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बंगाल में कास्ट की नहीं क्लास की थी लड़ाई

बंगाल में ‘खेला होबे का अब खेला शेष’ हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से 292 सीटों की गिनती हो गई है। दो सीटों पर 16 मई को वोटिंग होगी। बाकी की 292 सीटों में 213 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल की है। भाजपा ने अपने पैर को और पसारते हुए 77 सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं संयुक्त मोर्चा की झोली में एक भी सीट नहीं आई, एक सीट कांलिपोंग के निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती और एक सीट राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी की झोली में गई है।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का आगाज 27 मार्च को हुआ और आखिरी चरण का मतदान 29 अप्रैल को डाला गया, जिसके नतीजे आने के साथ ही तीसरी बार टीएमसी ने राज्य में अपनी सरकार बना ली। साल 2011 में 34 साल बाद हुए सत्ता परिवर्तन को 10 साल बाद ही बीजेपी ने बदलने की कोशिश की, लेकिन इस कोशिश में वह नाकाम साबित हुई है। बीजेपी को जितनी भी सीटें मिली हैं, वह सभी लेफ्ट और कांग्रेस की हैं।

चुनाव के दौरान जब हमने आसनसोल के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीन सुमन से बात की थी, तो उन्होंने बंगाल की राजनीति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जो 18 सीटें भाजपा को मिली थीं, उनमें वोट देने वाले ज्यादातर वही लोग थे जो लेफ्ट के समर्थक थे और तृणमूल से खुश नहीं थे। ऐसे वक्त में उन्हें लेफ्ट ग्रांउड पर नहीं दिखा इसलिए विकल्प के तौर पर बीजेपी को ही बेहतर समझा और वहां चले गए। इस बात को बीजेपी पहले ही समझ गई थी, इसलिए उसने बंगाल में धुव्रीवकरण करने की पूरी कोशिश पर वह नाकाम रही, क्योंकि बंगाल में लड़ाई कास्ट की नहीं क्लास की है।

धुव्रीकरण में नाकाम रही बीजेपी
पिछले साल जिस वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे, गृहमंत्री अमित शाह बिहार छोड़ बंगाल का दौरा कर रहे थे। एक बंगाली घर में खाना भी खाया। बांग्ला में ट्वीट किया और यहीं से बंगाल पर फतह पाने की तैयारी शुरू हो गई। यहीं आकर गृह मंत्री ने बंगाल में 200 सीट पर फतह पाने का एलान कर दिया। जिन 200 सीट के जीतने का दावा भाजपा कर रही थी, उसमें प्रदेश की 70 प्रतिशत हिंदू आबादी को ध्यान में रखते हुए कहा था। इसी 70 प्रतिशत आबादी पर भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण करने की कोशिश की, लेकिन बंगाल की जनता ने अपनी संस्कृति सेक्युलर छवि का परिचय देते हुए बीजेपी की 200 सीट के दावे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। जिस हिंदू आबादी को भाजपा अपना कह रही थी, उसी हिंदू आबादी ने तृणमूल को 213 सीटों के साथ एक बार फिर राज्य में मजबूत बनाया है।

बंगाली बनाम गैर बंगाली का लड़ाई
साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान दीदी ने साफ आदेश दे दिया था कि अगर किसी को बंगाल में रहना हो तो बांग्ला बोलना ही पड़ेगा। इस बात से साफ हो जाता है कि ममता बनर्जी बंगाली अस्मिता को लेकर भी बहुत ज्यादा ही कान्शेस थीं। इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप ने बताया था कि बंगाल में बंगाली अस्मिता को बरकार ऱखने के लिए बंगाल के हर दुकानदार को यह आदेश दिया था कि वह अपनी दुकान का नाम बांग्ला में लिखे। इतना ही नहीं अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो उसे ट्रेड लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। वहीं दूसरी ओर नैहाटी में जब ममता बनर्जी के काफिले के सामने कुछ लोगों ने जय श्री राम का नारा लगाया था तो दीदी ने उन्हें बाहरी करार दे दिया था, जिसको बीजेपी ने भुनाने की पूरी कोशिश की। भाजपा के बड़े नेता अपनी रैलियों के दौरान इस बात को उठाते रहे कि दीदी ने बिहार और यूपी वालों को बाहरी करार दिया है, लेकिन अगर बात करें भाषीय आधार की तो हिंदी बेल्ट की ज्यादातर सीटों पर हिंदी बेल्ट के ही उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है।

पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्दवान जिले का आसनसोल इलाका हिंदी बेल्ट है, जहां लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिंदी भाषीय हैं, जिसमें लगभग 15 प्रतिशत हिंदी, उर्दू बोलने वाली मुस्लिम आबादी भी है। इसके क्षेत्र में लगभग छह सीटें हैं। इसमें जामुड़िया (हरेराम सिंह) और कुल्टी (डॉ. अजय पोद्दार) विधानसभा में ही हिंदी भाषीय विजेता विधायक हैं। अन्य सीटों पर जहां भी बंगालियों की संख्या थोड़ी अच्छी है, वहां बंगाली उम्मीदवार ने जीत हासिल की है, इसलिए बंगाल में लड़ाई हिंदू-मुस्लिम की नहीं बल्कि बंगाली बनाम गैर बंगाली वोटर्स की थी, क्योंकि यहां के बंगालियों को साइलेंट वोटर्स कहा जाता है। बंगाली वोटर्स जिस तरफ, जीत उस तरफ, और चुनाव के दौरान कई सर्वों में बंगालियों ने साफ तौर पर जाहिर कर दिया था कि वह बंगाल में किसी बंगाली को ही अपना प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं। 

बंगाल की महिला हैं ममता के साथ
प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही नंदीग्राम पर फतह नहीं पा सकीं, लेकिन राज्य में तृणमूल को जिताने में बंगाल की आधी आबादी का भी हाथ है।  प्रदेश में लगभग तीन करोड़ महिला वोटर्स हैं। उन्होंने दीदी को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने में अहम रोल अदा किया है। महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर वोट किया है। चुनाव के दौरान हमने कई महिलाओं से बात की। उन्होंने साफ तौर पर जाहिर कर दिया था कि वह दीदी को ही अपना तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाना चाहती हैं।

ज्योत्सना नाम की महिला किसी के घर में काम करती हैं। वह कहती हैं कि मेरी चार बेटियां हैं मैं तो पढ़ी नहीं हूं, लेकिन दीदी ने कई तरह की सुविधा दी है। मेरी बेटी को स्कूल से साइकिल मिली है। एक को 2500 हजार रुपये मिला है। दीदी ने इतनी सारी सुविधा दी है, इसलिए वोट दीदी को ही दूंगा। कुलवंती कौर नाम की एक महिला का कहना था कि हमारे लिए गर्व की बात है कि एक महिला हमारे राज्य का प्रतिनिधत्व करती है। मैं तो चाहती हूं कि आगे भी दीदी ही हमारे राज्य की मुख्यमंत्री रहें। सुलोचना नाम की एक महिला का कहना है कि अगर दीदी न होती तो उनकी बेटी की  शादी नहीं हो पाती। दीदी की रूपश्री योजना के तहत 25 हजार रुपये मिले। इससे वह अपनी शादी के कई खर्चों को कर पाईं।

महिलाओं का इस तरह का समर्थन ही दीदी को एक बार फिर राज्य की मुख्यमंत्री बनाने जा रहा है। बंगाल की महिलाएं सजग हैं। वह हमेशा अपने मुद्दों को लेकर ही वोट करती हैं। दीदी ने अपनी घोषणा पत्र में भी महिलाओं के लिए एक स्कीम रखी है, जिसके तहत घर की मुखिया को प्रति महीना 500 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिला को 1000 रुपये दिया जाएगा। यही सारे मुद्दे दीदी को राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने जा रहे हैं।

(पश्चिम बंगाल से पूनम मसीह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on May 4, 2021 12:09 pm

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