सत्ता के तलवे चाट रहे पत्रकार अपनी ही बिरादरी के खात्मे पर हैं उतारू

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आज असहमति के किसी भी रूप में आप सत्ता के खिलाफ खड़े हैं तो आप ही नहीं आप का परिवार, सहयोगी, शुभचिंतक हर किसी को उसमें शामिल मान लिया जाएगा। जनविरोधी नीतियों से किसी भी तरह की असहमति या लोकतांत्रिक विरोध करने के लिए भी किसी तरह की कोई जगह सरकार नहीं देना चाहती। राजनीतिक कार्यकर्ताओं से लेकर, बुद्धिजीवियों, छात्र-नौजवानों, पत्रकारों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और आम लोगों तक सभी इस परिधि में शामिल हैं।

इस सबके बावजूद आवाज उठाने वाले बिना किसी भय के संघर्ष में खड़े हैं, लेकिन वास्तविकता को आम जन तक ले जाने वाले मीडिया का बड़ा हिस्सा कैसे सत्ता की चारण वंदना में जुटा है, इसकी बानगी तो रोज ही देखने को मिलती है। अब वह अपने सदस्य (पत्रकार) को भी निशाना बनाने से नहीं चूकता है। इसकी बानगी उत्तराखंड में नैनीताल जिले के हल्द्वानी में एक बार फिर देखने को मिली है।

वाकया यह है कि हल्द्वानी में एक दैनिक समाचार पत्र में कार्यरत महिला पत्रकार को स्थानीय थाने से महिला पुलिस उप निरीक्षक फोन करती और मजदूर संगठन ‘आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन’ के उत्तराखंड राज्य सचिव केके बोरा और उसके पिता (जो करीब 80 वर्षीय बुजुर्ग हैं) का फोन नंबर मांगती है। महिला पत्रकार और केके दोनों जीवनसाथी हैं। महिला पत्रकार के यह पूछने पर कि मेरा फोन नं आपको कहां से मिला, महिला एसआई फोन पर अभद्रता पर उतर आई और धमकाने लगी। उसकी बातों से स्पष्ट था कि वह पत्रकार से बात कर रही है, लेकिन बावजूद इसके उसने अपने लहजे में किसी प्रकार का शिष्टाचार नहीं रखा।

अपने वरिष्ठ सहकर्मियों से सहयोग की अपेक्षा में बातचीत करने पर सहकर्मियों द्वारा मामले को आगे न बढ़ाने की सलाह दी गई। यही नहीं इस विषय पर जब महिला पत्रकार ने पुलिस उच्चाधिकारियों से मुलाकात कर मामले पर अपना प्रतिवाद दर्ज किया तो दो साथी पत्रकारों को छोड़ अन्य सहकर्मियों ने खामोशी बरती। यही नहीं तथाकथित प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र ने अपने पत्रकार से हुई बदसलूकी और उसके द्वारा दिए गए ज्ञापन पर एक कालम की खबर छापना भी उचित नहीं समझा।

दरअसल यह एक छोटी सी बानगी है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा आज किस तरह सत्ता के सामने पूरी तरह समर्पण कर चुका है और उसमें मौजूद पत्रकार भय और लालच में सत्ता और उसकी एजेंसियों के सामने आत्मसमर्पण कर वास्तविक रूप से पत्रकारिता में लगे अपने ही सहकर्मियों को व्यवहारिकता के नाम पर किसी भी तरह के अपमान या दमन को नजरंदाज करने की सलाह देते हैं या फिर उसे अकेला छोड़ दिया जाता है। ऐसे प्रबुद्ध जनों को हिटलर के दौर में फासीवादी संघर्ष से जुड़े कवि पास्टर निमोलर की कविता को याद रखना चाहिए-

पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था

फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था

फिर वे यहूदियों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता

  • गिरिजा पाठक

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