मौत की प्रयोगशाला बनकर रह गया है कोरोना का इलाज

आगरा (उत्तर प्रदेश) पारस अस्पताल में कोराना के गंभीर मरीजों को मारने के लिए जो माकड्रिल किया गया उससे स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना महामारी को डॉक्टरों ने एक प्रयोगशाला के रूप में लिया। कोरोना मरीजों के साथ लगातार प्रयोग किये गये। जगजाहिर है कि मॉकड्रिल किसी आने वाले संकट से निपटने के लिए किया जाता है। पारस अस्पताल में तो मरीजों के जान लेने के लिए यह मॉकड्रिल किया गया मतलब संकट को और बढ़ाने के लिए।

मोदी सरकार और भाजपा शासित प्रदेश सरकारों ने अपने भोंपू मीडिया के माध्यम से देश में ऐसा माहौल बना दिया है कि इन राज में आंख, कान, दिमाग सब बंद रखो। बस जो बोला जाए उसको सुनों और उस पर अमल करो। यही वजह है कि पढ़े लिखे समाज में जो पेशा विज्ञान की देन है उस पेशे से जुड़ा डॉक्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में यह कहते हुए सुनाई पड़ रहा है कि ‘दिमाग मत लगाओ और मॉकड्रिल कर दो। इससे हम समझ जाएगा कि कौन मरेगा और कौन नहीं।’ जिस मरीज को आक्सीजन की जरूरत पड़ी उसके लिए पांच मिनट आक्सीजन रोकने का मतलब पांच मिनट सांस रोकना है। वह भी तब जब मरीज को सांस लेने में दिक्कत महसूस हो रही हो। मतलब गंभीर मरीजों की हत्या कर देना। जिस अस्पताल में मरीज जिंदगी मांगने गया उस अस्पताल ने उसे मौत दे दी। मॉकड्रिल के इस खेल में जिन 22 मरीजों ने छटपटाते हुए दम तोड़ा है। इनकी हत्या का जिम्मेदार न केवल अस्पताल प्रबंधन और उसके डॉक्टर हैं पर बल्कि शासन और प्रशासन भी है। आखिर एक निजी अस्पताल ने मरीजों की जान लेने का इतना बड़ा दुस्साहस कर लिया?


दरअसल भारत में कोरोना महामारी एक प्रयोगशाला बनकर रह गई है। न सरकार कुछ पता है और न ही डॉक्टरों को। मरीजों के इलाज में बस प्रयोग पर प्रयोग ही होते रहे। जो डॉक्टर रेमडेसिवर इंजेक्शन और प्लाज्मा थेरेपी को रामबाण बता रहे थे उन्हीं डॉक्टरों ने इन दोनों को कोरोना के इलाज में कारगर न बताते हुए हटा दिया। कोरोना मरीजों के इलाज में मलेरिया की दवा हाईड्रोक्सीक्लोक्वीन का इस्तेमाल भरपूर किया गया। अब हाईड्रोक्सीक्लोक्वीन को भी कोरोना के इलाज में कारगर नहीं माना जा रहा है। मतलब कोरोना के मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ किया जाता रहा। उन्हें गलत दवाई दी जाती रही और उनकी हत्या की जाती रही। कितने मरीज तो ऐसे होंगे जो अपने परिजनों को अपनी पीड़ा बताना चाहते होंगे। ऐसे भी कितने डॉक्टर होंगे जिन्हें डॉक्टरों के रवैये से अपनी जान को खतरा होगा पर कोरोना के इलाज में ऐसी व्यवस्था बना रखी थी कि परिजनों को मरीजों से मिलने ही नहीं दिया जा रहा था। जो पेशा भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात हो। उस पर इन परिस्थितियों में कैसे विश्वास किया जा सकता है। इन परिस्थतियों में भी मरीजों की किडनी या फिर दूसरे अंगों के निकालने से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी कोरोना महामारी में भी मरीजों की किडनी निकालने के आरोप लगे हैं। जब कोरोना से मरे व्यक्ति का शव परिजनों को सौंपा ही नहीं गया तो फिर कौन देखेगा उसका कौन सा अंग सुरक्षित है।
कोरोना महामारी में इलाज की समीक्षा की जाए तो घर में रहकर इलाज कराने वाले लाखों मरीज पूरी तरह से ठीक हुए हैं। यह अस्पतालों द्वारा बनाये गये हालात ही थे कि अस्पताल में जाने का मतलब तो लोग मौत ही मानने लगे थे। ऐसे कितने मामले हुए हैं कि ठीक-ठाक बात कर रहे आदमी को थोड़ी देर बाद मृत घोषित कर दिया गया।
यह कोरोना मरीजों की जान से खिलवाड़ ही है कि कभी कोई सी दवा तो कभी कोई सी। रेमडेसिवर और प्लाज्मा थेरेपी के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना मरीजों के इलाज के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, आइवरमेक्टिन, डॉक्सीसाइक्लिन समेत कई दवाओं पर रोक लगा दी है, जबकि इससे पहले इन दवाओं कोरोना मरीजों पर जमकर इस्तेमाल किया जा रहा था। केंद्र सरकार की ओर से जारी नई गाइडलाइंस के मुताबिक, जिन मरीजों में कोरोना संक्रमण के लक्षण नजर नहीं आते या हल्के लक्षण हैं, उन्हें किसी तरह की दवाइयां लेने की जरूरत नहीं है। ये ही मंत्रालय किसी भी तरह के बुखार को कोराना मानकर चल रहा था। लगभग हो भी यही रहा था कि थोड़ा सा भी बुखार होने पर जिस व्यक्ति ने कोरोना का टेस्ट करा लिया वह पॉजिटिव ही निकला। इसे गलत दवाओं का साइड इफेक्ट ही कहा जाएगा कि कोरोना से ठीक हुए लोगों में ब्लैक, व्हाइट और येलो फंगस हो रहा है। कितने लोगों की आंखें निकालने पड़ी, कितने लोगों ने दम तोड़ दिया और कितने बीमारी की चेपट में हैं।


