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Thursday, August 5, 2021

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- प्रेस की आजादी के नाम पर पूछताछ से नहीं बच सकते मीडिया कर्मी

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उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता पूरी तरह से महत्वपूर्ण है, लेकिन कोई भी व्यक्ति पूछताछ से बचने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर प्रतिरक्षा होने का दावा नहीं कर सकता है। प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं हो सकता है कि मीडिया के व्यक्ति से सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए। चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने मौखिक रूप से कहा कि न्यायालय रिपब्लिक टीवी और उसके प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी से जिम्मेदार रिपोर्टिंग के आश्वासन की भावना को पसंद करेगा। चीफ जस्टिस बोबडे ने यह टिप्पणी जून में गोस्वामी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निलंबित करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली महाराष्ट्र राज्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि हमारी पहली चिंता यह है कि समाज में शांति और सौहार्द बना रहे।अदालत अर्नब की ओर से जिम्मेदारी का भरोसा चाहती है। बोबडे ने कहा कि अदालत प्रेस की आज़ादी की अहमियत को समझती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि किसी मीडिया पर्सन से सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए। साल्वे ने सीजेआई की बात के जवाब में कहा कि वह उनकी बातों से सहमत हैं, लेकिन जो एफ़आईआर दर्ज की गई है, वह सही नहीं है।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि रिपोर्टिंग करते वक्त जिम्मेदारी का ध्यान रखा जाना चाहिए, कुछ ऐसी बातें हैं जहां पर सावधानी रखी जानी चाहिए। चीफ जस्टिस ने अर्नब से कहा कि मैं तुम्हारी रिपोर्टिंग को बर्दाश्त नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस ने साल्वे से कहा कि वह क्या करना चाहते हैं, इस बारे में एक हलफनामा दें।

टीआरपी घोटाले में नाम सामने आने के बाद से ही सुर्खियां बटोर रहे रिपब्लिक टीवी की मुश्किलें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। कुछ दिन पहले मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी की संपादकीय टीम के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया था और सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी को लेकर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।

उच्चतम न्यायालय महाराष्ट्र सरकार की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ चल रही जांच पर 30 जून को रोक लगा दी थी। महाराष्ट्र सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि हाई कोर्ट कैसे पूरी जांच पर रोक लगा सकता है। सिंघवी ने अदालत के सामने अर्नब गोस्वामी के द्वारा चलाए गए कथित सांप्रदायिक बयानों को रखा। अर्नब की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पत्रकार की पूरी टीम के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर के बारे में अदालत को बताया।

सिंघवी ने अदालत को बताया कि अगर यह जांच शुरू हो जाती है, तब भी अर्नब गोस्वामी को गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा और जांच में आने से 48 घंटे पहले उन्हें नोटिस भेजा जाएगा। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि वह इस बात की सूची दें कि अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ कितनी एफ़आईआर दर्ज हुई हैं। इस मामले में अब दो हफ़्ते बाद सुनवाई होगी।

सिंघवी ने कहा कि हाई कोर्ट पूरी जांच कैसे रोक सकता है? अगर जांच को बहाल किया जाता है तो अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, पूछताछ के लिए पेश होने के लिए 48 घंटे का नोटिस दिया जाएगा। सिंघवी ने कहा कि ये संदेश नहीं जाना चाहिए कि कुछ लोग कानून से ऊपर हैं। सिंघवी ने ‘पूछता है भारत’ कार्यक्रम में दिखाई गई चीजों, बोली गई बातों और सवालों की लिखित सामग्री कोर्ट के सामने रखीं। कोर्ट के पिछले आदेशों के आधार पर उनकी व्याख्या की। उन्‍होंने बताया कि कैसे ‘देश पूछता है’ के नाम पर लोगों को उकसाया गया कि क्या किसी मोलवी या ईसाई की हत्या पर भी लोग यूं ही खामोश रहेंगे? इन सवालों पर यूट्यूब पर प्रतिक्रिया और लोगों की टिप्पणियों का भी ब्योरा कोर्ट में दिया गया। सिंघवी ने कहा कि हाई कोर्ट पूरी जांच कैसे रोक सकता है?

