Wednesday, April 17, 2024

किसानों का यह आंदोलन अब राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है

कुछ समय पहले बिहार के सुदूर इलाके के एक अनुभवी अध्यापक-मित्र से बात हो रही थी। किसान आंदोलन पर संक्षिप्त चर्चा के बाद उन्होंने एक चौंकाने वाली सूचना दी। उन्होंने बताया कि उनके इलाके के लोगों में अच्छा-खासा हिस्सा अडानी-अंबानी के उत्पादों से दूरी बना रहा है। उनके मुताबिक अडानी ग्रुप के एक ब्रांडेड खाद्य तेल की मांग बाजार में अचानक घट गई है। इसी तरह  अंबानी ग्रुप के ‘जियो’ कनेक्शन को कुछ लोग लौटा रहे हैं, लेकिन लौटाने वालों से ज्यादा संख्या उन लोगों की है, जिन्हें इस बीच नया कनेक्शन लेना था। उन्होंने ‘जियो’ की बजाय किसी अन्य कंपनी की नेट-सेवा को प्राथमिकता दी।

यह सूचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक और मीडिया सर्किल में अब तक माना जा रहा था कि अडानी-अंबानी समूह के विरुद्ध किसान आंदोलनकारियों के किसी भी आह्नान का असर पंजाब और हरियाणा से बाहर हरगिज नहीं पड़ने वाला है। पर यहां तो बिहार के सुदूर इलाके में भी किसानों के आह्नान का असर दिख रहा है। ऐसा आह्वान और ऐसी परिघटना आजादी के बाद के भारतीय समाज में अभूतपूर्व है। मुझे याद नहीं, इससे पहले कभी किसी राजनीतिक या सामाजिक संगठन ने देश की किसी बड़े कॉरपोरेट कंपनी के उत्पादों के बहिष्कार का कभी एलान किया हो!

इससे किसान आंदोलन के बहुस्तरीय और बहुआयामी स्वरूप का ठोस संकेत मिलता है। जो लोग इसे महज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लड़ाई का पर्याय समझ रहे हैं, शायद वे इस आंदोलन को समझने में भूल कर रहे हैं। एमएसपी और मंडी (एपीएमसी) बचाने की लड़ाई के साथ कुछ ऐसे जरूरी सामाजिक-राजनीतिक सवाल भी नत्थी हैं, जो आर्थिक सुधारों के नाम पर हमारे समाज के विरुद्ध ढाये जा रहे जुल्मो-सितम से उभरे हैं। इनमें एक है- सत्ता के हमजोली बने कुछ खास कॉरपोरेट घरानों का संपूर्ण भारतीय उद्योग-बाजार पर बढ़ता एकाधिकार। इससे व्यापार जगत के आम या खास समूह भी बहुत खुश नहीं हैं। पर वे सत्ताधारियों और इन खास कॉरपोरेट घरानों के साझा ‘सर्वसत्तावाद’ के भय से अपना मुंह नहीं खोलते!

जब हम लोग बच्चे या किशोर थे, हमारे समाज और राजनीति में एक नारा बहुत चलता था। वह वामपंथियों या समाजवादियों के बीच ज्यादा लोकप्रिय था। नारा था- ‘टाटा-बिड़ला की सरकार नहीं चलेगी-नहीं चलेगी!’ हालांकि उन दिनों सरकार के शीर्ष पदों पर बैठा कोई भी बड़ा राजनेता टाटा या बिड़ला के निजी विमानों का इस्तेमाल अपने चुनावी-दौरों में नहीं करता था और न ही उनके पारिवारिक समारोहों में जा कर अनौपचारिक किस्म की तस्वीरें खिंचाता था। इन सबके बावजूद मौजूदा भाजपा सरकार के विरुद्ध ऐसा नारा कभी नहीं लगा- ‘अंबानी-अडानी की सरकार नहीं चलेगी-नहीं चलेगी!’ इस किसान आंदोलन के पार्श्व में न सिर्फ ऐसे नारे लग रहे हैं, अपितु इन दो बड़े कॉरपोरेट घरानों से मोदी सरकार के नाभिनाल रिश्तों को लेकर आम लोगों की जानकारी और जागरूकता भी बढ़ी है।

इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है, इसका पूरी तरह स्वतंत्र और गैर-पार्टी चरित्र! इसकी कमान संभाल रहे हैं किसानों के बीच से चुने प्रतिनिधि या किसान संगठनों के नेता! इनमें बुजुर्ग, युवा, हर जाति-बिरादरी-समुदाय के लोग और महिलाएं भी हैं। आंदोलन का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक स्वरूप शुरू से अब तक बरकरार है। शनिवार को आंदोलन का 24वां दिन रहा। अब तक 25 किसानों की मौत हुई है, जिसमें एक आत्महत्या भी शामिल है। ये मौतें धरना स्थल पर ठंड, किसी आकस्मिक शारीरिक परेशानी (ह्रदयाघात आदि) या आते-जाते हुई हैं!