मोदी सरकार और उसके समर्थक भले कोरोना से जीतने दावा करते हुए इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देने में लग गये हों पर जमीनी हकीकत यह है कि कोरोना अभी गया नहीं कि कोरोना वायरस के बाद महामारी बनी फंगस बीमारी ने विकराल रूप ले लिया है। इस बीमारी ने देश के 28 राज्यों में पैर पसार लिये हैं। खुद स्वास्थ्य मंत्रालय 28 राज्यों में 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आने की बात कर रहा है। करीब 300 मरीजों की मौत होने की बात कही जा रही है।


यह पूरी दुनिया के लिए मंथन का विषय है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति के साथ फैलने के पीछे की वजह और इसका इलाज डेढ़ साल भी एक पहेली बना हुआ है। पूरी दुनिया वैक्सीन के भरोसे है। यह भी जमीनी हकीकत है कि भारत में तो डबल डोज लेन के बाद भी कई लोगों की मौत हुई है। अभी दुनिया के वैज्ञानिक इस नतीजे पर भी नहीं पहुंच पाये हैं कि यह प्राकृतिक आपदा है या फिर जैविक हथियार। हालांकि अग्रणी वैज्ञानिकों के एक ग्रुप  का कहना है कि कोरोना वायरस के प्रयोगशाला से आकस्मिक फैलने की घटना को खारिज नहीं किया जा सकता है। ये वैज्ञानिक विश्व स्वास्थ्य संगठन के चीन को क्लीन चिट देने पर आश्वस्त नहीं हैं। 18 वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी भी अधिक जांच करने की जरूरत है, जिससे महामारी की उत्पत्ति को निर्धारित किया जा सके।


गौरतलब है कि नोवेल कोरोना वायरस 2019 के अंत में चीन में उजागर हुआ था। उसने लाखों लोगों की जिंदगी छीन ली है और करोड़ों लोगों को बीमार कर दिया है। इसके अलावा, दुनिया की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। चीनी वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से लिखी गई अपनी अंतिम रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम ने कहा है कि वायरस का ट्रांसमिशन शायद चमगादड़ों से इंसानों में दूसरे जानवरों के जरिए हुआ हो और एक कारण के रूप में ‘अत्यंत संभावना नहीं है कि ये लैब से फैला हो। डब्ल्यूएचओ के खाद्य सुरक्षा एवं जंतु रोग विशेषज्ञ पीटर बेन एम्बारेक ने कहा था कि चीन की प्रयोगशाला से कोरोना वायरस के फैलने की आशंका नहीं है। वैज्ञानिकों ने मांग की है कि बौद्धिक रूप से कठोर और निष्पक्ष जांच होने की जरूरत है। 

(चरण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 8, 2021 7:53 pm

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