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Friday, September 24, 2021

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जब फिलिस्तीन जाने वाले एशियाई दल के साथ मिस्र ने किया बुरा बर्ताव, सुनिए संदीप पांडेय की जुबानी पूरी कहानी

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद कोलोनी सिस्टम धीरे धीरे समाप्त हो रहा था। विश्व के पटल पर कई नए देश की रेखा खींची जा रही थी। जिस प्रकार से जब अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र किया तो अखंड भारत को दो हिस्से में बांट दिया। उसी प्रकार से अंग्रेजों ने फिलिस्तीन के दो हिस्से कर दुनिया भर के यहूदियों को उसके एक हिस्से पर बसा दिया। इस्राइल ने धीरे धीरे 80 प्रतिशत से अधिक फिलिस्तीन पर कब्ज़ा कर लिया है। बड़ी संख्या में दुनिया भर के बुद्धिजीवी फिलिस्तीन के साथ खड़े हैं। दुनिया को इस्राइल द्वारा किए जा रहे फिलिस्तीनी नागरिकों पर अत्याचार को बता भी रहे हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया के अधिकतर देश खामोश तमाशाई बने हुए हैं। भारत हमेशा से फिलिस्तीन के साथ खड़ा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमेशा कहा कि जिस तरह से ब्रिटेन अंग्रेज़ों का है फिलिस्तीन भी अरबों का है। 1936 में भारत ने गांधीजी की पहल पर फिलिस्तीन दिवस मनाया था।

जमाते इस्लामी हिंद द्वारा आयोजित वर्चुअल ज़ूम मीटिंग में मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय, वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण राय और सलमान हुसैनी नदवी ने “फिलिस्तीन के साथ एकजुटता” मुद्दे पर संबोधित किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण राय ने फिलिस्तीनियों के लिए 45 प्रतिशत नहीं बल्कि 100 प्रतिशत ज़मीन की मांग की। मौलाना सलमान नदवी ने फिलिस्तीन और मस्जिद अक्सा के इतिहास को सामने रखते हुए फिलिस्तीन और इस्राइल विवाद को अमेरिका की पूंजीवादी नीति का हिस्सा बताया। संदीप पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में 2010-11 में दिल्ली से गाज़ा यात्रा के बारे में बताया।

संदीप पाण्डेय ने 2011 में दिल्ली से फिलिस्तीन की यात्रा की थी। जिसमें भारत सहित कई देशों के नागरिक शामिल थे। यात्रा दिल्ली से पैदल शुरू होकर बलूचिस्तान होते हुए ईरान, तुर्की, लेबनान, सीरिया और मिस्र होते हुए गाज़ा जाना तय था। ये लोग फिलिस्तीन के साथ एकजुटता दिखाने के अलावा  फिलिस्तीनी पीड़ितों के लिए राहत सामग्री भी ले जा रहे थे। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान का वीज़ा देने से मना कर दिया क्योंकि पाकिस्तान की नीति है कि वह किसी भी भारतीय को बलूचिस्तान का वीज़ा नहीं देता। इसलिए दिल्ली से हवाई मार्ग से ईरान के तेहरान पहुंचे। ईरान में इन यात्रियों का ज़बरदस्त स्वागत हुआ। वहां के बहुत से बड़े नेता और अधिकारी स्वागत के लिए उपस्थित थे। ईरान के सांसदों ने फिलिस्तीन के लिए बड़ा चंदा करके रखा था जो इन्हें सौंप दिया। ताकि  फिलिस्तीनियों को राहत सामग्री पहुंचाई जा सके। ईरान टीवी के पत्रकार मोहम्मद कुम्मी ने यात्रियों का इंटरव्यू किया। ईरान से यात्रा सड़क मार्ग द्वारा तुर्की पहुंची जहां यात्रा का स्वागत हुआ। तुर्की में भी कुछ नेता और सरकारी अधिकारी स्वागत में उपलब्ध रहे।  तुर्की के कुर्द इलाकों से होते हुए यात्रा सीरिया पहुंची। सीरिया में जब यात्रा पहुंची तो नवातिया के गवर्नर खुद यात्रा के स्वागत के लिए आए। नवातिया के गवर्नर चार से पांच बार मिलने आए। यात्रा सीरिया से लेबनान और फिर सीरिया आई। राहत सामग्री को पानी के जहाज़ से चार लोगों के साथ गाज़ा भेजा गया। बाकी यात्री सड़क मार्ग से मिस्र आ गए जहां से गाज़ा सड़क मार्ग से जा सकते हैं। 

