मुठभेड़ मामले की जांच के लिए एक आयोग बनाने का संकेत दिया है। कोर्ट ने आज कहा कि हैदराबाद एनकाउंटर केस की तरह वह इस मामले की जांच के लिए भी एक आयोग का गठन करना चाहता है।20 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई है। उस दिन कोर्ट आयोग को लेकर कोई आदेश दे सकता है।

इन याचिकाओं में कहा गया है कि यूपी पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती। मामले में पुलिस, अपराधियों और नेताओं के गठजोड़ की तह तक पहुंचने के लिए जांच सीबीआई, एनआईए या एसआईटी को सौंपी जाए तथा उच्चतम न्यायालय  खुद जांच की निगरानी करे।

वकील घनश्याम उपाध्याय, अनूप प्रकाश अवस्थी और विशाल तिवारी की याचिकाएं सुनवाई के लिए लगी थीं। बहस शुरू होने से पहले ही चीफ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस एन सुभाष रेड्डी और जस्टिस ए एस बोपन्ना की पीठ ने यह कह दिया कि उनका इरादा हैदराबाद मामले की तरह इस मामले की जांच के लिए भी एक आयोग के गठन का है। सभी पक्ष इस मसले पर अपने सुझाव दें।

यूपी सरकार की तरफ से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई टालने की मांग करते हुए कहा कि हम इस मसले पर अपना पक्ष रखना चाहते हैं। हमें इसका मौका दिया जाए। हमारे जवाब को देखने के बाद कोर्ट इस मसले पर आगे कोई फैसला ले। हम 2 दिन के भीतर अपना हलफनामा दाखिल कर देंगे। इसके बाद याचिकाकर्ता घनश्याम उपाध्याय ने कोर्ट से कहा कि पूरे मामले की जांच की निगरानी उच्चतम न्यायालय को करनी चाहिए। लेकिन चीफ जस्टिस ने इससे मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता आप निगरानी का मतलब क्या समझते हैं।हम जांच में कब-कब और क्या-क्या हो रहा है, इसकी निगरानी नहीं करेंगे।

हैदराबाद केस में उच्चतम न्यायालय ने जांच के लिए 3 सदस्यीय आयोग का गठन कर दिया था। एक महिला वेटरनरी डॉक्टर (पशु चिकित्सक) के साथ बलात्कार और उसकी हत्या कर लाश को जला देने के 4 आरोपियों को पिछले साल 6 दिसंबर को हैदराबाद पुलिस ने मार गिराया था। मामला जब उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो उसने जांच के लिए 3 सदस्यीय आयोग का गठन कर दिया। कोर्ट ने आयोग का अध्यक्ष अपने रिटायर्ड जज जस्टिस वी एस सिरपुरकर को बनाया। मुंबई हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज रेखा बलडोटा और पूर्व सीबीआई प्रमुख वी एस कार्तिकेयन को भी आयोग में रखा गया। कोर्ट ने आयोग से काम शुरू करने के 6 महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा है ।

विकास दुबे मुठभेड़ केस : सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए कमेटी के गठन का इशारा किया

दरअसल गैंगस्टर विकास दुबे की मुठभेड़ से एक दिन पहले, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उसके पांच सह-अभियुक्तों की “हत्या / कथित मुठभेड़” की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी और इसमें दुबे की संभावित हत्या का संकेत दिया गया था। दुबे को मध्य प्रदेश से लाकर उत्तर प्रदेश में “उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा उसकी मुठभेड़ से बचाने” की आशंका जताते हुए, दलीलों में कहा गया था कि  इस बात की पूरी आशंका है कि आरोपी विकास दुबे भी उत्तर प्रदेश के अन्य आरोपियों की तरह मारा जाएगा, अगर एक बार उसकी हिरासत उत्तर प्रदेश पुलिस को मिल जाती है।

याचिका 10 जुलाई को अदालत के सामने सूचीबद्ध नहीं हुई थी, दुबे को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसी तारीख को मार दिया था, जिस दिन यह प्रार्थना की गई थी कि याचिका को सूचीबद्ध किया जाए, क्योंकि वह पुलिस से बचने की कोशिश कर रहा था। इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने बाद में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को सूचित किया कि उसे अपनी याचिका प्रार्थना में संशोधन करने की अनुमति दी जाए।

याचिका में अब सभी आरोपियों की मौत की सीबीआई जांच की मांग की गई और पुलिसकर्मियों और उन सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया है जो पांचों आरोपियों की हत्या में शामिल हैं। चूंकि, पुलिस द्वारा मुठभेड़ के नाम पर अभियुक्तों की हत्या करना, चाहे वह कितना भी जघन्य अपराधी क्यों न हो, कानून के शासन और मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और यह देश के तालिबानीकरण के समान है और इसलिए तत्काल याचिका दाखिल की गई है। याचिका में  पुलिसकर्मियों और उन सभी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो सभी आरोपियों की हत्या में शामिल हैं।

याचिका में उच्चतम न्यायालय से कानून और संविधान के अंतिम संरक्षक के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने की अपील करते हुए, पुलिस विभाग और कानून प्रवर्तन मशीनरी में भ्रष्टाचार के रूप में विकास दुबे का उदाहरण दिया गया है और तेलंगाना एनकाउंटर का मामला भी याद कराया गया है। हाई प्रोफ़ाइल राज नेताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ दुबे के संबंध के प्रकाश में याचिका में उच्चतम न्यायालय की निगरानी और नियंत्रण में सीबीआई जैसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा तत्काल जांच के लिए प्रार्थना की गई है। यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता को अभियुक्त के लिए कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन पुलिस तंत्र की ओर से पूर्ण अराजकता और अत्यधिक हाई हैंड कार्रवाई को देखकर बहुत तकलीफ हो रही है।

पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने भी एक अन्य लंबित मामले में एक अन्य याचिका दाखिल की है, जिसमें जनवरी 2017 से मार्च 2018 तक उत्तर प्रदेश में हुई मुठभेड़ों पर सवाल उठाया गया है। याचिका में कहा गया है कि “एनकाउंटर एक गंभीर अपराध/ दोषी हत्या है” और पूरे समाज के खिलाफ अपराध है। याचिका अधिवक्ता अपर्णा भट ने दायर किया था और इसका मसौदा वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने तैयार किया है। पीयूसीएल की याचिका में  दुबे और उसके सहयोगी अमर दुबे और प्रभात मिश्रा की मुठभेड़ में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा निगरानी जांच की मांग की गयी है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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