Thursday, December 2, 2021

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बगैर इंटरनेट और डिवाइस के जारी है ऑनलाइन शिक्षा!

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कोविड-19 महामारी ने हमसे हमारी ज़मीन, सार्वजनिक संस्थानों में हमसे हमारी भौतिक उपस्थिति छीनकर सब कुछ ऑनलाइन और वर्चुअल कर दिया है। इस नये माध्यम में टेकसेवी नौकरीपेशा मध्यवर्ग तो जैसे तैसे घिसटता जा रहा है। लेकिन सबसे ज़्यादा परेशानी निम्न वर्ग और गरीबी रेखा के नीचे के समुदाय को ‘ऑनलाइन शिक्षा’ नामक नयी चुनौती से हो रही है।

‘ऑनलाइन शिक्षा’ को एक सहूलियत एक विकल्प के तौर पर होना चाहिये था लेकिन ज़्यादातर परिवारों के लिये ये किसी मुसीबत से कम नहीं है। सामान्य तौर पर निम्न व निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार में एक स्मार्टफोन और एक सामान्य कीपैड मोबाइल होता है। निम्न आय के चलते ऐसे परिवारों में दूसरा स्मार्टफोन वहन करने की कूव्वत नहीं होती है। चीनी कृपा से अगर किसी तरह हो भी जाये तो निम्न आय में दो-दो मोबाइल में इंटरनेट पैक रिचार्ज करवाना सबसे मुश्किल काम है।

केंद्रीय विद्यालय के 27 प्रतिशत छात्रों के पास नहीं है डिवाइस

राजधानी दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय के एक शिक्षक बताते हैं कि पिछला साल तो हमने जैसे तैसे काम चला लिया लेकिन इस साल हमने सोचा कि एक प्रॉपर मेकैनिज्म बनाया जाये। फिर हमने रिसर्च करवाया कि कितने छात्रों के पास डिवाइस है। तो केंद्रीय विद्यालय में लगभगह 90 प्रतिशत छात्रों के पास डिवाइस है। फिर हमने अपने स्कूल के प्रत्येक शिक्षक से कहा कि किस के पास पुराना मोबाइल हैंडसेट या लैपटॉप है जो आपके लिये यूजलेस हो। हमने सबसे कहा कि जिसके पास जो हो वो स्कूल ले आये हम उसे रिपेयर करवाकर जिन बच्चों को पास नहीं है उन्हें मुहैया करवाते हैं।

अमुक शिक्षक आगे बताते हैं कि राजधानी दिल्ली में 10 प्रतिशत बच्चों के पास ऑनलाइन स्टडी डिवाइस नहीं है। लेकिन दिल्ली के बाहर केंद्रीय विद्यालय में ये आँकड़ा 27 प्रतिशत हो जाता है, जिन बच्चों के पास डिवाइस नहीं है। हमारा उद्देश्य है कि बच्चों को मोबाइल से नहीं बल्कि डिवाइस से पढ़ाया जाये। ये डिवाइस टैबलेट या लैपटॉप हो सकता है, जिसमें स्क्रीन बड़ी हो ताकि बच्चों को पढ़ने समझने में सहूलियत हो, ताकि पढ़ाई के दौरान कॉल और मेसेज आने जैसे व्यवधान न हों।

बच्चे तीन डिवाइस एक

निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में भी ये दिक्कत है। उत्तर प्रदेश के एक निजी स्कूल के शिक्षक राजकुमार पांडेय बताते हैं हमारे स्कूल में एक बच्ची है वो तीन भाई बहन हैं। उनके घर में मोबाइल दो है। ऐसे में एक बच्चे की क्लास मिस होती है। ऐसे कई बच्चे हैं। जो दो या तीन भाई-बहन हैं और उनके यहां मोबाइल एक है। दूसरा उनके पिता लेकर काम पर चले जाते हैं।

बिहार में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 90% बच्चों के पास नहीं है मोबाइल टीवी

नाम न छापने की शर्त पर बिहार के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक बताते हैं कि बच्चों के भविष्य के साथ मजाक किया जा रहा है। कोरोना ने सरकारों को और सहूलियत कर दी है। मधुबनी के अमुक शिक्षक बताते हैं कि बिहार टीवी पर प्रसारण हो रहा है कोर्स। लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पास मोबाइल नहीं है। और ज़्यादातर घरों में टीवी नहीं है। शहरों में झुग्गियों में भी टीवी है लेकिन गांव में ऐसा नहीं है।

शिक्षक महोदय आगे बताते हैं कि सरकारी शिक्षकों को कहीं भी इनवाल्व नहीं किया गया है। राजधानी पटना में स्टूडियो में कार्यक्रम रिकार्ड करके टीवी पर प्रसारित कर दिया जाता है।   

फिर शिक्षक क्या करते हैं इस सवाल के जवाब में वो बताते हैं कि सरकारी शिक्षक स्कूल जाते हैं हाजिरी लगाते हैं और घर वापस आ जाते हैं। बस यही काम है अब। कोरोना काल में सरकारी स्कूल में शिक्षा के लिये गरीब दलित बहुजन मजदूर वर्ग सफ़र कर रहा है।

