Tuesday, October 26, 2021

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नेहरू की बनाई नींव पर खड़ी हुई भारतीय लोकतंत्र की बुलंद इमारत

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एक बार नेहरू से किसी ने पूछा कि भारत के लिए उनकी विरासत क्या होगी, तो उन्होंने उत्तर दिया, “यकीनन स्वयं पर शासन करने में सक्षम चालीस करोड़ लोग।” ये लोकतंत्र पर नेहरू का दृढ़विश्वास ही था। महत्वपूर्ण मुद्दों को समझने तथा सुविचारित विकल्प का उपयोग करने की गरीबों तथा निरक्षरों की क्षमता पर नेहरू को जबर्दस्त भरोसा था, जबकि स्वतंत्रता के समय से बहुत से लोग यह मानते थे कि भारत शीघ्र ही निरंकुश शासन के अधीन हो जाएगा और लोकतंत्र का प्रयोग असफल हो जाएगा। भारत ने राष्ट्र निर्माण के कठिन शुरुआती वर्षों के दौरान नेहरू द्वारा स्थापित सुदृढ़ और स्थिर संसदीय प्रणाली के कारण स्वयं को एकजुट बनाए रखा। उन्होंने देश के बंटवारे और उसके अनंतर सांप्रदायिक हिंसा को तथा भारी संख्या में शरणार्थियों के आगमन को चुनावों को स्थगित करने का बहाना नहीं बनाया।

वो लोगों में अपने और लोकतंत्र के प्रति इस कदर सोचने की आदत पैदा कर देना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि महिलाएं देश में समान नागरिक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह करें और इसीलिए विकसित और आधुनिक पश्चिम देशों के विपरीत, भारत में महिलाओं को पुरुषों के साथ ही मताधिकार प्राप्त हुआ। ये आजादी से काफी पहले यानी सन 1928 में ही कांग्रेस द्वारा उद्घोषित लक्ष्य भी था।

“भारत की महिलाओं को देश के निर्माण में समुचित भूमिका निभानी होगी। उनके बिना देश तेजी से प्रगति नहीं कर सकता। देश की प्रगति की स्थिति उसकी महिलाओं से जानी जा सकती है, क्योंकि वे ही देश के लोगों की निर्मात्री होती हैं।” उपरोक्त बातें उन्होंने सन् 1954 में कल्याणी में दिए एक व्याख्यान में कही थीं। इससे स्पष्ट है कि नेहरू देश और समाज के निर्माण में स्त्रियों को किस भूमिका में चाहते थे।

भाखड़ा नांगल में दिया नेहरू का व्याख्यान तो एक माइलस्टोन है। उस व्याख्यान से पता चलता है कि नेहरू किस तरह का आधुनिक भारत बनाना चाहते थे। वो उत्पादन मनुष्यता के लिए करना चाहते थे। उनके लिए मनुष्य का विकास ही राष्ट्र का विकास था। उन्होंने कहा था, “मेरे लिए आज ये स्थान ही मंदिर, गुरुद्वारे, गिरिजाघर, मस्जिद हैं, जहां इंसान दूसरे इंसानों और कुल मिला कर मानवता के हित के लिए मेहनत करते हैं। वे आज के मंदिर हैं। किसी मंदिर या किसी विशुद्ध पूजास्थल के बजाय इन महान स्थलों को देख कर मैं, यदि मैं यह शब्द इस्तेमाल करूं, अधिक धार्मिक महसूस करता हूं। ये पूजास्थल हैं, क्योंकि हम यहां किसी चीज को पूजते हैं; हम भारतीयों को तैयार करते हैं; हम लाखों भारत का निर्माण करते हैं और इसलिए यह एक पावन कार्य है।”

आधुनिक भारत के निर्माता प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू स्टेट्समैन होने के बावजूद विपक्षियों के निशाने पर रहे हैं। पर पिछले छह साल से तो वो सत्ता के निशाने पर हैं। अजीब विडंबना है कि उनकी चाल-ढाल, चलन, पहनावे-ओढ़ावे तक में नकल करने वाला रात दिन उनको पानी पी-पी कर कोसता आया है। हर किसी ने अपने चाल चरित्र और विचार के मुताबिक नेहरू पर हमला किया। वामपंथी आरोप लगाते हैं, नेहरू का समाजवादी मॉडल एक धोखा था और नेहरू ने ‘नेहरूवियन समाजवादी  मॉडल’ की आड़ में देश में पूंजीवाद को थोप दिया, लेकिन आरोप लगाते समय लोग यह भूल जाते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों में, पूरा विश्व पूर्वी और पश्चिमी प्रतिद्वंद्वी शक्ति में बंट गया था।

