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यूएपीए की वैधता सुप्रीम कोर्ट में लंबित, सोने की तस्करी पर दो हाई कोर्ट का विपरीत फैसला

यूएपीए कानून 2019 एक बार फिर सुर्खियों में है। देश के राजनीतिक, सामाजिक और विधिक गलियारों में इस कानून को लेकर अक्सर विवाद उठते रहते हैं। जब भी यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तारी होती है, देशभर में एक नई बहस छिड़ जाती है। हाल ही में किसान आंदोलन के तहत 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा और सेलेब्रिटी ट्वीट विवाद के बाद इस कानून के तहत कुछ गिरफ्तारियां की गई हैं, जिन्हें लेकर देश की सियासत में उबाल है, लेकिन इस बार की सुर्खियां अलग हैं।

सोने की तस्करी में यूएपीए कानून के तहत गिरफ़्तारी जहां राजस्थान हाई कोर्ट ने सही ठहराया है वहीं, केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि सोने की तस्करी यूएपीए के दायरे में नहीं आती। 1967 के यूएपीए कानून में सिर्फ संगठन को आतंकी घोषित करने का प्रावधान था, जबकि संशोधन के बाद यूएपीए कानून 2019 की धारा 35 में यह साफ नहीं है कि किसी व्यक्ति को किस आधार या कारण से आतंकी घोषित किया जाएगा।

केरल हाई कोर्ट के जस्टिस ए हरिप्रसाद और जस्टिस एमआर अनिता की पीठ ने सोने की तस्करी से जुड़े एक मामले में 14 आरोपियों को दी गई जमानत के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने गुरुवार को कहा कि तस्करी को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत परिभाषित नहीं किया गया है। पीठ ने कहा कि इसके अलावा मामले में अदालत के समक्ष पेश किए गए सबूत प्रथम दृष्टया यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि आरोपियों ने आतंकी कृत्य किया है। एनआईए ने सोने की तस्करी की घटना के संबंध में आतंकी मामला दर्ज किया था, जो आमतौर पर सीमा शुल्क अधिनियम के दायरे में आता है।

पिछले साल जुलाई महीने में तिरुवनंतपुरम में एक राजनयिक कार्गो से 30 किलोग्राम सोना जब्त किया गया था, जिसके बाद एनआईए ने मामला अपने हाथ में लेते हुए कहा कि किसी तटीय स्थान से भारत में सोने की तस्करी से देश की आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है और यह यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकी कृत्य है। एनआईए ने सोने की तस्करी के मामले में आरोपियों के खिलाफ यूएपीए के तहत आरोप भी लगाए थे।

आरोपियों को दी गई जमानत बरकरार रखते हुए पीठ ने कहा कि हमें पता चला है कि तस्करी शब्द यूएपीए के तहत परिभाषित नहीं है। किसी एक कानून में घटित किसी विशेष अभिव्यक्ति की परिभाषा को दूसरे कानून में लागू नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह समान मामला नहीं हो। पीठ ने कहा कि वह निचली अदालत से सहमत हैं कि अदालत के समक्ष पेश किए गए सबूत प्रथम दृष्टया यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि आरोपियों ने आतंकी कृत्य किया है। पीठ ने कहा, ‘सोने की तस्करी सीमा शुल्क एक्ट के प्रावधानों के दायरे में आता है न कि यूएपीए की धारा 15 के तहत, जब तक कि सबूतों से यह सिद्ध नहीं हो जाए कि यह धमकी देने के इरादे से किया गया है या इससे देश की आर्थिक सुरक्षा को किसी तरह का खतरा है।

दूसरी और राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस सतीश कुमार शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, 1967 (यूएपीए) की धारा 15 के तहत आतंकी कृत्य की परिभाषा के तहत कवर किए गए देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने या धमकी देने के इरादे से सोने की तस्करी एक अपराध है। हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधि अधिनियम की धारा 15 (I) (iiia) के तहत आएगी। UAPA की धारा 15 (I) (iiia) में देश की आर्थिक सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने की धमकी या आशंका के साथ गतिविधियों का उल्लेख किया गया है, जो ‘नुकसान, उत्पादन या तस्करी या उच्च गुणवत्ता वाले नकली भारतीय मुद्रा, सिक्का या किसी अन्य सामग्री के संचालन के द्वारा भारत की मौद्रिक अस्थिरता का कारण बनती है।

पीठ ने मोहम्मद असलम बनाम भारत संघ और एक मामले का उल्लेख कहते हुए कहा कि 1967 के अधिनियम की धारा 15 (I) (ए) (iiia) के तहत देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने या धमकी देने के इरादे से सोने की तस्करी’ किसी अन्य सामग्री की तस्करी के तहत कवर किया जाता है, तो इसलिए इस संबंध में याचिकाकर्ता की याचिका ध्यान देने योग्य नहीं है।

गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) संशोधन कानून 2019 (यूएपीए) की वैधता की सुनवाई उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक साल से अधिक समय से लंबित है। नए कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। दरअसल उच्चतम न्यायालय ऐसे विवादास्पद मामलों की सुनवाई में अत्यधिक विलंब कर रहा है, जिसमें सरकार किसी अप्रिय स्थति में पड़ सकती हो। यूएपीए की वैधता का मसला भी इसी श्रेणी में आता है।

