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सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की चिंता- आपराधिक मामलों में आरोपी सांसदों और विधायकों से डरती है पुलिस

उच्चतम न्यायालय ने सांसदों और विधायकों के साथ पुलिस की दुरभिसंधि पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस अधिकारी अक्सर ऐसे जनप्रतिनिधियों के दबाव के चलते कानून का अनुपालन नहीं करवाते हैं। जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने मंगलवार को ऐसे सांसदों और विधायकों को गिरफ्तार करने एवं पेश करने में पुलिस की अनिच्छा को लेकर चिंता जाहिर की, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। साथ ही अदालत ने इसे एक ‘गंभीर’ मामला करारा दिया। पीठ ने कहा कि कि कई मामलों में पुलिस समन को लागू नहीं कर रही है, क्योंकि वह सांसदों-विधायकों से डरती है और यह एक गंभीर मामला है। पीठ ने केंद्र से भी इस मुद्दे पर गौर करने को कहा।

पीठ ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों का ताजा विवरण तलब करने के साथ ही ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए उच्च न्यायालयों को भी वीडियो कॉन्फ्रेंस की आवश्यकता संबंधी ब्योरा देने को कहा है। पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात को संज्ञान में लिया कि तमाम हाई कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे के लिए वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए सुनवाई करने को कहा है। पीठ ने हाई कोर्ट से पूछा है कि वे बताएं कि कितनी संख्या में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधाएं हैं ताकि इन मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो सके।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि उच्चतम न्यायालय प्रत्येक राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश जारी कर सकती है, ताकि समय पर समन सुनिश्चित किया जा सके। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि उनके आदेशों के अनुपालन में, विभिन्न उच्च न्यायालयों ने हलफनामे पर अपनी कार्ययोजना दायर की है, लेकिन न्यायमूर्ति रमना ने कहा कि विभिन्न मुद्दों पर कोई स्पष्टता नहीं है।

हंसारिया ने न्यायालय को सूचित किया कि दुर्भाग्य से निगरानी के बावजूद विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो देश में 4859 मामले हैं। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म स्तर पर सख्त निगरानी की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति रमना ने कहा कि भले ही उन्होंने पिछली सुनवाई में न्यायालयों के भौगोलिक स्थानों पर निर्भर मामलों की निपटान दर इंगित करने को कहा था, लेकिन किसी भी अदालत ने रिकॉर्ड पर ऐसी कोई जानकारी या डेटा नहीं दिया है।

पीठ ने एक ‘अस्थायी डेटा शीट’ तैयार की है, जिसमें उच्च न्यायालय का नाम, लंबित मामलों की संख्या, उपलब्ध विशेष अदालतों की वर्तमान संख्या, बुनियादी ढांचे की आवश्यकता आदि एक प्रारूप के भीतर है जो स्पष्टता प्रदान करता है कि वास्तव में समस्या क्या है। केंद्र ने लंबित मामलों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करने के लिए और समय मांगा और पीठ को बताया कि विभिन्न हितधारकों से जानकारी की प्रतीक्षा की जा रही है। पीठ ने मामले को अस्थायी रूप से 10 दिनों के लिए स्थगित कर दिया। 9 सितंबर को शीर्ष अदालत को सूचित किया गया था कि वर्तमान और पूर्व विधायक/ सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले संख्या में 4442 हैं। मौजूदा विधायकों में 2556 अभियुक्त हैं।

उच्चतम न्यायालय में न्याय मित्र ने अपनी रिपोर्ट पेश कर बताया कि पूर्व और मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में पिछले दो सालों में इजाफा हुआ है। शीर्ष अदालत को बताया कि इसके लिए हाई कोर्ट द्वारा माइक्रो लेवल पर मॉनीटरिंग करने की जरूरत है, ताकि केसों का निपटारा जल्दी से जल्दी सुनिश्चित किया जा सके।

नयी रिपोर्ट के मुताबिक 4859 पूर्व और वर्तमान सांसदों और एमएलए के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। मार्च में ये संख्या 4442 की थी। वहीं दिसंबर 2018 की रिपोर्ट में कुल पेंडिंग केसों की संख्या 4122 थी। ऐसे में एमएलए और एमपी (मौजूदा और पूर्व) के खिलाफ पेंडिंग केसों में बढ़ोतरी हुई है। पिछले दो सालों में आपराधिक केसों की संख्या में इजाफा दर्ज किया गया है। जहां तक राज्यों का सवाल है, तो सबसे ज्यादा यूपी में 1374 केस पेंडिंग हैं। वहीं बिहार में 557 केस पेंडिंग बताए गए हैं। तीसरे नंबर पर उड़ीसा है, जहां 445 केस पेंडिंग हैं। दिल्ली में 87 केस पेंडिंग हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि दिल्ली में सेशन कोर्ट में 25 केस पेंडिंग हैं, जबकि मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में 62 ऐसे केस पेंडिंग है। इनमें मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के केस भी शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ हाई कोर्ट हर जिले में स्पेशल कोर्ट गठित करने पक्ष में हैं, ताकि उन स्पेशल कोर्ट में दागी नेताओं के मामले का जल्दी से जल्दी निपटारा किया जाए। कुछ राज्यों में हाई कोर्ट ने जोन वाइज स्पेशल कोर्ट बनाए जाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सभी हाई कोर्ट इस बात के फेवर में हैं कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और उनके बयान सुरक्षित माहौल में हों इसके लिए सुरक्षित गवाह एग्जामिनेशन रूम बनाया जाए साथ ही विडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधाएं हों। रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में सेशन कोर्ट में 25 केस पेंडिंग हैं, जबकि मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में 62 ऐसे केस पेंडिंग हैं। इनमें मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के केस भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ता बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पीआईएल दाखिल कर मांग की गई है कि नेताओं और ब्यूरोक्रेट, जिन्हें सजा हो चुकी है उनके चुनाव लड़ने पर आजीवन बैन होना चाहिए। साथ ही मांग की गई है कि नेताओं के खिलाफ पेंडिंग मामलों का निपटारा एक साल में हो, इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाना चाहिए। दागी नेताओं के मामले की जल्दी सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए स्पेशल कोर्ट का गठन करने का उच्चतम न्यायालय ने निर्देश जारी किया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया और अधिवक्ता स्नेहा कलिता की ओर से दायर रिपोर्ट में कहा था कि सांसदों और विधायकों (वर्तमान और पूर्व) के खिलाफ कुल 4442 मामले विभिन्न अदालतों में हैं, जिनमें सांसद और विधायकों के लिए विशेष अदालतें शामिल हैं। 2556 मामलों में वर्तमान आरोपी वर्तमान सांसद/ विधायक हैं। शामिल सांसद/ विधायकों की संख्या कुल मामलों की संख्या से अधिक है, क्योंकि एक मामले में एक से अधिक आरोपी हैं, और एक ही सांसद/विधायक एक से अधिक मामलों में आरोपी हैं। यह कहा गया है कि बड़ी संख्या में मामलों में, ट्रायल कोर्ट द्वारा गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किए गए थे और कई मामलों में, उन्हें ट्रायल कोर्ट द्वारा निष्पादित किया जाना बाकी था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on October 7, 2020 11:15 am

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