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Tuesday, September 28, 2021

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मीडिया को सुप्रीम संदेश- किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं किया जा सकता

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उच्चतम न्यायालय ने सुदर्शन टीवी के सुनवाई के “यूपीएससी जिहाद” मामले की सुनवायी के दौरान कहा कि एक संदेश को मीडिया में जाने दें कि किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस  चंद्रचूड़ ने कहा कि हमें भविष्य के एक राष्ट्र की देखरेख करनी चाहिए जो एकजुट और विविध है।

उच्चतम न्यायालय ने आज सुदर्शन टीवी में “यूपीएससी जिहाद” के नाम से  प्रसारित कार्यक्रम में दर्शाए गए मुसलमानों के रूढ़िवादिता और विद्रूपता पर चिंता व्यक्त की।जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने पहले से प्रसारित किए गए एपिसोड में देखे गए कई समस्याग्रस्त मुद्दों को रेखांकित किया ।

इसके पहले कल 18 अगस्त को सुदर्शन टीवी ने अदालत के समक्ष एक हलफनामा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक कोचिंग संस्थान, ज़कात फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया को विभिन्न आतंकियों से जुड़े संगठनों से धन प्राप्त हुआ है। 

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को गैर सरकारी संगठन ‘जकात फाउंडेशन’ से पूछा कि क्या वह सुदर्शन टीवी मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है, क्योंकि इसमें उसकी भारतीय शाखा पर विदेश से आतंकवाद से जुड़े संगठनों से वित्तीय मदद मिलने का आरोप लगाया गया है। जकात फाउंडेशन प्रशासनिक सेवा में शामिल होने के इच्छुक मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रशिक्षण मुहैया कराता है। 

जकात फाउंडेशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि सुदर्शन टीवी द्वारा दाखिल हलफनामे में उनके मुवक्किल पर विदेश से चंदा लेने का आरोप लगाया गया है। हेगड़े ने कहा कि उनका मुवक्किल एक धर्मार्थ संगठन है जो गैर मुस्लिमों की भी मदद कर रहा है और इस तरह की समाज सेवा सरकारी स्तर पर भी नहीं जानी जाती।

पीठ ने हेगड़े से कहा कि टीवी चैनल की ओर से विदेश से मिले चंदे के संबंध में विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के दस्तावेज जमा किए गए हैं और यह उसके मुवक्किल पर निर्भर है कि वह मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है या नहीं। हेगड़े ने कहा कि जकात फाउंडेशन कोई आवासीय कार्यक्रम संचालित नहीं करता है और केवल आईएएस कोचिंग के लिए शुल्क का भुगतान करता है। हेगड़े ने कहा कि वे अपने मुवक्किल से पूछ कर सोमवार को बतायेंगे कि जकात फाउंडेशन इस याचिका में शामिल होगा या नहीं।

पीठ द्वारा दिए गए स्थगन आदेश पर विवाद करते हुए सुदर्शन चैनल के लिए पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि यह शो खोजी पत्रकारिता से बना है, जो आतंकवादियों से जुड़े संगठनों के अवैध विदेशी धन को यूपीएससी के लिए कोचिंग संस्थानों के लिंक का खुलासा करता है जो अल्पसंख्यक समुदाय के लिए काम करते हैं।

एडिटर-इन-चीफ का मानना है कि यह शो खोजी पत्रकारिता से जुड़े ठोस तथ्यों पर आधारित है और सच्चाई को अपने दर्शकों तक पहुंचाना मीडिया का कर्तव्य है। उन्होंने आश्वासन दिया कि चैनल इस बात से सचेत है कि कार्यक्रम लाइव स्ट्रीमिंग है और जहां तक कहानी का संबंध है, यह किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं है और वो सिर्फ तथ्यों को प्रस्तुत करना चाहते हैं।

श्याम दीवान ने कहा कि तथ्यों की जांच की गई है, उन्हें मिलाया गया है। मुझे विश्वास है कि बोलने और अभिव्यक्ति के मेरे मौलिक अधिकार के तहत, मैं टीवी मीडिया को ये प्रोजेक्ट देने का हकदार हूं। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे जकात फाउंडेशन छात्रों को सिविल सेवा के लिए तैयार करने का प्रयास कर रहा है और फंडिंग के स्रोत का ज्ञान नहीं है।