वॉट्सअप चल जाता है, मीट या जूम नहीं चल पाता

उत्तर प्रदेश के एक सरकारी शिक्षक बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में हर क्लास का अलग अलग वॉट्सअप ग्रुप बना है। बच्चों को उसी से पठन पाठन सामग्री भेज दी जाती है।

देवराजी प्रेमचंद पब्लिक स्कूल हंड़िया इलाहाबाद के शिक्षक राज कुमार पांडेय बताते हैं कि ज़्यादातर बच्चों के पास टैबलेट या लैपटॉप जैसे डिवाइस नहीं हैं, बच्चे मोबाइल पर क्लास लेते हैं। मान लीजिये किसी के तीन बच्चे हैं और तीनों की क्लास एक ही समय पर है और घर में एक ही मोबाइल है तो दो बच्चों की क्लास मिस होती है। ज़्यादातर क्लास शाम की कर दी गयी ताकि घर का जो पुरुष सदस्य है वो भी घर वापस आ जाये तब तक ताकि बच्चों को सहूलियत मिल सके। लेकिन हर स्कूल में ऐसी सहूलियत नहीं मिल पाती है। राजकुमार पांडेय आगे बताते हैं कि वॉट्सअप ग्रुप बना है। गणित की क्लास ‘Zoom’ पर चलती है। बाकी क्लास ‘,Meet’ एप पर।

बीच क्लास खत्म हो जाता है इंटरनेट डेटा

आठवीं कक्षा के छात्र पीयूष पांडेय विद्यावाहिनी स्कूल प्रयागराज में पढ़ते हैं। वो बताते हैं कि उनकी 2 ऑनलाइन क्लास 2बार चलती है जूम पर। पीयूष बताते हैं कई बार बीच क्लास में ही इंटरनेट डेटा खत्म हो जाता है।

आठवीं कक्षा के ही छात्र आरोहण कक्षा 8 में और उनकी बहन आरोही नवीं कक्षा में बीबीएस कॉलेज प्रयागराज में पढ़ते हैं। पिता के नौकरी पर जाने के बाद घर में एक ही स्मार्टफोन बचता है। अक्सर ही भाई बहन दोनों की कई कक्षाएं एक ही समय में होने पर किसी एक को क्लास छोड़ना पड़ता है। आरोहण बताते हैं कि गूगल मीट पर ऑनलाइन क्लास चलती है और हद से हद दो क्लास लेने भर में इंटरनेट डेटा खत्म हो जाता है। मैम कई बार पूछती हैं, तुमने मेरी क्लास क्यों नहीं ली तो बता देते हैं कि नेट खत्म हो गया था।

बच्चों के लिये डिवाइस और मुफ्त इंटरनेट प्लान क्यों नहीं है किसी सरकार के पास। जैसे एक भौतिक स्कूल के लिये एक इमारत, बेंच, डेस्क, बोर्ड और परिवहन जैसी बुनियादी चीजों की दरकार होती है वैसे ही ऑनलाइन पढ़ाई के लिये डिवाइस और हाईस्पीड इंटरनेट बुनियादी ज़रूरत है। लेकिन देश में फिलहाल बिना डिवाइस और बिना इंटरनेट के ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है।

निम्न वर्ग की बात छोड़ दें तो भी मध्य वर्ग के बच्चों को भी डिवाइस के बजाय मोबाइल पर पढ़ना पड़ रहा है। और वो भी बिना हाईस्पीड इंटरनेट के। इंटरनेट का तो ये हाल है कि क्लास खत्म हो जाती है लेकिन बच्चे क्लास से कनेक्ट नहीं हो पाते हैं।

केंद्र और राज्य सरकारें भलीभांति जानती हैं कि 2012-22 का शिक्षा सत्र ऑनलाइन ही पढ़ाया जायेगा क्योंकि कोरोना के तीसरी वेव के संभावित ख़तरे और बच्चों के लिये वैक्सीन की अनुपलब्धता के चलते भौतिक रूप से पढ़ाई तो संभव ही नहीं है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों के पास ऑनलाइन शिक्षा के लिये डिवाइस और हाईस्पीड मुफ्त़ इंटरनेट जैसी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की कोई ठोस योजना और एजेंडा क्यों नहीं है।  

बिहार के एक शिक्षक नाम न छापने के शर्त पर कहते हैं केंद्र समेत हिंदी पट्टी के ज़्यादातर राज्यों में भाजपा आरएसएस की सरकार है। जो कि शिक्षा विरोधी अपनी प्रवृत्तियों के लिये कुख्यात हैं। शिक्षा के निजीकरण के बाद सरकारी स्कूलों में केवल दलित बहुजन और मजदूर वर्ग के बच्चे ही बचे हैं। मनुवादी एजेंडे की वाहक आरएसएस-भाजपा नहीं चाहती कि दलित बहुजन मजदूरों के बच्चे शिक्षित हों । वो लगातार शिक्षा बजट में कटौती करते आ रहे हैं। विश्वविद्यालयों तक को स्वावलंबी बनाने के नाम पर बजट नहीं दिया जा रहा है जिससे कि फीस में बढ़ोत्तरी हो और मजदूर वर्ग के बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित हो जायें। कोरोना महामारी ने उन्हें ये सहूलियत मुहैया करवा दिया है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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