Wednesday, February 1, 2023

अखिलेश यादव की पुरानी पेंशन योजना बहाली की घोषणा बन रही है गेमचेंजर

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यूपी के चुनाव में पुरानी पेंशन लागू करने की योजना राजनीति में बहुत बड़ा गेम चेंजर साबित होने जा रही है। यूपी में इस वक्त 28 लाख सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स हैं। ये सिर्फ 28 लाख वोट नहीं हैं, बल्कि 28 लाख परिवार हैं। इतना ही नहीं, ये सरकारी कर्मचारी दूसरे वोटर्स को प्रभावित भी करते हैं। अगर ये किसी एक पार्टी की ओर झुक गए तो सूबे का नतीजा बदल सकता है। भाजपा सरकार ने जाने-अनजाने 28 लाख सरकारी कर्मचारी, पेंशनर्स और उनके परिवारों को अखिलेश यादव यानी सपा के पाले में जाने को मजबूर कर दिया है। ये सरकारी कर्मचारी इस बार जाति धर्म और क्षेत्र से परे अपने बाल बच्चों के भविष्य के लिए सपा गठबंधन के पक्ष में लामबंद हो गये हैं जिस पर चाह कर भी भाजपा कुछ नहीं कर पा रही है।

शिक्षक नेता बजरंगी सिंह कहते हैं कि पुरानी पेंशन बहाली को लेकर राज्य कर्मचारियों और शिक्षकों ने काफी बार सरकार से मांग की थी। हड़ताल और धरना प्रदर्शन भी किया, लेकिन सरकार ने हर बार आश्वासन देकर छोड़ दिया। आज तक इस मुद्दे पर कोई भी विधायक, मंत्री और सांसद नहीं बोला, क्योंकि वह खुद पेंशनभोगी हैं और जीवन भर पेंशन और अन्य सुविधाएं लेते हैं, लेकिन 30 से 35 साल तक सेवा करने के बाद भी कार्मिकों को पेंशन देने की बात पर वे पीछे हट जाते हैं। राज्य कर्मियों ने 2018 में पुरानी पेंशन बहाली को लेकर एक बड़ा आंदोलन लखनऊ में किया था, जिसके लिए 2018 के दिसंबर महीने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कमेटी का गठन करते हुए पुरानी पेंशन के बहाली पर विचार कर अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा था, लेकिन आंदोलन और हड़ताल समाप्त होने के साथ ही यह मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।

यह एक ऐसा मुद्दा है, जिससे प्रदेश के लगभग 28 लाख कर्मचारी, शिक्षक और पेंशनर्स जुड़ते हैं। इनकी संख्या लगभग 28 लाख है, लेकिन यह ऐसा वर्ग है, जो समाज को दिशा देने का काम करता है, अगर यह वर्ग समाज न सही अपने परिवार की सहमति बना लेता है तो यह संख्या लगभग एक करोड़ की हो जाएगी। इसी को देखते हुए अखिलेश यादव ने पुरानी पेंशन बहाली का बड़ा दांव खेला है।

यूपी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी ने इस बार बड़े मुद्दे चुने हैं। समाजवादी पार्टी ने पहले ही 300 यूनिट घरेलू बिजली को मुफ्त करने का ऐलान कर दिया है। उसके बाद सभी सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन को बहाल करने का बड़ा दांव चल दिया है। अखिलेश यह भली भांति जानते हैं कि चुनाव कराने के लिए राज्य कर्मचारी चुनावी तंत्र में सबसे मजबूत स्तंभ बनकर खड़े रहते हैं, चाहे वह सरकारी अध्यापक हों, लेखपाल हो, सिपाही हो या अधिकारी वर्ग हो, लेकिन इतना साफ है कि अखिलेश यादव का यह बड़ा दांव कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। जमीनी हकीकत यह है कि यह मुद्दा चुनाव में बहुत असरदार साबित हो रहा है और चौथे एवं पांचवे चरण, जिसमें लखनऊ और प्रयागराज आते हैं, में यह मुद्दा निर्णायक सिद्ध होने जा रहा है।

अखिलेश यादव हर सभा में इस बात को दोहरा रहे हैं, कि सपा पुरानी पेंशन को फिर से लागू करेगी। हमने कर्मचारियों और इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स से बात कर ली है। फंड बनाकर जरूरी धन का बंदोबस्त कर लिया जाएगा।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अप्रैल 2005 के बाद की नियुक्तियों के लिए पुरानी पेंशन को बंद कर दिया था, और नई पेंशन योजना लागू कर दी गई थी। केंद्र सरकार ने नई पेंशन योजना लागू की, लेकिन इसे राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं किया था। इसके बावजूद धीरे-धीरे अधिकतर राज्यों ने इसे अपना लिया।

