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आज़मगढ़ में दलित युवक की हत्या कर शव घर भेजने के बाद सवर्ण दबंगों ने दी परिजनों को सुलह की धमकी

लखनऊ। यूपी में दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के उत्पीड़न की बाढ़ आ गयी है। सत्ता के संरक्षण में सामंती तत्वों और दबंगों के हौसले बुलंद हैं। और इस कड़ी में जगह-जगह न केवल संवैधानिक-लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं बल्कि दलित और मुस्लिम तबके को हर तरीक़े से अपमानित किया जा रहा है।

आज़मगढ़ के जियनपुर में इसी तरह का एक मामला सामने आया है। यहाँ बताया जा रहा है कि सवर्ण सामंती तत्वों ने एक दलित की हत्या कर शव उसके घर भेज दिया और ऊपर से परिवार पर सुलह करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। रिहाई मंच के नेता बांकेलाल यादव और उमेश कुमार ने बताया कि जियनपुर थाना क्षेत्र के गरेरूआ गांव में विजन सिंह और दीपू सिंह ने गांव के ही दलित युवक अंकुर की हत्या कर दी। हत्यारों का मनोबल इतना बढ़ा था कि उन लोगों ने युवक की लाश को उसके घर पहुंचा कर उसके भाई राहुल को सुलह करने की धमकी दे डाली।

ऐसा न करने पर उसको भी जान से मारने की धमकी दी। यह घटना दर्शाती है कि योगी सरकार में एक जाति के लोग एक बार फिर से मनुवादी व्यवस्था स्थापित कर संवैधानिक मूल्यों की हत्या और अपनी तानाशाही स्थापित करना चाहते हैं। दलितों पर हमले इस बात के सुबूत हैं कि सरकार सूबे में डर की राजनीति स्थापित करना चाहती है।

इसी तरह की एक घटना चंदौली में घटी। जब 15 अप्रैल की शाम को चंदौली जिले के शहाबगंज थाना क्षेत्र के महड़ौर में स्थित संत रविदास की प्रतिमा तोड़ दी गयी।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि सूबे में सवर्ण सामंती तत्वों के हौसले बुलंद हैं और वो दलितों की हत्या कर उनकी लाश घर ले जाकर पूरे के पूरे परिवार को जानमाल की धमकी दे रहे हैं। मंच महासचिव ने जमातियों की सूचना देने पर पाँच हज़ार रुपये का ईनाम घोषित करने वाले आजमगढ़ के कप्तान से पूछा कि कब इन सामंती कोरोनाओं के खिलाफ वो ईनाम घोषित करेंगे। जमात के लोगों की जो लिस्ट सार्वजनिक हुई उसमें आज़मगढ़ के लोगों का नाम नहीं था। पर कप्तान साहब कहते हैं कि उन्हें ऑफिसियल सूचना है, उन्होंने डोर टू डोर सर्वे भी करवाया है, लोग गए थे, छुपे हैं, दिल्ली गए थे और मरकज भी गए थे।

इसी तरह से अंबेडकर नगर के टांडा निवासी रिज़वान के पिता इजरायल द्वारा अपने बेटे की हत्या के लिए पुलिसकर्मियों को ज़िम्मेदार ठहराए जाने के बाद उनका उत्पीड़न शुरू हो गया है। रिहाई मंच ने इस मामले में पुलिस द्वारा किए जा रहे मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाया है। उसका कहना है कि पूरा का पूरा अमला मिलकर इस कांड की सच्चाई को छुपाना चाहता है। मंच ने कहा कि मृतक के पिता की तहरीर पर एफआईआर दर्ज न करके पुलिस द्वारा खुद पर लगे आरोपों पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अपनी सुविधानुसार किया गया विश्लेषण दोषियों को बरी करने की इंसाफ विरोधी कोशिश है।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि रिज़वान की मृत्य के बाद अम्बेडकर नगर के कप्तान का जाँच कराने वाला बयान राहत देने वाला था। जिसमें उन्होंने कहा था कि इस मामले के आरोपी चाहे उनके पुलिसिया अमले से जुड़े लोग ही क्यों न हों वो सच्चाई के साथ खड़े होंगे। लेकिन दूसरे ही दिन यह कहना कि अब तक एकत्र किए गए सबूतों के अनुसार, यह दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है कि रिजवान पर पुलिस ने डंडों से हमला किया था। यह न सिर्फ जल्दबाजी है बल्कि जांच की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश है। निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है। पर जिस तरह से पुलिस कह रही है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके शरीर पर कहीं भी लाठी [डंडों] से कोई चोट नहीं दिखती है। उससे पूरे मामले को लेकर संदेह पैदा हो जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता असद हयात का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मात्र मेडिकल एक्सपर्ट की राय है। यह सम्पूर्ण साक्ष्य नहीं होती। हत्या के मामले में जब विवेचना की जाती है तो घटना के सीधे साक्ष्य और परिस्थिति जन्य साक्ष्यों को भी एकत्र किया जाता है। अनेक चश्मदीद गवाह भी सामने आते हैं। चूँकि पिटाई का आरोप पुलिस के विरुद्ध है इसलिए मुमकिन है कि चश्मदीद गवाह डरे और सहमे हों और जांच के दौरान अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर अपने बयान दर्ज कराएं। अक्सर देखा जाता है कि अदालत में जिरह के दौरान मेडिकल विशेषज्ञ डॉक्टर ऐसे बयान दे जाते हैं जिनसे जुर्म साबित हो जाता है और यह विश्लेषण समस्त एकत्र किए गए साक्ष्यों के आधार पर अदालत करती है न कि पुलिस अफसर। इस मामले में अदालत का काम पुलिस अफसर कर रहे हैं और बिना रिपोर्ट दर्ज किए ही जांच का दरवाजा भी बंद कर रहे हैं।

आपको बता दें कि रिज़वान की मृत्यु के बाद उनके पिता का वीडियो वायरल हुआ। जिसके बाद पुलिस ने सोशल मीडिया पर वायरल खबर का खंडन जारी करते हुए कहा कि भ्रामक सूचना वीडियो को शेयर न करें। विदित हो कि ललिता कुमारी केस में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि किसी भी घटना की सूचना मिलने पर सर्वप्रथम रिपोर्ट दर्ज की जाए और जांच प्रारंभ की जाए। ऐसे में जहां पुलिस पर ही आरोप लगा हो तो वहां इस आदेश की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। रिज़वान के पिता की रिपोर्ट दर्ज किए बिना जांच करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन है और सवाल खड़ा कर रहा है। यह आदेश उत्तर प्रदेश पुलिस पर बाध्यकारी है।

वहीं मोहम्मद इजरायल के पिता का वीडियो सामने आया है जिसमें वो यह कह रहे हैं कि उन पर स्थानीय नेता दबाव बना रहे हैं। पैसे का लालच औऱ धमकी दे रहे हैं। उन्होंने पुलिस के दावे को खारिज कर दिया कि रिजवान एक दुर्घटना में घायल हो गया था। उनका कहना है कि न तो हमारे पास गाड़ी और न ही वो चलाना जानता था। वह मज़दूर वर्ग का था और मज़दूरी के ज़रिए अपना जीवन यापन करता था। और खुद रिज़वान के पिता साइकिल का पंचर बना कर परिवार को पालते हैं।

This post was last modified on April 20, 2020 10:42 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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