मिस्र से गाज़ा जाने के तजुर्बे पर संदीप पाण्डेय द्वारा कही गई बात मुसलमानों को चौंकाने वाली हो सकती है। पांडेय ने बताया, “पहले मिस्र के अधिकारियों ने होटल में रुकने को कहा। जब हमने कहा हम यहां नहीं रुकेंगे गाज़ा में लोग हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। हम वहां तुरंत जाना चाहते हैं। तो मिस्र के अधिकारियों ने 5000 डॉलर की रिश्वत मांगी। जो हमें देने पड़े। वहां से रफा बॉर्डर 10 किलोमीटर था। जब रफा क्रॉसिंग पहुंचे तो वहां भी मिस्र के अधिकारियों ने 10000 डॉलर रिश्वत में मांगे। 10000 डॉलर देने के बाद ही हम फिलिस्तीन जा सके।”

मिस्र के सुल्तान सलाहुद्दीन अयूबी ने 1187 में ईसाई क्रूसेडर से युद्ध कर फिलिस्तीन को अपने कब्जे में लिया था। हत्तीन के मैदान में घमासान युद्ध के बाद अयूबी ने मस्जिद ए अक्सा को अपने कब्जे में लिया था। उसके बाद ऑटोमन के कब्जे में फिलिस्तीन रहा। आज उसी मिस्र के सरकारी अधिकारी फिलिस्तीन के लिए राहत सामग्री ले जाने वालों से रिश्वत मांगते हैं। संदीप पाण्डेय के साथ गए सभी यात्रियों के पासपोर्ट मिस्र के अधिकारियों ने जब्त कर लिया था। ये लोग बिना पासपोर्ट ही गाज़ा गए थे। गाज़ा से वापसी पर जब हवाई अड्डे पर पहुंचे तो मिस्र के अधिकारी  पासपोर्ट नहीं दे रहे थे। तो भारत और अन्य देशों से गए यात्रियों ने मिस्र में हो रहे इस बर्ताव का कड़ा विरोध किया। एयरपोर्ट पर ही यात्रियों ने “फिलिस्तीन जिंदाबाद, मिस्र मुर्दाबाद” के नारे लगाए। गांधी जी का चरखा पांडेय जी के साथ था। वह एयरपोर्ट पर सूत कातने बैठ गए। जिससे अधिकारी थोड़ा दबाव में भी आए और उन्हें फ्लाइट में बैठाने के बाद उनके पासपोर्ट उनके सुपुर्द किया।

संदीप पाण्डेय ने बताया। मिस्र की सरकार फिलिस्तीनियों के साथ हमसे भी बुरा बर्ताव करती है। इस्राइल ने फिलिस्तीन की अर्थ व्यवस्था को तबाह कर रखा है। वहां कोई एयरपोर्ट नहीं है। जब भी फिलिस्तीनियों को किसी और देश में जाना पड़ता है तो मिस्र हवाई मार्ग का उपयोग करना पड़ता है। इस पर मिस्र की पुलिस रफा बॉर्डर से फिलिस्तीनियों को हथकड़ी लगाकर एयरपोर्ट लाती है। और एयरपोर्ट से हथकड़ी लगाकर रफा बॉर्डर छोड़ती है। 