दिल्ली के सजल अवस्थी और एक एनजीओ ने याचिकाओं में यूएपीए कानून की धारा 35 और 36 की वैधता को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित किया जाता है तो यह जिंदगी भर उसके लिए कलंक होगा। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का भी उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि 1967 के यूएपीए कानून में सिर्फ संगठन को आतंकी घोषित करने का प्रावधान था। अब केंद्र सरकार ने इसमें बदलाव कर नए प्रावधान जोड़े हैं। धारा 35 में यह साफ नहीं है कि किसी व्यक्ति को किस आधार या कारण से आतंकी घोषित किया जाएगा।

संशोधित यूएपीए बिल संसद से पारित होने पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अगस्त में इसे मंजूरी दी थी। इसमें किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित करने के चार आधार हैं, जो व्यक्ति आतंकी घटना को अंजाम देगा या इसमें सहयोग देगा, जो व्यक्ति किसी आतंकी घटना की तैयारी कर रहा होगा, जो देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले कृत्य करेगा तथा जो व्यक्ति किसी भी तरह से आतंकवाद से जुड़ा हुआ पाया जाएगा।

संशोधित यूएपीए कानून में नए प्रावधान जोड़े गए हैं। इसमें सबसे बड़ा प्रावधान यह है कि एनआईए अब आतंकी के समर्थकों को भी आतंकी घोषित कर उनकी संपत्ति जब्त कर सकेगी। यही नहीं, अब आतंकी संगठन के साथ-साथ उस व्यक्ति को भी आतंकी घोषित किया जा सकेगा, जो किसी न किसी रूप से आतंक को बढ़ावा दे रहा होगा। उसकी संपत्ति जब्त करने के लिए एनआईए को उससे संबंधित राज्य की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

यूएपीए क़ानून के तहत सरकार को अगर इस बात का ‘यक़ीन’ हो जाए कि कोई व्यक्ति या संगठन ‘आतंकवाद’ में शामिल है तो वो उसे ‘आतंकवादी’ क़रार दे सकती है।य हां आतंकवाद का मतलब आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देना या उसमें शामिल होना, आतंकवाद के लिए तैयारी करना या उसे बढ़ावा देना या किसी और तरीक़े से इससे जुड़ना है। यक़ीन की बुनियाद पर किसी को आतंकवादी क़रार देने का ये हक़ सरकार के पास है न कि सबूतों और गवाहों के आधार पर फ़ैसला देने वाली किसी अदालत के पास।

यूएपीए एक्ट के सेक्शन 15 के अनुसार भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को संकट में डालने या संकट में डालने की संभावना के इरादे से भारत में या विदेश में जनता या जनता के किसी तबक़े में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के इरादे से किया गया कार्य ‘आतंकवादी कृत्य’ है। इस परिभाषा में बम धमाकों से लेकर जाली नोटों का कारोबार तक शामिल है। आतंकवाद और आतंकवादी की स्पष्ट परिभाषा देने के बजाय यूएपीए एक्ट में सिर्फ़ इतना ही कहा गया है कि इनके अर्थ सेक्शन 15 में दी गई आतंकवादी कार्य की परिभाषा के मुताबिक़ होंगे। धारा 35 में इससे आगे बढ़कर सरकार को ये हक़ दिया गया है कि किसी व्यक्ति या संगठन को मुक़दमे का फ़ैसला होने से पहले ही आतंकवादी क़रार दे सकती है।

यूएपीए कानून का इस्तेमाल सुधा भारद्वाज जैसे निस्वार्थ और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के खिलाफ बेहद कमजोर मुकदमा दायर करने के लिए किया गया है। जीवन भर न्यायालयों के जरिए कामगारों, औरतों, आदिवासियों और किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली भारद्वाज को पिछले साल अगस्त में गिरफ्तार किया गया था। सुधा भारद्वाज जेल में हैं। उनके, सुरेंद्र गाडलिंग, वरवर राव, गौतम नवलखा, शोमा सेन, रोना विल्सन, महेश राउत और सुरेश धवले के खिलाफ मामला इस बात का सबूत है कि पहले से मौजूद यूएपीए कानून ही अपने आप में कितना दमनकारी है और जिसके द्वारा बिना मुकदमे या दोष सिद्धि के किसी व्यक्ति को महीनों हिरासत में रखा जा सकता है।

इस कानून में प्रावधानित गैरकानूनी  गतिविधि की परिभाषा के अनुसार भारत की संप्रभुता, अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली, नुकसान पहुंचाने का इरादा रखने वाली या नकारने वाली कोई भी गतिविधि इस दायरे में मानी जाएगी। ऐसी किसी गतिविधि के लिए इस कानून में सात साल तक की कैद का प्रावधान है, लेकिन ऐसी किसी गैर कानूनी या आतंकी गतिविधि में कोई जान जाती है तो सज़ा उम्र कैद या मृत्युदंड की भी हो सकती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 23, 2021 12:10 pm

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