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प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा आपको नहीं दिखती योर ऑनर !

गुजरात हाईकोर्ट को दिहाड़ी मजदूरों, प्रवासी मजदूरों और लॉकडाउन में फंसे लोगों की पीड़ा दिखाई पड़ रही है और इससे सम्बंधित खबरों पर गुजरात हाईकोर्ट स्वत: संज्ञान लेकर राज्य सरकार को याद दिला सकती है कि राज्य प्रशासन की ये जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि उनके नागरिक भूखे न रहें, तो योर ऑनर उच्चतम न्यायालय को हजारों लाखों की संख्या में सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा में कभी ट्रेन से कटकर तो कभी वाहनों से कुचलकर तो कभी भूख तो कभी पानी की कमी तो कभी गर्मी और लू से अब तक लगभग सौ लोगों के मरने की ख़बरें नहीं दिखतीं? उच्चतम न्यायालय सरकारी पक्ष के उन झूठे दावों को क्यों मान लेता है कि एक भी प्रवासी मजदूर सड़क पर नहीं है, केंद्र सरकार ने सब इंतजाम कर दिया है?

योर ऑनर क्या आपको याद दिलाने की जरूरत है कि 31 मार्च को ही सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने शपथ पर उच्चतम न्यायालय को आश्वासन दिया कि एक भी प्रवासी अब सड़क पर नहीं है। सभी को आश्रय में ले जाया गया है और भोजन और पानी उपलब्ध कराया गया है। लेकिन क्या यह आश्वासन सच निकला? फिर 31 मार्च के बाद वे लोग कौन हैं जो भूखे प्यासे पूरे परिवार के साथ सड़कों और रेल पटरियों पर थके हारे चलते दिखाई पड़ रहे हैं ?

औरंगाबाद ट्रेन दुर्घटना 8 मई 20 की है, जिसमें 16 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई ‌थी। खबरें ‌थीं कि वे रेल लाइनों से होकर अपने घर वापस जा रहे थे और थक कर पटरियों पर सो गए और ट्रेन से कटकर मर गये । इस दुर्घटना से तीन दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका को रद्द कर दिया था, जिसमें प्रवासी मजदूरों को बिना शर्त और शुल्क के ट्रेनों से उनके घरों को लौटने की अनुमति देने के निर्देश देने की मांग की गई ‌थी। याचिकाकर्ता, जगदीप छोकर ने कहा था कि सब्सिडी के बाद ट्रेन के किराए अधिकांश मजूदरों की हैसियत के बाहर हैं। यात्रियों  के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि यात्रा के लिए मेडिकल फिटनेस प्रमाणपत्र प्राप्त करने की पूर्व शर्त व्यावहारिक कठिनाइयों को पैदा कर रही हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने बिना किसी प्रभावी निर्देश के याचिका का निस्तारण कर दिया और कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें सभी आवश्यक कदम उठा रही हैं, इसलिए हमें इस याचिका को लंबित रखने का कोई कारण नहीं दिखता है।

उच्चतम न्यायालय ने 31 मार्च को पारित आदेश में कहा था कि शहरों में काम करने वाले मजदूरों का प्रवासन फर्जी खबरों, कि लॉकडाउन तीन महीने तक रहेगा, से पैदा हुई घबराहट के कारण शुरू हुआ। सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में इसको लेकर फैलाई गई फर्जी खबरों पर कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई थी । कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग माध्यमों से फैलाई गई फर्जी खबरों की वजह से प्रवासी मजदूरों का बड़ी संख्या में शहरों से अपने गांवों को पलायन हुआ।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा था कि केंद्र की ओर से दायर स्टेटस रिपोर्ट के अवलोकन के बाद, हम कोरोनो वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमों से संतुष्ट हैं। पीठ ने कहा था शहरों में बड़ी संख्या में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों में आतंक उस समय फैला जब कुछ फर्जी खबरें सामने आने लगीं, जिसमें ये कहा गया कि लॉकडाउन तीन महीने से अधिक समय तक जारी रहेगा।

आज लॉकडाउन की क्या स्थिति है? 24 मार्च से 21 दिन का लॉकडाउन हुआ, जिसे बढ़ाकर 3 मई किया गया, फिर बढ़कर 17 मई किया गया। मंगलवार 12 मई को प्रधानमन्त्री ने 18 मई से भी आगे लॉकडाउन बढ़ाने की बात कही है। यानि 17 मई तक लॉकडाउन एक माह 24 दिन का हो जायेगा। उसके बाद बढ़ने का सीधे अर्थ यह है कि लॉकडाउन तीसरे महीने में जल्दी ही प्रवेश करेगा। तो अलग-अलग माध्यमों से फैलाई गई खबरें फर्जी थीं या केंद्र सरकार का उच्चतम न्यायालय के सामने दी गयी दलील फर्जी थी? क्या केंद्र की गलतबयानी का संज्ञान लेगा उच्चतम न्यायालय?

