Tue. Oct 15th, 2019

उना उत्पीड़न कांड की 26 जुलाई से होगी रोजाना सुनवाई, कोर्ट ने दिया आदेश

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नई दिल्ली। गुजरात की एक सेशन कोर्ट ने 26 जुलाई से उना दलित उत्पीड़न कांड की सुनवाई रोजाना करने का आदेश दिया है। डेकन हेरल्ड के मुताबिक यह आदेश वेरावल की डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट ने मामले के एक पीड़ित वशराम सरवैया के आवेदन की सुनवाई के बाद दिया। गौरतलब है कि गुजरात के गौरक्षकों ने 11 जुलाई 2016 को सरवैया समेत उनके परिवार के 7 सदस्यों की पिटाई की थी। सरवैया ने कोर्ट से मामले की सुनवाई में तेजी लाने की अपील की थी।

31 मई को पेश किए गए इस आवेदन में सरवैया ने कहा था कि गौरक्षकों द्वारा उनके और उनके परिवार पर हमले को बहुत ज्यादा समय बीत गए हैं लेकिन वो अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए पीड़ित के वकील एमजी परमार ने कहा कि “कोर्ट ने हमारे आवेदन को मुकदमे की रोजाना सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है”। यह सुनवाई 29 जुलाई से शुरू होगी।

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परमार ने दावा किया कि पिछले तीन सालों में 300 गवाहों में केवल 38 की सुनवाई हो पायी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि सरकारी और डिफेंस के वकीलों ने इसका विरोध किया था।

नवंबर 2018 में सरवैया ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने केस के बारे में विस्तार से बताया था। पत्र में उन्होंने कहा था कि घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल अपने वादों को पूरा करने में पूरी तरह से नाकाम रहीं।

आप को बता दें कि 11 जुलाई, 2016 को उच्च जाति (कथित) के दरबारा समुदाय के 40 लोगों ने सरवैया परिवार के सात सदस्यों को गिर सोमनाथ जिले के उना कस्बे में एक मृत गाय की खाल निकालने के विरोध में बर्बर तरीके से पिटाई कर दी थी। सरवैया परिवार चमड़े का व्यापारी है और मृत पशुओं की खाल निकालना उनके परंपरागत पेशे का हिस्सा है। लेकिन हमलावरों ने उनके ऊपर गौ हत्या का आरोप लगाया। हमले के दौरान सरवैया परिवार के चार भाइयों के कपड़े उतारने के बाद उन्हें जीप के पीछे बांध दिया गया था और फिर डंडे और राड से पिटाई करते हुए उन्हें पूरे कस्बे में घुमाया गया था।

इसके साथ ही कुछ हमलावरों ने बाकायदा उनकी फिल्म बनायी। बड़े स्तर पर आलोचना के बाद राज्य सरकार ने इस बात का भरोसा दिलाया था कि जल्द से जल्द मामले में न्याय दिलवाया जाएगा बल्कि उस समय उसके लिए स्पेशल कोर्ट और स्पेशल सरकारी वकील नियुक्त किए जाने की बात कही गयी थी। लेकिन सरकारी वकील की हालत यह है कि अब वह खुद ही इसकी तेजी से जांच के आदेश का विरोध कर रहे हैं।

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