आत्महत्या करने वाले संत बाबा राम सिंह ने किसानों की दुर्दशा से दुखी और सरकार की क्रूरता से आहत होकर अपने आपको खत्म कर लिया। मरने वालों में अगर बुजुर्ग किसान हैं, तो युवा और अधेड़ भी। इतनी बड़ी मानव-क्षति के बावजूद आंदोलनकारी पूरे संकल्प के साथ जमे हुए हैं। इस मायने में दुनिया का यह अभूतपूर्व सत्याग्रह है। सरकार की उपेक्षा और क्रूरता के बावजूद पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक!

इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं इसलिए विनम्रता पूर्वक कह सकता हूं कि सन् 1917 के जिस महान् चंपारन सत्याग्रह ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनाया, वह भी विषय, मुद्दा और जन हिस्सेदारी के स्तर पर उतना बड़ा आंदोलन नहीं था, जितना आज का यह किसान आंदोलन है, जो देश की राष्ट्रीय राजधानी के तीन तरफ चल रहा है! इसके अलावा देश के विभिन्न प्रदेशों में इसके समर्थन में धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं।

इस आंदोलन के बरअक्स एक बड़ा सवाल देश की निर्वाचित सरकार के चरित्र पर खड़ा होता है। क्या दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक समाज या देश में ऐसा संभव है कि सर्द रातों में किसान सड़क पर शांतिपूर्ण ढंग से अपना सत्याग्रह कर रहे हों और एक निर्वाचित सरकार उनकी कुछ भी सुनने को राजी न हो! उनकी सुनने के बजाय यहां तो सत्ताधारी दल के नेता और मंत्री-गण आंदोलनकारी किसानों के विरुद्ध निराधार आरोप लगा रहे हैं! उनके आंदोलन को बदनाम करने में दिन-रात लगे हुए हैं। लोकतांत्रिक दुनिया में ऐसा पहली बार देखा जा रहा है।

किसान आंदोलन अपने साथ अपनी संस्कृति, अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच, आर्थिकी, समाजशास्त्र और मानवीय आचरण भी सामने ला रहा है। इसके अलावा अब तो वह अपना मीडिया भी पेश कर रहा है। अब तक सिर्फ कुछ स्वतंत्र न्यूज पोर्टल और यू-ट्यूबर ही आंदोलन की खबरों को लोगों के सामने ला रहे थे। इधर ‘ट्राली टाइम्स’ नाम से एक नया अखबार भी प्रकाशित होने लगा है। ऐसे वैकल्पिक मीडिया मंचों का कवेरज बड़े अखबारों के मुकाबले ज्यादा प्रामाणिक और सटीक दिख रहा है।

आंदोलन का एक और पहलू बेहद उल्लेखनीय है। इसमें जाति-वर्ण, धर्म-संप्रदाय और लिंग-भेद की दीवारें टूट चुकी हैं। आंदोलन का बुनियादी आधार मेहनतकश किसान हैं। भारत में खेती-बारी के धंधे में हर समुदाय के लोग हैं पर प्रमुखता पिछड़े, दलित और मध्यवर्तीय जातियों की है। इनके साथ समाज के हर तबके के लोग खड़े दिख रहे हैं। इन सबको लगने लगा है कि खेती-बारी का पूरा धंधा अगर कॉरपोरेट घरानों के हाथ में गया तो हर जाति-वर्ण और समुदाय के लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे। इससे न सिर्फ एमएसपी-एपीएमसी के प्रावधान ध्वस्त होंगे, अपितु भारत की खाद्यान्न-सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। भारतीय खाद्य निगम का बंटाधार हो जाएगा।