उन्होंने कहा कि कार्यक्रम का जोर यह है कि एक साजिश है और कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि एक निश्चित समुदाय के सदस्यों को सिविल सेवा में शामिल नहीं होना चाहिए। नौकरशाही में घुसपैठ करने के लिए एक दागी संगठन से धन प्राप्त किया जा रहा है। हमारे चैनल ने राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को उजागर करने का प्रयास किया है और जिस तरह से कुछ व्यक्तियों को अखिल भारतीय सिविल सेवा में भर्ती किया जा रहा है, जिसमें कट्टरपंथी अपने गलत उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय समर्थन के साथ शामिल कर रहे हैं।

श्याम दीवान ने उन समूहों (कथित रूप से पाक-समर्थक समूहों) की सूची दी, जिन्होंने फाउंडेशन के लिए अत्यधिक धन का स्रोत बनाया और उस राशि को भी सूचीबद्ध किया जो कथित रूप से दान की गई है। उन्होंने इस तथ्य पर बल दिया कि ज़कात फाउंडेशन के संस्थापक सैयद ज़फ़र महमूद को प्रसारण में अपना पक्ष रखने के लिए संपर्क किया गया था। उन्होंने कहा यह कहानी के दोनों पक्षों को सामने लाने के चव्हाणके के प्रयास को प्रदर्शित करता है।

सांप्रदायिकता के मुद्दे पर दीवान ने कहा कि एक अल्पसंख्यक समुदाय एक साथ ओबीसी और अल्पसंख्यक योजना का लाभ ले रहा है और ये ही राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है जिसके कारण हम एक बहस की मांग कर रहे हैं। अगर कोई न्यूज चैनल ओबीसी कोटे का लाभ लेने वाले मुसलमानों पर आपत्ति उठा रहा है तो वह सांप्रदायिक नहीं हो सकता है और इस देश में बार-बार ये सवाल उठता है और यह बहस सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। पूर्व-प्रकाशन सेंसरशिप के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पूर्व प्रतिबंध की अनुमति देता है।

ओटीटी प्लेटफार्मों के गैर-विनियमन का उल्लेख करते हुए दीवान ने कहा कि इस इंटरनेट युग में जब नेटफ्लिक्स आदि पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तो यह प्रतिबंध सिर्फ एक रचनात्मक होगा। यह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 19 (1) (ए), 21 और 14 के संबंध में प्रस्तुत किया जाना है। उन्होंने कहा कि चैनल 15 साल से काम कर रहा है और उसने हमेशा कानून के तहत काम किया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि चैनल यहां है और प्रसारण के बाद, यदि कोई हो, तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार है।

जब सुनवाई दोपहर के भोजन के बाद फिर से शुरू हुई, तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में पक्ष बनने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मुझे बहस करने के लिए सोमवार को समय की आवश्यकता होगी। यदि आप प्रतिबन्ध को हटा रहे हैं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि प्रसारित करने के दौरान संयम अत्यधिक जरूरी विषय है, शो में कुछ तत्व हैं जो समस्याग्रस्त हैं।

इनमें नमकहराम जैसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा था, और मुसलमानों को खोपड़ी की टोपी, दाढ़ी और हरे रंग के कपड़ों के रूप में चित्रित किया जा रहा था। उन्होंने एक हिस्से का भी उल्लेख किया जहां चव्हाणके कहते हैं, देखें कि वे विदेशी धन कैसे प्राप्त कर रहे हैं, हमारी पत्नी और बेटियों को लुभा रहे हैं और लव जिहाद कर रहे हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने ने कहा कि मुद्दा यह है कि आप सिविल सेवाओं के नाम पर एक पूरे समुदाय को घसीटते हैं। यह वास्तविक मुद्दा है। जब भी आप उन्हें सिविल सेवाओं में शामिल होने के लिए दिखाते हैं, तो आप आईएसआईएस को दिखाते हैं। आप यह कहना चाहते हैं कि सिविल सेवाओं में शामिल होने वाले मुसलमान एक गहरी साजिश का हिस्सा हैं । क्या मीडिया को समुदायों के पूरे समूह को निशाना बनाने की अनुमति दी जा सकती है? 

जस्टिस चंद्रचूड़ जे ने कहा कि यह संदेश मीडिया में जाने दें कि किसी विशेष समुदाय को लक्षित नहीं किया जा सकता है। हमें भविष्य के राष्ट्र की देखभाल करनी होगी जो कि विविध है। हम राष्ट्रीय सुरक्षा को मान्यता देते हैं, लेकिन हमें व्यक्तिगत सम्मान भी चाहिए।

पीठ इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर सोमवार को करेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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