डिवीजन सेक्रेटरी मिनिस्ट्रियल असोसिएशन इरिगेशन डिपार्टमेंट प्रयागराज उत्तर प्रदेश के धर्मेन्द्र कुमार यादव का कहना है कि उस समय के कर्मचारी इस नई पेंशन योजना को समझ नहीं पाए, उन्हें ऐसा लगा था, जैसे यह योजना सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पुरानी पेंशन योजना से ज्यादा लाभ देगी, लेकिन उनका यह भ्रम टूट गया। नतीजतन पिछले कुछ सालों से कर्मचारियों ने नई पेंशन योजना का विरोध करना शुरू कर दिया है। पुरानी पेंशन योजना कर्मचारियों के लिए भावनात्मक मुद्दा बन चुकी है।

यूपी के चुनाव में पुरानी और नई पेंशन स्कीम पर जीत-हार का गेम सेट हो गया है। सपा ने  पुरानी पेंशन लागू करने का ट्रंप कार्ड खेल दिया है। केंद्र सरकार की नई पेंशन स्कीम में भाजपा फंस गई है। सीएम योगी आदित्यनाथ डिफेंसिव मोड में हैं। पुरानी पेंशन स्कीम से पूरी यूपी का माहौल बदलता दिख रहा है। दरअसल  कर्मचारी पुरानी पेंशन चाहते हैं। इसलिए बीजेपी बैकफुट पर नजर आ रही है।

2004 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। घोषणा हुई कि 31 दिसंबर 2004 के बाद जिनकी भी ज्वॉइनिंग होगी, उन्हें रिटायरमेंट के बाद पेंशन नहीं मिलेगी। इसे नाम दिया, नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस। उसी साल लोकसभा का चुनाव था। चुनाव में इसका जोरदार प्रचार हुआ। फायदे गिनाए गए। लेकिन रिजल्ट आया तो बीजेपी हार गई। इधर अटल की सरकार तो चली गई, लेकिन एनपीएस रह गई। असल में तब इसे राज्यों के उपर थोपा नहीं गया था। फिर भी अप्रैल 2005 को तब के यूपी सीएम मुलायम सिंह ने भी इसे अपना लिया। यही स्कीम अभी तक यूपी में चल रही है। लेकिन मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव ने पुरानी गलती को ठीक करने की घोषणा करके सरकारी कमचारियों का दिल जीत लिया है।

सुरेंद्र कुमार सिंह, पूर्व मंत्री, उत्तर प्रदेश शिक्षा निदेशालय मिनिस्टीरियल कर्मचारी संघ, शिक्षा निदेशालय मिनिस्ट्रीयल कर्मचारी संघ उ०प्र०,प्रयागराज और लखनऊ का कहना है कि पुरानी पेंशन सुरक्षित स्कीम थी। नई पेंशन स्कीम शेयर मार्केट पर आधारित है जो असुरक्षित है। पुराने सिस्टम में जीपीएफ  की सुविधा उपलब्ध थी लेकिन एनपीएस में नहीं है। ऐसे में इसे सही ठहराने जैसी कोई बात नहीं है। पुरानी पेंशन योजना में नौकरी के दौरान कर्मचारी की मौत हो जाने पर उसके परिवार को पेंशन मिलती थी। लेकिन एनपीएस व्यवस्था में कर्मचारी की मौत होने पर फैमिली पेंशन की व्यवस्था साफ नहीं है। यहां तक कि एनपीएस में जमा पैसे को भी जब्त करने की व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा सरकार इसका जो गुणगान कर रही है वह समझ से परे है।

सिद्धार्थ सोनकर,  जिला अध्यक्ष मिनिस्ट्रियल असोसिएशन इरिगेशन डिपार्टमेंट प्रयागराज उत्तर प्रदेश, का कहना है “पुरानी पेंशन व्यवस्था नुकसानदेय होती तो बंगाल और केरल क्यों आज भी उसे चलाते? फिर पुरानी व्यवस्था को लागू करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति की भी जरूरत नहीं है। राज्य सरकार खुद ही फैसला ले सकती है।”

दरअसल जो कर्मचारी 2005 के बाद भर्ती हुए, वे अभी 10 साल बाद रिटायर होने शुरू होंगे। इसलिए पुरानी पेंशन लागू करने से सरकार के खजाने पर बड़ा बोझ नहीं आएगा।

योगी सरकार के वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने 23 जुलाई 2019 को पुरानी पेंशन व्यवस्था को लेकर विधान परिषद में लिखित जवाब दिया। कहा था कि पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू करने का हमारा कोई इरादा नहीं है। उन्होंने बताया कि बीजेपी सरकार ने 5004.03 करोड़ रुपए 6 लाख से अधिक कर्मचारियों को दे दिया है। ये पैसा नई पेंशन योजना के तहत वर्षों से बकाया था। हालांकि, इससे कर्मचारी नहीं माने और उनकी पुरानी पेंशन की मांग बरकरार रही।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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