पांडेय ने बताया, ” इस्राइल टारगेट कर हवाई अड्डे, अस्पताल, स्कूल कॉलेज को निशाने पर लेकर हमला करता है। ताकि वहां की अर्थव्यवस्था हमेशा चरमराई रहे। फिलिस्तीन कभी भी आर्थिक तौर पर उबर न पाए। इस्राइल आत्म रक्षा के नाम पर 18 स्कूल और 50 अस्पताल तबाह कर देता है। दुनिया फिर भी इस्राइल को नहीं दिखता।”

भारत हमेशा से ही फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े रहने वाले देशों में से है। मुस्लिम नफरत के चलते भारत में भले ही कुछ लोगों ने इस्राइल का समर्थन सोशल मीडिया में किया हो लेकिन सरकार का स्टैंड फिलिस्तीन के साथ एकजुट वाला ही है। गांधीजी और नेहरू का फिलिस्तीन में बहुत सम्मान है। 2011 में जब दिल्ली के राजघाट से गाज़ा की यात्रा शुरू हुई। गांधीजी को सांकेतिक तौर पर आगे रखा गया था। यात्रा के मुख्य आयोजकों में फिरोज मिथी बोरवाला और असीम रॉय थे। असीम रॉय ने जनचौक को बताया कि ” यात्रा में समाजवादी, वामपंथी, गांधीवादी सभी विचारों के लोग एक साथ थे। भारत से जमाते इस्लामी और मिल्ली गजेट की तरफ से हमें अच्छा समर्थन और गाज़ा के लिए राहत सामग्री दी गई। सभी देश जहां से हम गुज़रे उन्होंने स्वागत किया। मिस्र ऐसा देश था। जहां हमसे रिश्वत मांगी गई। ईरान की तेहरान यूनिवर्सिटी में हमारा संबोधन भी हुआ जिसमें ईरान के बड़े लीडर शामिल थे।” इस यात्रा का नाम ‘First Asian Caravan to Gaza’ था।

फिरोज़ मिथीबोर वाला जो 1980 से फिलिस्तीन के साथ एकजुटता पर काम कर रहे हैं। फिलिस्तीन के समर्थन में कई देशों का दौरा कर चुके हैं। ‘First Asian Caravan to Gaza’ यात्रा के मुख्य आयोजक थे। मिथिबोरवाला ने बताया, ” इस यात्रा को लेकर ईरान में बहुत उत्साह था। तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदी नेजाद और तत्कालीन विदेश मंत्री सालेही खुद प्रतिनिधि मंडल से मिलने आए थे। ईरानियन पार्लियामेंट के सांसदों के साथ हमारा डिनर हुआ। जिसमें ईरानी संसद के उपाध्यक्ष अली अकबर अबू तुरैब भी शामिल रहे। ईरान के बाद तुर्की , सीरिया और लेबनान की सरकारों ने अच्छा सहयोग दिया। सीरिया के मुफ्ती अलाउद्दीन ज़्यूटिरी भी यात्रा में शामिल हुए।” कुछ बड़े विदेशी नाम जो यात्रा में शामिल हुए इस प्रकार हैं। खालिद अब्द अल मजीद , अहमद अब्दुल करीम , शेख युसूफ अल अब्बास , बिशारुद्दीन शर्की , सलीम गफुरी इत्यादि शामिल थे। इस यात्रा को भारत ने लीड किया था। लेकिन एशिया के कई देशों के नागरिकों ने यात्रा में हिस्सा लिया था।

मलेशिया , इंडोनेशिया , जापान , ईरान, सीरिया, लेबनान जैसे देश के नागरिकों ने प्रतिनिधित्व किया। भारत से संदीप पाण्डेय , फिरोज़ मिथीबोरवाला , असीम रॉय ,गौतम मोदी, स्वरा भास्कर , हन्नान मौला ,शादाब सिद्दीक़ी ,अजित साही,सुनील कुमार, खुशबू, सिराज पटनायक सहित 60 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

(अहमदाबाद से कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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