नेहरू ने उस समय अमेरिका का विरोध करके नवआज़ाद देश को गुटनिरपेक्ष देश के अगुआ के रूप में खड़ा किया था, जब अमेरिका हिरोशिमा और नागासाकी शहरों का सर्वनाश करके महाशक्ति बना पूरे विश्व को पूंजीवाद का झंडा उठाने के लिए बाध्य कर रहा था। जबकि रूस दूसरे विश्वयुद्ध की भारी कीमत चुका कर खुद को फिर से खड़ा करने की सोच ही रहा था। भारत के लिए और उससे अधिक नेहरू के लिए यह जरूरी था कि वह नवोदित भारतीय राष्ट्र को, कार्य की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए, सैन्य गुटों तथा गठबंधनों से बाहर रखें।

ये नेहरू की दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने मार्शल प्लान के तहत सहायता स्वीकार नहीं की, ताकि विदेश नीति संबंधी मामलों पर भारत की स्वतंत्रता पर आंच न आए। अपने प्रधानमंत्री काल में विदेश विभाग हमेशा नेहरू के पास रहा और इसी दौरान उन्होने मार्शल टीटो, कर्नल नासिर और सुकार्णो के साथ मिल कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी जो काफ़ी प्रभावी रहा। गुट-निरपेक्षता की नेहरू की नीति कोई निष्क्रियता की नीति नहीं थी, इसका अर्थ समान दूरी या अलगाव कतई नहीं था। बल्कि एक सक्रिय तथा गतिशील नीति थी, इसका अर्थ था निर्णय तथा कार्य में स्वतंत्रता।

जिसके तहत भारत संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों के प्रति मजबूती से प्रतिबद्ध एवं विश्व में शांति की स्थापना के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर था। इसी के तहत भारत ने गाजा पट्टी तथा कांगो में शांति रक्षा के लिए सैनिक भेजे। भारत ने आणविक हथियारों तथा उनके समुद्र अथवा वायुमंडल में परीक्षण के विरुद्ध अथक अभियान चलाए। नेहरू की ‘गुट निरपेक्ष’ नीति ने ही 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नेहरू ने संविधान में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को शामिल करके देश को समाजवादी मार्ग की दिशा में उन्मुख किया। 1955 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक आवडी अधिवेशन में कांग्रेस ने स्वयं को औपचारिक रूप से समाज के समाजवादी स्वरूप का समूह घोषित किया। बता दें कि यह अधिवेशन, द्वितीय पंचवर्षीय योजना की शुरुआत के समय हुआ था। उसके बाद से संसाधनों का व्यापक उपयोग, तीव्र औद्योगिकीकरण तथा समतापूर्ण वितरण की प्राप्ति राष्ट्र की प्राथमिकताएं बन गए।

दो सौ वर्षों तक शोषित समाज में पूंजी के निर्माण का कार्य एक महती कार्य बन गया था, जिसे केवल निजी क्षेत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था। योजना निर्माण से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप सीमित संसाधनों के आवंटन में मदद मिली। नियंत्रित अर्थव्यवस्था की तुलनात्मक उपयोगिता को उन दिनों व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता था। नेहरू के प्रयासों ने निजी पहल को हतोत्साहित नहीं किया। निजी क्षेत्र विशेषकर कृषि तथा लघु और मध्यम उद्योगों में, अहम भूमिका निभाता रहा।

कहीं न कहीं नेहरू महात्मा गांधी के उस हृदय परिवर्तन वाले सिद्धांत से प्रभावित थे। तभी तो उनके समाजवाद में पूंजीपतियों के लिए भी जगह थी। वास्तव में, स्वतंत्रता के शुरुआती दिनों में, आर्थिक प्रगति लाने में सरकार की प्रमुख भूमिका के विचार का निजी क्षेत्र ने भी समर्थन किया था। इसके अलावा बहुत से निजी क्षेत्र की कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों से भारी सहयोग लेकर अपने-अपने क्षेत्र की विशाल कंपनियां बन गईं।