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने 21 अप्रैल को हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज की याचिका का निस्तारण कर दिया, और एक मामूली टिप्पणी की कि केंद्र सरकार को याचिकाकर्ता की ओर से पेश सामग्री को देखने और मामले को हल करने के लिए ऐसे कदम उठाने को, जो उपयुक्त लगे कह दिया गया है। इस आदान-प्रदान के दौरान, पीठ ने पाया कि ये वास्तव में असामान्य परिस्थितियां हैं और इसमें शामिल सभी हितधारक बड़े पैमाने पर जनता के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं। उच्चतम न्यायालय को यह मुद्दा इतना भी गंभीर नहीं लगा कि वह प्रवासियों को तत्काल, ठोस राहत सुनिश्चित करने के लिए एक सकारात्मक और ठोस दिशा निर्देश पारित कर दे।

इसी तरह एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश की एक अन्य याचिका, जिसमें मांग की गई थी कि लॉकडाउन में बेसहारा लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, का भी खंडपीठ ने उस दिन निपटारा कर दिया ‌था। कोर्ट के निपटारे का आधार सॉलिसीटर जनरल का वह बयान था कि “याचिका में उठाए गए पहलुओं पर गौर किया जाएगा और यदि आवश्यक हो तो पूरक निर्देश भी जारी किया जाएगा”। स्वामी अग्निवेश द्वारा दायर एक अन्य जनहित याचिका पर भी अदालत की प्रतिक्रिया ऐसी ही थी, जिसमें लॉकडाउन के बीच कृषि कार्यों को करने में किसानों को होने वाली कठिनाइयों को उठाया गया था। पीठ ने मात्र एसजी तुषार मेहता का बयान दर्ज करने के बाद कि कृषि मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की पूरी निगरानी और कार्यान्वयन किया जा रहा है, याचिका का निपटारा कर दिया था।

सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता और याचियों के वकील प्रशांत भूषण के बीच गरमागरम बहस हुई। प्रशांत भूषण की दलीलों के बाद तुषार मेहता ने कहा कि कुछ लोगों का सामाजिक कार्य केवल जनहित याचिका दाखिल करने तक ही सीमित है। तुषार मेहता ने टिप्पणी की कि जब हजारों संगठन कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं और इन कोशिशों में सरकार के सहयोग से काम कर रहे हैं, कुछ लोगों का सामाजिक काम अपने घरों से आराम से जनहित याचिका दाखिल करने तक ही सीमित रह गया। प्रशांत भूषण ने कहा कि रिकॉर्ड पर अध्ययन है कि 11,000 से अधिक श्रमिकों को एक महीने पहले लॉकडाउन लागू होने के बाद से न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान नहीं किया गया है।

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसने कहा कि किसी को भुगतान नहीं किया गया है? क्या आपका संगठन जनहित याचिका दाखिल करने के बजाय किसी अन्य तरीके से श्रमिकों की मदद नहीं कर सकता है? इस पर प्रशांत भूषण ने पलटवार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पहले ही अपना काम कर दिया है और भोजन वितरित कर रहे हैं, लेकिन क्या आप चाहते हैं कि हम 15 लाख लोगों को खिलाएं?

एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश की एक अन्य याचिका, जिसमें मांग की गई थी कि लॉकडाउन में बेसहारा लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, का भी खंडपीठ ने उस दिन निपटारा कर दिया ‌था। कोर्ट के निपटारे का आधार सॉलिसीटर जनरल का वह बयान था कि याचिका में उठाए गए पहलुओं पर गौर किया जाएगा और यदि आवश्यक हो तो पूरक निर्देश भी जारी किया जाएगा।

प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर कुछ उच्‍च न्यायलायों द्वारा किए गए हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने चिंता जताई है कि हर दिन सैकड़ों प्रवासी मजदूर अपने बच्चों के साथ चलते हुए राज्य के विभिन्न हिस्सों खासकर हाईवे पर देखे जाते हैं। उनकी स्थिति बिल्कुल दयनीय है। अभी तक वे सबसे ज्यादा अमानवीय और भयावह स्थिति में रह रहे हैं। हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर सरकार से पूछा है कि पूरे राज्य में इस समय कहां-कहां पर शेल्टर होम चालू हैं।

केरल हाई कोर्ट केरल सरकार द्वारा मेहमान मजदूरों को आश्रय देने के लिए उठाए गए कदमों की निगरानी कर रहा है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रवासियों को गांव वापस लौटने के अधिकारों के मसले पर कठोर टिप्पणियां कीं, और सरकार को विशेष ट्रेनों पर अपनी स्पष्ट नीति बताने का निर्देश दिया। उड़ीसा हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रवासियों के मुद्दे पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए थे।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होेने के साथ क़ानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

This post was last modified on May 13, 2020 8:20 am

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