कुछ ही समय बाद अनाज, खाद्य तेल और फल, साग-सब्जियों के दाम आसमान छूने लगेंगे। सरकार द्वारा पारित और लागू किए तीन कानूनों में एक हैः ‘आवश्यक वस्तु संशोधन कानून-2020।’ यह सन् 1955 के कानून में संशोधन करके सामने लाया गया है। अनाज, तेलहन-दलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज आदि को भाजपा सरकार ने आवश्यक वस्तु के दायरे से बाहर करके इनके संपूर्ण कारोबार को कॉरपोरेट और बड़े व्यापारियों के हवाले कर दिया है। उनके पास इन वस्तुओं के असीमित भंडारण, जखीरेबाजी और महंगे दाम पर बेचने जैसे अधिकार होंगे।

इसी तरह, दूसरा कानून है- कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम-2020। यह मंडी व्यवस्था को ध्वस्त ही नहीं करेगा, खाद्य-आपूर्ति के मामले में राज्य सरकारों के अधिकारों को भी अप्रासंगिक बनाएगा। तीसरे कानून-‘कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर करार अधिनियम-2020’ के जरिए अनुबंध या ठेके पर खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संरचनात्मक ढांचे के निर्माण का रास्ता साफ किया जाएगा। सिर्फ खेती-बारी का चरित्र ही नहीं बदलेगा, किसान की भूमिका भी सिमट जाएगी।

आम लोगों को इन तीनों कानूनों के खतरों से वाकिफ कराना असाधारण काम था। पर आंदोलनकारियों ने अपनी छोटी-छोटी सभाओं, पर्चों और संवादों से यह असंभव या असाधारण सा दिखने वाला काम कर दिखाया। उनके साथ सहानुभूति रखने वाले कुछ ईमानदार और समझदार बुद्धिजीवियों और कृषि वैज्ञानिकों ने भी इस बड़े मिशन में उनका साथ दिया। सरकार के पास इन किसानों की मांग मानने के अलावा अब कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। सिर्फ एक जिद है कि वह भारत के विशाल खाद्य-बाजार को बड़ी वैश्विक कंपनियों और भारत के कुछ कॉरपोरेट घरानों के हवाले करके ही मानेगी! इस जिद का जवाब शेष जनता को देना है। किसान सब कुछ समझ रहा है। वे उन राजनीतिक पार्टियों की तरह नहीं हैं, जो अपने निजी स्वार्थ में सत्ताधारियों से आसान समझौते कर लेते हैं। किसानों ने सत्ता के सामने झुकने, टूटने या बिकने से साफ इनकार किया है

पूरे देश ने अखबारों और चैनलों के जरिय़े देख लिया है कि ये अलग ही धातु के बने हैं। आंदोलनकारी किसानों ने सरकार से बातचीत के दौर में भी उच्च सुरक्षा जोन में अवस्थित विज्ञान भवन जैसे इलीट सरकारी परिसर के अंदर सरकारी भोजन या चाय लेने से साफ इनकार किया था। वह सिर्फ एक दिखावा नहीं था। उसके पीछे संकल्प था। उन्होंने ऐसा करके अपने आंदोलन और अपना बिल्कुल नया चेहरा पेश किया। हर बैठक के दौरान बड़े-बड़े कनस्तर और टीन के डिब्बों में भरकर उनका भोजन सिंघू बार्डर के लंगरों से विज्ञान भवन जाता रहा। यह महज दिखावा नहीं था, इसमें सोच, संस्कृति, शालीनता और समझदारी दिखती थी।

आंदोलन के 24वें दिन भी उनका वही तेवर कायम है। उन्होंने अब तक जो भी कहा, उसे करके दिखाया है। वर्षों बाद भारतीय समाज में किसी आंदोलन का ऐसा नेतृत्व दिखा है, जिसके पास विचार के साथ स्वातंत्र्य, विनम्रता और प्रतिबद्धता है। संभवतः इसीलिए किसानों का यह आंदोलन अब पूरे समाज को प्रभावित करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन का आकार लेता जा रहा है। अगर केरल से कश्मीर, ओडिशा से गुजरात, गोवा से कर्नाटक और आंध्र से बिहार तक के लोगों तक इसका संदेश साफ सुनाई दे रहा है तो इसका मतलब यही है कि अब यह राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और कई चर्चित किताबों के लेखक हैं। एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर रहते राज्यसभा चैनल की शुरुआत करने का श्रेय आपको जाता है।)

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