नेहरू संपूर्णत: पंथनिरपेक्ष थे। वर्षों बाद, फ्रांसीसी लेखक आंद्रे मालरॉक्स ने नेहरू से पूछा कि उनका सबसे कठिन कार्य कौन-सा रहा, तो उन्होंने उत्तर में कहा, “मैं समझता हूं कि एक न्यायपूर्ण राष्ट्र की न्यायोचित साधनों से स्थापना…’ और…….., ‘शायद एक धार्मिक देश में पंथनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना। इसी पंथ निरपेक्षता के चलते नेहरू का दूसरा सबसे बड़ा विरोधी आरएसएस रहा है, जो नेहरू के जीते जी अपने नस्लवादी सांप्रदायिक मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका। नेहरू के समाजवादी और पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते ही वो आज हर जगह सत्ता में होने के बावजूद देश को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं कर सके। आरएसएस तमाम तरह के भ्रामक तथ्यों और झूठी खबरों के जरिए नेहरू के चरित्रहनन की कोशिशों में लगा रहता है। अपनी वैचारिक संकुचितता के चलते वो नेहरू की प्रगतिशीलता को उनका चरित्रदोष साबित करके उन्हें देशवासियों की आंखों में वूमनाइजर साबित करने की कोशिशें लगातार कई सालों से करता आया है।

इधर वॉट्सएप जैसे सोशल मीडिया तो उनके इस हरकत के लिए वरदान साबित हुई हैं। इधर हाल के दिनों में नेहरू को मुसलमान साबित करने के लिए एक झूठी कहानी का सहारा लेकर खूब वायरल किया गया। इसके अलावा उनके कपड़े धुलने पेरिस जाते हैं जैसी गल्प बातें भी जनमानस में संघ ने ही बैठाई हैं। ये लोग देश के बंटवारे से लेकर कश्मीर समस्या तक देश की हर परेशानी के लिए नेहरू को जिम्मेदार मानने वाले हैं। नेहरू का सबसे बड़ा कुसूर ये है कि उन्होंने इस देश में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरे जमा दी हैं कि लोकतंत्र में तनिक भी आस्था न रखनेवाले आरएसएस के लिए उसे उखाड़ना नामुमकिन सा है।

जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैय्यर (उस समय नेहरू के सूचना अधिकारी थे) के मुताबिक नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित एक बार शिमला के सर्किट हाउस में ठहरीं। वहां रहने का बिल 2500 रुपये आया। वह बिल का भुगतान किए बिना वहां से चली आईं। तब हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब का हिस्सा होता था और भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री थे। उनके पास राज्यपाल चंदूलाल त्रिवेदी का पत्र आया कि 2500 रुपये की राशि को राज्य सरकार के विभिन्न खर्चों के तहत दिखला दिया जाए। सच्चर के गले यह बात नहीं उतरी। उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन झिझकते हुए नेहरू को पत्र लिख डाला कि वही बताएं कि इस पैसे का हिसाब किस मद में डाला जाए। नेहरू ने तुरंत जवाब दिया कि इस बिल का भुगतान वह स्वयं करेंगे। उन्होंने यह भी लिखा कि वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते, इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगे। नेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे।

नेहरू सही मायने में लोकतांत्रिक नेता थे और लोकतंत्र को मजबूत करने की उनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चाणक्य के छद्मनाम से ‘द राष्ट्रपति’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताते हुए लिखा, “नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वो सीजर हो जाए।” इतना ही नहीं मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील करते हुए कहा, “डोंट स्पेयर मी, शंकर।” फिर कार्टूनिस्ट शंकर ने नेहरू पर जो तीखे कार्टून बनाए वो बाद में इसी नाम ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’ से प्रकाशित हुए।

नेहरू समझते थे कि एक मजबूत विपक्ष न होने का अर्थ प्रणाली में बड़ी खामी होता है, इसीलिए नेहरू सत्ता में रहते हुए भी लगातार विपक्ष को मजबूत करने के बारे में सोचा करते थे। ये उनकी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरे विश्वास और सतत् चिंतनशील रहने को दर्शाता है। उन्होंने कहा भी था, “मैं नहीं चाहता कि भारत ऐसा देश बने जहां लाखों लोग एक व्यक्ति की ‘हां’ में हां मिलाएं, मैं एक मजबूत विपक्ष चाहता हूं।” नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीतकर संसद में जरूर पहुंचे, जबकि लोहिया हर मौके पर नेहरू पर जबरदस्त हमला बोला करते थे। एक बार लोकसभा के चुनाव में फैजाबाद सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार थे बाबा राघवदास और उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के आचार्य नरेंद्र देव।

कांग्रेस ने फैजाबाद में नेहरू की सभा तय कर दी। जब नेहरू को पता चला तो बोले, कहां बाबा राघव दास और कहां आचार्य नरेंद्र देव। दोनो लोगों की कोई तुलना हो ही नहीं सकती। आचार्य नरेंद्र देव भले ही कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हों लेकिन उनके खिलाफ़ प्रचार करने के लिए मेरे जाने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। कार्यक्रम निरस्त करो। वर्ना अगर मैं गया तो बाबा राघवदास के बजाय आचार्य नरेंद्र देव के पक्ष में भाषण दूंगा। ऐसे तो थे नेहरू, जो विरोधी की राजनीतिक क्षमता और विद्वता का इस हद तक आदर करते थे के चुनाव में उसके खिलाफ प्रचार तक नहीं करने जाते थे।

