Friday, October 22, 2021

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बंगाल के चुनावी बाजे में टॉलीवुड की डफली!

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भाजपा की बगिया में भी खिले हैं कुछ सितारों के गुल,

पर सितारों का गुलशन तो अभी भी तृणमूल का ही है।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के मौके पर टॉलीवुड का पूरी तरह राजनीतिकरण हो गया है। टॉलीवुड के सितारे पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में बंट गए हैं। भाजपा की बगिया में भी फिल्मी सितारों के कुछ गुल खिले हैं। अलबत्ता अभी भी गुलशन पर तो तृणमूल ही काबिज है। इस गुलशन के माली पद पर काबिज होने के लिए भाजपा ने बाबुल सुप्रियो को मैदान में उतारा है तो तृणमूल ने अपने पुराने माली अरूप विश्वास पर ही भरोसा जताया है।

टॉलीगंज के इस गुलशन पर पूरी तरह काबिज होने में भाजपा को थोड़ा झटका तो जरूर लगा है। टॉलीवुड के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता प्रसेनजीत चटर्जी के भाजपा में शामिल होने का ऐलान तो नहीं किया गया था लेकिन बड़ी तेजी से अफवाह जरूर फैलाई गई थी। बात यहां तक पहुंची कि प्रसेनजीत को एक बयान जारी करके कहना पड़ा उनकी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। दरअसल भाजपा प्रसेनजीत को तृणमूल कांग्रेस की अभिनेत्री सांसद मिमी चैटर्जी और नुसरत जहां के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती थी। खैर गुजरे हुए जमाने के हीरो मिथुन चक्रवर्ती भाजपा के लिए रोड शो कर रहे हैं तो तृणमूल के लिए गुजरे जमाने की हीरोइन जया बच्चन ने रोड शो करने की जिम्मेदारी उठा ली है। कोलकाता में बेहला पूर्व से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार एवं शिक्षा मंत्री पार्थो चटर्जी के खिलाफ भाजपा ने अभिनेत्री श्रवनती चटर्जी को मैदान में उतारा है। बेहला पश्चिम से कोलकाता नगर निगम की पूर्व मेयर शोभन चटर्जी की पत्नी रत्ना चटर्जी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। यहां याद दिला दें कि शोभन चटर्जी और रत्ना चटर्जी में तलाक का मुकदमा चल रहा है।

रत्ना चटर्जी के खिलाफ भाजपा ने अभिनेत्री पायल सरकार को उम्मीदवार बनाया है। एक और फिल्मी हस्ती रुद्रनील घोष भाजपा के उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ एक और फिल्मी हस्ती निर्देशक राज चक्रवर्ती तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। हाल ही में कई फिल्मी हस्तियां तृणमूल में शामिल हुई हैं जिनमें सायनी घोष और कौसानी मुखर्जी उल्लेखनीय है। इसके अलावा यश दासगुप्ता, हिरण चटर्जी और पापिया अधिकारी इस साल राजनीतिक दलों में नाम लिखवाने वालों में प्रमुख हैं। फिर भी जहां तक फिल्मी सितारों से बगिया सजाने का सवाल है तो तृणमूल की बगिया अभी भी ज्यादा गुलजार है। टॉलीवुड के बेहद सफल अभिनेताओं में से एक देव और बेहद सफल अभिनेत्रियों में से मिमी चक्रवर्ती और नुसरत जहां अभी भी तृणमूल में ही हैं। भाजपा की शुरुआत गुजरे जमाने की रूपा गांगुली और लॉकेट चटर्जी से हुई थी और अब इसमें विस्तार हुआ है।

दरअसल चुनावी मैदान में फिल्मी सितारों को उतारने की शुरुआत ममता बनर्जी ने की थी। उन्होंने संध्या राय, मुनमुन सेन, शताब्दी राय और तापस घोष जैसे फिल्मी सितारों को चुनावी मैदान में उतारा था। उनमें से कुछ ने तो राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों को पटखनी भी दे दी थी। अभिनेता देव इसके एक मिसाल हैं। मिमी चटर्जी ने तो जादवपुर लोक सभा सीट से माकपा के वरिष्ठ नेता एवं ख्याति प्राप्त एडवोकेट कोलकाता नगर निगम के मेयर रह चुके विकास रंजन भट्टाचार्य को पराजित कर दिया था। हालांकि मिमी चटर्जी ने राजनीति का ककहरा भी नहीं पढ़ा था। नुसरत जहां ने भी इसी तरह का कमाल 2019 के लोकसभा चुनाव में किया था। भाजपा ममता बनर्जी के इस कमाल को टुकुर टुकुर देखती रह गई थी, क्योंकि उसके पास गुजरे जमाने की रूपा गांगुली, लॉकेट चटर्जी और बाबुल सुप्रियो ही पूंजी थे। अब उसने टॉलीवुड में सेंध लगा ली है।

लेकिन बंगाल के टॉलीवुड की ऐसी शक्ल तो कभी थी ही नहीं। यहां के लोग राजनीतिक दल के समर्थक तो हुआ करते थे लेकिन राजनीति से फासला बनाए रखते थे। इतिहास के मुताबिक 1930 में टॉलीवुड में फिल्मी उद्योग की शुरुआत हुई थी। उस दौरान टॉलीवुड कांग्रेस का समर्थक हुआ करता था। बंगाल के लोक नायक उत्तम कुमार को भी कांग्रेस समर्थक के रूप में जाना जाता था। अब यह बात दीगर है कि उन्होंने कभी भी राजनीति की दहलीज पर कदम नहीं रखा था। इसके बाद टॉलीवुड की दुनिया के नाम को कुछ नामचीन फिल्म निर्माताओं और अभिनेताओं ने रोशन किया। उनमें ऋत्विक घटक, मृणाल सेन,  उत्पल दत्त और सौमित्र चट्टोपाध्याय का नाम उल्लेखनीय है। उनका रुझान वामपंथ की तरफ था, लेकिन कभी भी चुनावी मैदान में नहीं उतरे और न ही किसी चुनावी जनसभा को संबोधित किया। इसके बाद ज्योति बसु की सरकार में जब बुद्धदेव भट्टाचार्य सूचना और सांस्कृतिक मंत्री बने तो वाममोर्चा के साथ फिल्म और संस्कृति जगत का संबंध और भी मजबूत हो गया। इसके बाद जब नंदीग्राम फायरिंग की घटना घटी तो फिल्म और सांस्कृतिक जगत का एक बहुत बड़ा धड़ा वाममोर्चा से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस से जुड़ गया।

इसके बाद तो ममता बनर्जी ने 2009, 2011, 2014, 2016 और यहां तक कि 2019 के चुनाव में भी इसका भरपूर इस्तेमाल किया और उन्हें कामयाबी भी मिली। पर यहां एक सवाल बहुत मौजू है। आखिर दो राजनीतिक दलों में फर्क क्या होता है। निश्चित रूप से विचारधारा, सोच और नजरिए का फर्क होता है। इसी के आधार पर इन दलों के समर्थक और कार्यकर्ताओं की फौज तैयार होती है। जब हुस्न और शोखी विचारधारा पर काबिज हो जाती है तो विचारधारा जमींदोज हो जाती है। राजनीतिक दल विचारधारा के लिहाज से दिवालिए हो जाते हैं। तो क्या टॉलीवुड का माली बनने का संघर्ष इसी की शुरुआत है।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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