Friday, December 3, 2021

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यह कैसा न्याय! जो मरते पिता महावीर नरवाल से कैदी बेटी की मुलाकात भी न करा सका

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9 मई 2021 की सुबह कुछ दोस्तों से बात हुई। अन्य बातों के अलावा एक बात सब से हुई– महावीर नरवाल जी की तबीयत के बारे में। मुझे ख़बर थी कि वे कोविड-संक्रमित होने के बाद अस्पताल में दाख़िल हैं। ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं। सुबह ख़बर यह मिली कि स्थिति गम्भीर है और वैंटिलेटर पर डालने की बात है। शाम साढ़े सात बजे के आस-पास ख़बर मिली कि जहान-ए-फ़ानी से कूच कर गए हैं।

चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार से सेवा-सम्पन्न महावीर नरवाल की दो ख़ूबियां जग ज़ाहिर रहीं- उन का ज़िंदादिल स्वभाव और उन का हौसला। हमेशा हंसते हुए मिलते थे। नज़रिया हमेशा आशावान रहता था। एक साल हो चला है उन की बेटी नताशा की गिरफ़्तारी को। केंद्रीय सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध में शामिल जिन लोगों की गिरफ़्तारियों हुईं, उन में वह भी शामिल हैं।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के साथ इन लोगों को जोड़ने का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि अन्य के साथ-साथ नताशा के ख़िलाफ़ भी यूएपीए जैसा क़ानून लाया गया जिस के तहत रिहाई तो दूर, ज़मानत मिलना ही लगभग नामुमकिन है। इस पूरे समयकाल में भी महावीर नरवाल ने न तो अपनी मुस्कुराहट खोई और न ही अपना हौसला हाथ से जाने दिया। अकेले में जो भी ग़म झेलते हों, मित्रों-परिचितों में हमेशा सरल स्वभाव के साथ मुस्कुराते हुए ही मिले।

यह हौसला शायद इसलिए भी रहा होगा कि इमरजेंसी के दौर में गिरफ़्तारी और जेल का अनुभव उन्हें भी हुआ था। सामाजिक सरोकारों में वे ताउम्र सक्रिय रहे। वैज्ञानिक तथा विवेकशील चेतना के प्रचार-प्रसार से सम्बद्ध अभियानों और संस्थाओं से जुड़े रहे। इन से उपजा व्यापक और समृद्ध वैचारिक कैनवस भी शायद उन्हें यह हौसला देता होगा। सामाजिक बेहतरी के लिए काम करते हुए कुछ तो क़ीमत भी चुकानी पड़ती है, इस बारे में उन्हें इल्म था– और यह क़ीमत वे चुकाने को तैयार थे।

जब एक बाप कहता है कि उसे अपनी बेटी पर नाज़ है, और यह कि जेल से क्या डरना, तो तय है कि वह अपनी बेटी के सामाजिक सरोकारों के साथ ख़ुद को जुड़ा हुआ पाता है, उसी तरह जैसे वह उन के सरोकारों से प्रेरणा लेती है’; दोनों को इन सरोकरों से लगाव है– और इसीलिए यह क़ीमत चुकाने को दोनों तैयार हैं। बेटी जेल में रहते हुए भी लाइब्रेरी संभालती है, योगा सिखाती है और उर्दू सीखती है– और बाप उस के लिए उर्दू की किताबें इकट्ठा करता है कि आएगी, तो पढ़ेगी। मुझे याद आता है मीर तक़ी मीर के शे’र का एक मिस्रा
क्या है गुलशन में जो क़फ़स में नहीं
“डिसेंट (मतभेद, असहमति) तो बहुत डीसेंट (शालीन) चीज़ है।”

‘कारवान-ए-महब्बत’ द्वारा निर्मित उन के वीडियो-साक्षात्कार में यह बात महावीर नरवाल ने कही थी। यह बात वही इन्सान कह सकता है जो इन दोनों शब्दों के सच्चे अर्थ समझता है। शालीनता उन के व्यवहार में झलकती ही नहीं थी, रची-बसी लगती थी। चर्चा के दौरान कभी-कभार उन से मतभेद हो ही जाता था। उन के साथ मेरा अनुभव यही रहा कि मेरे अलग मत को उन्होंने अनसुना कभी न किया– आराम से सुना, और उतने ही आराम से चर्चा जारी भी रखी। यही लोकतंत्र का मर्म है। नताशा की पेशियों के सिलसिले में पिछले करीब एक साल से लोकतांत्रिक न्यायिक व्यवस्था में अपना भरोसा बनाए रखते हुए भी उन्होंने यह शालीनता बनाए रखी।

जब-जब कोई साम्प्रदायिक घटना घटी, जब-जब कुछ ऐसा हुआ जो हमारे समाज की वैविध्यपूर्ण एकजुटता के ताने-बाने को चोट पहुँचाता हो, महावीर नरवाल का फ़ोन ज़रूर आया कि कुछ किया जाना चाहिए– और उन की पहलदक़दमी से बआवाज़ बुलंद, लोगों को जागरूक करने का काम होता। मेरे विचार से यह जज़्बा, इन्सानी रिश्तों की पवित्रता में उन के विश्वास से पैदा होता था। पुरख़ुलूस शख़्सियत का मालिक महावीर नरवाल सामाजिक सरोकारों के तईं शायद इसलिए भी प्रतिबद्ध थे कि वह दिल से सोचते थे– वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चेतना के फैलाव का विवेकशील, तार्किक पैरोकार भावना को भी उतनी ही अहमियत देते थे, जितनी विवेकशील सोच को। 

इस निर्मम कोविड-काल में महावीर नरवाल का यूँ चले जाना ‘कारवान-ए-महब्बत’ निर्मित वीडियो साक्षात्कार में उन द्वारा कही एक बात की याद दिलाता है। उस में वे अपनी उम्र के हवाले से एक जगह बातों-बातों में यह भी कहते हैं कि नताशा की रिहाई तक कौन जाने वे रहें, न रहें। ख़ुशमिज़ाज, फ़राख़दिल, अपनी प्रगतिशील सामाजिक सोच के तईं प्रतिबद्ध इस इन्सान का हम से रुख़्सत होना पीड़ादायक है- सब से ज़्यादा नताशा के लिए और उस के भाई आकाश के लिए होगा– मगर हर वो शख़्स जो उन के सम्पर्क में आया होगा, उन्हें भूले नहीं भूलेगा और उन के हौसले का ख़याल आते ही पीड़ा हौसले में तबदील हो जाती है।

आख़िर में बस इतना कि महावीर– महा वीर– नरवाल की ज़िन्दगी का आख़री साल हमें इस पर विचार करने की ओर भी ले जाता है कि इस मुल्क की लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था में यूएपीए जैसा क़ानून क्योंकर है? इस से जुड़े और भी कई सवाल हैं- उन पर सोच-विचार करना भी महावीर नरवाल की वैचारिक यात्रा और उस की विरासत का ही हिस्सा है।  

  • रमणीक मोहन
    (अंग्रेजी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक रमणीक मोहन हरियाणा के रोहतक में रहते हैं। उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी भाषाओं के साहित्य में दिलचस्पी रखने वाले रमणीक मोहन की सामाजिक-सांस्कृतिक अभियानों में सक्रिय भागीदारी रही है। वे इस दौरान पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे। उनके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।) 

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