इतना ही नहीं उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंज़ूर किया और उसमें भाग लिया, लेकिन फिर केरल का जिक्र आते ही नेहरू का लोकतंत्रविरोधी चेहरा भी दिखता है। भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में साल 1957 में चुनी गई, लेकिन राज्य में कथित मुक्ति संग्राम के बहाने तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1959 में इसे बर्खास्त कर दिया। जो लोग नेहरू पर देश का बंटवारा कराने का आरोप लगाते नहीं अघाते वो लोग शायद नहीं जानते कि नेहरू की कैबिनेट ने ऐसा कानून पास किया था, जिसने देश को हमेशा के लिए अखंड बना दिया, जिसने देश के तमाम हिस्सों में उठ रही अलगाववाद की मांग को एक झटके में नस्तोनाबूत कर दिया था। वरना ‘द्रविड़नाडु’ के नाम से भारत के दक्षिण में भारत के कुल क्षेत्रफल का एक तिहाई बराबर हिस्से जितना अलग देश होता।

सन् 1963 में सोलहवें संविधान संशोधन द्वारा, किसी भी राजनीतिक दल के लिए अलगाववाद की मांग को अवैध घोषित कर दिया गया। इस बिल में ही इस बात को शामिल किया गया कि संवैधानिक पद पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति, संगठन के लिए अखंड भारत की संप्रभुता की शपथ लेनी होगी। ये वो बिल था, जिसने दक्षिण भारतीय राजनीतिक पार्टियों के लिए ‘द्रविड़नाडु’ की मांग के रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया। उनकी अगुवाई में कैबिनेट ने 5 अक्टूबर 1963 को संविधान का 16वां संशोधन पेश कर दिया, जिसमें देश की अखंडता की कसम हर अलगाववाद की मांग पर भारी पड़ी।

इसमें इस शर्त को भी शामिल किया गया कि कोई भी राजनीतिक दल भारत देश में तभी राजनीति कर पाएगा, जब वो भारत की अंखडता को स्वीकार करेगा। संविधान के इस संशोधन के बाद द्रविड़ कड़गम और मुनेत्र कड़गम जैसी पार्टियों को अपने पार्टी संविधान में संशोधन करना पड़ा और द्रविड़नाडु की मांग को हमेशा के लिए जमीन में दफ्न कर देना पड़ा। ये जवाहरलाल नेहरू की वो सफलता थी, जिसके लिए अंखड भारत के पुरजोर समर्थक हमेशा उनके ऋणी रहेंगे।

इसके बाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था तथा कल्याणकारी राज्य महत्त्वपूर्ण संकल्पना के रूप में उभरे। योजना आयोग की स्थापना, सार्वजनिक क्षेत्र का उभार, भू-हदबंदी, औद्योगिक एकाधिकार पर विनियम, राजकीय व्यवसाय, ये सभी नेहरू के बहुआयामी प्रयासों का परिणाम थे। नेहरू ने विकास कार्यक्रमों पर राष्ट्रीय तथा अंतर-प्रांतीय सहमति प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय विकास परिषद् की संस्था की भी स्थापना की। राष्ट्रीय विकास परिषद का उल्लेख कार्यरत संघवाद के उदाहरण के रूप में किया जाता है।

निर्विवाद रूप से पंडित जवाहरलाल नेहरू बीसवीं सदी के महान विश्व नेताओं में से एक हैं। विषम और दुरूह परिस्थितियों के समक्ष प्राप्त भारतीय लोकतंत्र, वयस्क मताधिकार, संप्रभु संसद, मुक्त प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका नेहरू द्वारा भारत को दिया सबसे स्मरणीय स्मारक है। उनके नेतृत्व में भारतीय राष्ट्र की संकल्पना ने साकार रूप ग्रहण किया। साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष के अप्रतिम योद्धा, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक, अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग के अप्रतिम नायक तथा भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाले राजनीतिक शिल्पी नेहरू अपने सिद्धांतों, वैचारिकी तथा उपलब्धियों की वजह से भी जाने जाते हैं। आज़ादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ भारत के नवनिर्माण करने, लोकतंत्र को स्थापित करने और उसे मज़बूत बनाने में नेहरू ने जो महती भूमिका निभाई उसके तईं आधुनिक भारत हमेशा उनका ऋणी रहेगा।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव का लेख।)

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