अर्नब के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि जो न्यूज क्लिप दी गई है उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। ये नजरिए की बात है, कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगता है तो कुछ को नहीं। कोर्ट ने भी इसे आपत्तिजनक नहीं माना। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि मिस्‍टर साल्वे आप मीडिया पर्सन को रिप्रेजेंट कर रहे हैं, लेकिन इसे किनारे कर एक वकील की तरह, अधिकारों और कर्तव्यों के लिहाज से भी बताएं कि क्या जो आपने किया वो सही था? उन्‍होंने कहा कि जिस क्लिप की बात हो रही है उसमे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन वो राजनीतिक लोगों के प्रति था। हाई कोर्ट ने भी इस पर अपने आदेश में टिप्पणी की है। कोर्ट उसे भी ध्यान में रखे।

साल्वे ने कहा, हमें मालूम है कि अपने अधिकारों और दूसरों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे रखा जाता है, लेकिन जो एफआईआर दर्ज की गई है वो सही और उचित नहीं थी। उन्‍होंने कहा कि मुझे दो हफ्ते की मोहलत दें। मैं दो हफ्ते में एक डिटेल हलफनामा दाखिल करूंगा, जिसमें मैं सरकार के भेदभाव और अन्य बातों की जानकारी कोर्ट को दूंगा। इस पर सिंघवी ने कहा कि मीडिया के नाम पर मनमाने ढंग से सवाल पूछने के नाम पर लोगों को उकसाने की छूट नहीं दी जा सकती।

दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट ने 30 जून को अंग्रेजी समाचार चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ के विवादास्पद एंकर और संस्थापक अर्नब गोस्वामी को राहत देते हुए उनके खिलाफ पालघर लिंचिंग मुद्दे पर कथित सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप में और मुंबई के बांद्रा रेलवे में प्रवासी कामगारों के जमा होने को लेकर मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज दोनों एफआईआर पर रोक लगा दी थी। जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस रियाज चागला की खंडपीठ ने कहा कि अर्नब गोस्वामी के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मुकदमा नहीं बनता। पीठ ने आदेश दिया था कि अर्नब के खिलाफ कोई भी कठोर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

इससे पहले 23 अक्तूबर को एनएम जोशी मार्ग पुलिस ने आईपीसी की कई धाराओं के तहत रिपब्लिक टीवी की संपादकीय टीम के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया था। इन धाराओं के तहत तीन साल की जेल हो सकती है और ये ग़ैर जमानती धाराएं हैं। मुंबई पुलिस के सब इंस्पेक्टर शशिकांत पवार की शिकायत पर रिपब्लिक टीवी की डेपुटी एडिटर सागरिका मित्रा, एंकर शिवानी गुप्ता, डिपुटी एडिटर शावन सेन, एग्जीक्यूटिव एडिटर निरंजन नारायणस्वामी, न्यूज़ रूम इंचार्ज और संपादकीय टीम के सभी लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया था।

एफ़आईआर में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि रिपब्लिक टीवी की ओर से एक ख़बर चलाई गई, जिससे मुंबई महानगर के पुलिसकर्मियों के बीच असंतोष भड़काने की कोशिश की गई और मुंबई पुलिस की मानहानि भी की गई।

कुछ दिन पहले ही सुशांत मामले में रिपब्लिक टीवी द्वारा की गई रिपोर्टिंग को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने चैनल को जम कर फटकार लगाई थी। अदालत ने रिपब्लिक की वकील से कहा था कि जांच भी आप करो, आरोप भी आप लगाओ और फ़ैसला भी आप ही सुनाओ! तो अदालतें किसलिए बनी हैं? सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई?, इस मामले की जांच जब चल रही थी तो आप अपने चैनल पर चिल्ला-चिल्लाकर उसे हत्या कैसे करार दे रहे थे। किसकी गिरफ्तारी होनी चाहिए और किसकी नहीं, इस बात को लेकर आप लोगों से राय या जनमत कैसे मांग रहे थे? क्या यह सब आपके अधिकार क्षेत्र की बात है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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