Mon. Feb 24th, 2020

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी संशोधन कानून, 2018 को रखा बरकरार रखा

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सुप्रीम कोर्ट।

उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति और जनजाति का उत्पीड़न रोकने से जुड़े संशोधित कानून (एससी-एसटी एक्ट) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अगर मामला पहली नजर में एससी-एसटी एक्ट के तहत नहीं पाया गया तो आरोपी को अग्रिम जमानत मिल सकती है। एफआईआर रद्द भी हो सकती है। हालांकि एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और किसी आला पुलिस अफसर की मंजूरी जरूरी नहीं होगी।

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी और एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी। साथ ही आरोपियों को अग्रिम जमानत देने का प्रावधान किया था। इसके बाद सरकार ने कानून में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संशोधन बिल पास कराया था। जस्टिस अरुण मिश्र, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रवींद्र भट की बेंच ने सोमवार को इस मामले में 2-1 से फैसला दिया। यानी दो जज फैसले के पक्ष में थे और एक ने इससे अलग राय रखी।

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इसके साथ ही एससी-एसटी संशोधन कानून, 2018 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया है। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस, विनीत सरन और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने सोमवार को ये फैसला सुनाया है। पीठ ने कहा कि एक्ट में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है और न ही गिरफ्तारी से पहले अनुमति लेने की आवश्यकता है। हालांकि अदालत असाधारण मामलों में एफआईआर रद्द कर सकती है। वहीं न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट ने अलग आदेश जारी कर कहा कि गिरफ्तारी से पहले जमानत केवल असाधारण स्थितियों में दी जानी चाहिए जहां जमानत से इनकार करना न्याय की भ्रूण हत्या होगी।

तीन अक्तूबर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। दरअसल उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च, 2018 के फैसले को पलटने के लिए संसद ने ये संशोधन कर कड़े प्रावधानों को फिर से लागू कर दिया था।

यह संकेत देते हुए कि संशोधनों को बरकरार रखा जाएगा, जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने मौखिक रूप से कहा था कि न्यायालय इस अधिनियम को कमजोर नहीं करेगा। विशेष रूप से जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही एक अक्तूबर 2019 को दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा मार्च 20, 2018 के फैसले पर केंद्र की पुनर्विचार याचिका की अनुमति देकर शर्तों को वापस ले लिया था।

पीठ ने कहा था कि डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य में इस न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग कर जारी किए गए दिशा-निर्देश संविधान के अनुच्छेद 15 (4) के तहत समाज के दबे-कुचले वर्गों के पक्ष में सुरक्षात्मक भेदभाव की अवधारणा के खिलाफ हैं और निर्धारित मापदंडों के भीतर भी असंगत हैं।

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा था कि इस बात की कोई धारणा नहीं हो सकती कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य वर्ग के रूप में कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग कर सकते हैं। यह सभी मानवीय गरिमा के खिलाफ होगा कि वे सभी को झूठा मानें और हर शिकायतकर्ता की शिकायत को शक की निगाह से देखें।

वकील पृथ्वीराज चौहान, प्रिया शर्मा और कुछ अन्य लोगों द्वारा दायर याचिकाओं में प्रार्थना की गई थी कि 1989 के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 2018 में संशोधन अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है और ये संविधान की बुनियादी संरचना के साथ छेड़छाड़ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संशोधन को ‘राजनीतिक दबाव’ के चलते किया है और अग्रिम जमानत के प्रावधान को बनाना मनमाना और अन्यायपूर्ण है।

संशोधन के माध्यम से जोड़े गए नए कानून 2018 में नए प्रावधान 18 ए के लागू होने से फिर दलितों को सताने के मामले में तत्काल गिरफ्तारी होगी और अग्रिम जमानत भी नहीं मिल पाएगी। इस संशोधन कानून के जरिये एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून की धारा 18 ए कहती है कि इस कानून का उल्लंघन करने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं है और न ही जांच अधिकारी को गिरफ्तारी करने से पहले किसी से इजाजत लेने की जरूरत है।

इस कानून के तहत अपराध करने वाले आरोपी को अग्रिम जमानत के प्रावधान (सीआरपीसी की धारा 438) का लाभ नहीं मिलेगा। यानि अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी। संशोधित कानून में साफ कहा गया है कि इस कानून के उल्लंघन पर कानून में दी गई प्रक्रिया का ही पालन होगा और अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी।

लोकतंत्र में चुनाव जीतने और हारने में वोट की राजनीति होती है जो जातिगत वर्गों से होकर आती है। कोई भी राजनीतिक दल 17 प्रतिशत दलित वोटों को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं ले सकता। इनका 150 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर असर है। अप्रैल 2018 में जिन 12 राज्यों में हिंसा हुई, वहां उस समय एससी-एसटी वर्ग से 80 लोकसभा सदस्य थे।

20 मार्च 2018 को उच्चतम न्यायालय के दो जजों की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेकर एससी-एसटी एक्ट में आरोपियों की शिकायत के फौरन बाद गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। शिकायत मिलने पर एफआईआर से पहले शुरुआती जांच को जरूरी किया गया था। साथ ही अंतरिम जमानत का अधिकार दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था के चलते कई बार बेकसूर लोगों को जेल जाना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि गिरफ्तारी से पहले शिकायतों की जांच निर्दोष लोगों का मौलिक अधिकार है।

नौ अगस्त 2018 के फैसले के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार एससी-एसटी एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संसद में संशोधित बिल लेकर आई। इसके तहत एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं रह गई। जांच अफसर को गिरफ्तारी का अधिकार मिल गया और अग्रिम जमानत का प्रावधान हट गया।

एक अक्टूबर 2019 को उच्चतम न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने के दो जजों की पीठ के मार्च 2018 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी देश में छुआछूत और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। उनका अभी भी सामाजिक रूप से बहिष्कार किया जा रहा है। देश में समानता के लिए अभी भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है।

दस फरवरी 2020 को जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने के पहले जांच जरूरी नहीं है। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं है। जस्टिस रवींद्र भट ने फैसले में कहा कि हर नागरिक को दूसरे नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। अगर शुरुआती तौर पर एससी-एसटी एक्ट के तहत केस नहीं बनता, तो अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है। ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का खुला इस्तेमाल संसद की मंशा के खिलाफ होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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