Saturday, February 24, 2024

मिस्टर उपाध्याय, अनुच्छेद 32 का मज़ाक मत बनाओ,यह राजनीतिक फोरम नहीं है: सुप्रीम कोर्ट

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने पीआईएल याचिकाकर्ता एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से पुरुषों और महिलाओं के लिए शादी की एक समान उम्र की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि हम यहां एक संवैधानिक कर्तव्य निभाने के लिए हैं आपको या किसी को खुश करने के लिए नहीं हैं। आप बार के सदस्य हैं, हमारे सामने बहस करें। यह राजनीतिक फोरम नहीं है। मिस्टर उपाध्याय, अनुच्छेद 32 का मज़ाक मत बनाओ।

उपाध्याय की एक टिप्पणी से सीजेआई नाराज हुए। उपाध्याय ने कहा था, “इसे सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने का क्या मतलब था?”। हाईकोर्ट में लंबित याचिका को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था।

इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि उपाध्याय को “अनावश्यक टिप्पणी” करने की आवश्यकता नहीं है। सीजेआई ने कहा, “हम यहां आपकी राय सुनने के लिए नहीं हैं। सौभाग्य से हमारी वैधता इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि आप हमारे बारे में क्या महसूस करते हैं।

हम आपके बारे में जो महसूस करते हैं, उस पर आपकी अनावश्यक टिप्पणी नहीं चाहते। हम यहां अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाने के लिए हैं।” यहां आपको खुश करने के लिए नहीं हैं। न ही हम यहां किसी राजनीति को खुश करने के लिए हैं। तो आप हमें अपनी अनावश्यक टिप्पणी न दें कि आप हमारे लिए कैसा महसूस करते हैं। आप बार के सदस्य हैं, हमारे सामने बहस करें। यह राजनीतिक फोरम नहीं है।”

सीजेआई ने सुनवाई के दौरान पाया कि यह अंततः संसद के निर्णय का एक मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा “मिस्टर उपाध्याय, अनुच्छेद 32 का मज़ाक मत बनाओ। कुछ मामले हैं जो संसद के लिए आरक्षित हैं।

हमें संसद के लिए छोड़ देना चाहिए। हम यहां कानून नहीं बना सकते। हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हम ही संविधान के संरक्षक हैं। संसद भी एक संरक्षक है।

अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आप कह रहे हैं कि महिलाओं की शादी की उम्र 18 नहीं 21 साल होना चाहिए। अगर हम 18 साल की समय सीमा खत्म कर देंगे तो कोई सीमा ही नहीं बचेगी। ऐसे में तो कोई 5 साल की उम्र में भी शादी कर सकता है।

इस पर अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि 18 साल और 21 साल की दो अलग-अलग उम्र सीमा मनमानी है। संसद में पहले से ही इस कानून पर बहस चल रही है। इस पर जस्टिस पी एस नरसिम्हा ने अश्विनी उपाध्याय को टोकते हुए कहा कि जब संसद में कानून पर बहस चल रही है तो आप हमारे पास क्यों आए हैं? इस पर उपाध्याय ने कहा कि आप मामले को स्थगित कर दीजिए। उपाध्याय ने तर्क दिया कि अगर 18 साल की समय सीमा खत्म कर दी जाती है तो यह अपने आप 21 साल हो जाएगा? उन्होंने हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला दिया।

इस पर सीजेआई ने इसे दिखाने को कहा। चीफ जस्टिस ने कहा कि आर्टिकल 32 का मजाक मत बनाइए। हमें अकेले संविधान के कस्टोडियन नहीं हैं।

संसद खुद कानून बना सकती है और तय कर सकती है। कुछ मामले संसद के लिए हैं और उन्हें संसद पर ही छोड़ दीजिए।

इस पर अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि हमें लॉ कमीशन जाने की अनुमति दे दीजिए। इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि आपको किसी ने लॉ कमीशन जाने से रोका है? उपाध्याय ने जवाब दिया नहीं।

फिर जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा कि फिर आपको छूट क्यों चाहिए? चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की इस टिप्पणी पर उपाध्याय ने कहा फिर इस मामले को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराने का फायदा क्या रह गया?

इसी बात पर चीफ जस्टिस तल्ख हो गए। उन्होंने कहा कि हम आपकी राय सुनने के लिए नहीं बैठे हैं। हम यहां पर संवैधानिक ड्यूटी पूरी करने के लिए बैठे हैं। न तो आपको और न किसी पार्टी को खुश करने के लिए बैठे हैं।

आप हमारे (कोर्ट के लिए) जैसा महसूस करते हैं, इसपर हमें आपकी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। आप बार के सदस्य हैं, हमारे सामने बहस करें। यह कोई पॉलिटिकल फोरम नहीं है।

पीठ छह जनहित याचिकाओं (वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर चार जनहित याचिकाएं, लुबना कुरैशी द्वारा दायर एक याचिका और डोरिस मार्टिन द्वारा दायर एक अन्य याचिका) पर सुनवाई करते हुए सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने तलाक-वसीयत के लिए समान कानून बनाने की मांग वाली जनहित याचिकाओं कि सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

शुरुआत में, सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने याचिकाओं उठाई गई कुछ प्रार्थनाओं पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “क्या योर लॉर्डशिप के सामने ऐसी प्रार्थना की जा सकती है? यह सरकार को तय करना है कि वह क्या करना चाहती है। इसका आधार क्या है? मैं समझ सकता हूं कि इन मुद्दों को व्यक्तिगत रूप से उठाया जा सकता है। मुझे इससे कोई समस्या नहीं है। लेकिन इस तरह की प्रार्थनाओं के साथ सर्वग्राही याचिका नहीं हो सकती।

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “कई प्रार्थनाएं हैं। विधि आयोग को एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहने से संबंधित प्रार्थना।

उस पर कैसे आपत्ति की जा सकती है? यह पूछने में विशिष्ट है कि जेंडर न्यूट्रल कानून बनाए जाएं। याचिकाकर्ताओं में से एक मुस्लिम महिला है और वह कहती है कि मैं चाहती हूं, मेरे लिए कानून जेंडर न्यूट्रल होना चाहिए।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “ये विधायी कार्य हैं। हम कैसे तय कर सकते हैं?” भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप किया और कहा, “सैद्धांतिक रूप से, जेंडर न्यूट्रल और समान कानूनों पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। न्यायिक पक्ष में क्या किया जा सकता है, इस पर विचार करना योर लॉर्डशिप के लिए है।”

सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने इस पर आपत्ति जताई और कहा, “अदालत को इस मामले में प्रथम दृष्टया आदेश जारी करते हुए नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस तरह के संकेत भेज सकता है जो पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हैं। “पीठ ने कहा कि वह याचिका पर सुनवाई करेगी और फिर देखेगी कि क्या किया जाना है। यह मामला अब चार सप्ताह के बाद सूचीबद्ध किया गया है। 

(जे.पी.सिंह कानूनी मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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संजय कुमार
संजय कुमार
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11 months ago

बेहतरीन लेख

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