Friday, April 19, 2024

सरकार की गलत नीतियों के चलते मनरेगा से दूर हो रहे मजदूर

रांची। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के लगभग 70 प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं। इसलिए स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि गांवों में लोगों के लिए रोजगार जुटाए बिना भारत को विकसित नहीं किया जा सकता। इसी आलोक में ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सुनिश्चित करने के लिए 7 दिसम्बर, 2005 को महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम पारित किया गया, तब से यह योजना पूरे देश में लागू है।

यह ग्रामीण इलाकों में अकुशल मजदूरों के लिए रोजगार देने की काफी महात्वाकांक्षी योजना है। यह सच है कि भारत विश्व में ऐसा पहला देश है, जिसने ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के लिए ऐसी महात्वाकांक्षी योजना लागू की है। लेकिन हाल के वर्षो में पारदर्शीता के बहाने इस योजना में इतने पेंच लगा दिए गये हैं कि मजदूरों में मनरेगा योजना के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ यह योजना भ्रष्टाचार की भी भेट चढ़ती जा रही है।

ऐसी परिस्थितियों के बीच 18वें मनरेगा दिवस के अवसर पर मनरेगा की वर्तमान सूरतेहाल पर रांची के प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया, जिसमें मनरेगा मजदूरों सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे।

बता दें कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 की पहली जनवरी से मनरेगा योजना में पारदर्शीता के बहाने कई तकनीकी बदलाव किए हैं, जिसके तहत नेशनल मोबाइल मॉनीटरिंग प्रणाली, फिर आधार आधारित भुगतान प्रणाली और अंत में ड्रोन से योजना स्थलों की निगरानी जैसे जन विरोधी निर्णय लिए गये है। 

कहना ना होगा कि इन मजदूर विरोधी तकनीकी जटिलताओं के मार्फत मनरेगा मजदूरों को काफी थकाया जाता रहा है। बावजूद इसके यदि देश के 25.11 करोड़ मजदूर और झारखंड के 99.26 लाख मजदूरों ने बेइंतहा सब्र का परिचय देते हुए मनरेगा योजनाओं से जुड़े हुए हैं।

इस वित्तीय वर्ष में केन्द्रीय सरकार ने 2022-23 में किए गए संशोधित बजट सहित खर्च के मुकाबले 33 फीसदी की कटौती करते हुए महज 60 हजार करोड़ रुपये ही की थी। वर्तमान वित्त वर्ष में 19 दिसंबर तक 79,770 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।

जिसमें से केंद्र सरकार ने अतिरिक्त प्रथम सप्लीमेंटरी डिमांड के जरिए 14,520 करोड़ आवंटित कर चुकी है। ऐसे में अभी वित्त वर्ष समाप्त होने को लगभग 58 दिन शेष हैं, जिसमें मनरेगा पर सरकार का वास्तविक खर्च काफी ज्यादा रह सकता है।

इधर झारखंड ने निर्धारित लक्ष्य 9 करोड़ के विरुद्ध 9.41 करोड़ मानव दिवस का कार्य पूर्ण कर लिया है। साथ ही मजदूरी मद में 2,427.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। जबकि केंद्र सरकार से 2281.4 करोड़ रुपये ही आवंटन प्राप्त हुआ है। यहां एक्टिव श्रमिकों की संख्या 43.43 लाख है।

वेबसाइट में दर्ज आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष राज्य प्रति जॉब कार्ड औसतन कार्य उपलब्ध कराने और महिलाओं को काम उपलब्ध कराने में विगत 4 वित्तीय वर्षों की अपेक्षा बेहत्तर प्रदर्शन किया है। अभी औसतन 46.82 दिन कार्य दिवस उपलब्ध कराया जा चुका है और महिलाओं की भागीदारी 47.88 फीसदी है।

राज्य सरकार पिछले 3 सालों से अपने राज्य मद से केन्द्रीय अधिसूचित मजदूरी दर के अतिरिक्त 27 रुपये प्रति दिन मजदूरी भुगतान कर मनरेगा मजदूरों के साथ खड़ी नजर आती है। इस वर्ष अगस्त महीने के बाद से सोशल ऑडिट यूनिट भी सक्रिय हुआ है।

जमीनी सर्वे बताते हैं कि मनरेगा क्रियान्वयन में अत्यधिक तकनीकों के इस्तेमाल से मजदूरों की परेशानियां बढ़ी हैं। 23 फ़रवरी से 3 अप्रैल 2023 के बीच महज 12 दिनों में राज्य के 1.99 लाख परिवारों के जॉबकार्ड डिलीट किए गए। ये सभी रोजगार कार्ड आधार से न जुड़ा होने अथवा ABPS न होने की वजह डिलीट किए गए।

पूरे एक साल के आंकड़ों पर गौर करें तो 9.55 लाख मजदूरों के रोजगार कार्ड रद्द कर दिए गए और इस संबंध में मजदूरों को कुछ भी नहीं बताया गया। आज ऐसे मजदूर रोजगार के अभाव में दर दर की ठोकरें खाने को विवश हैं क्योंकि तकनीकी कारणों से उनका फिर से जॉब कार्ड नहीं बन पा रहा है।

आधार आधारित भुगतान प्रणाली ने तो मजदूरों को खासा निराश किया है। राज्य के 99.26 लाख में से महज 54,36,684 मजदूरों के दस्तावेज ही ABPS भुगतान हेतु अद्यतन हैं। मजदूरों के दृष्टिकोण से यह तकनीकी प्रक्रिया अत्यंत जटिल है।

यही वजह है कि मंत्रालय ने इस निमित्त 4 बार अवधि विस्तार के बाद भी शत प्रतिशत लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी। पहला निर्देश जब 30 जनवरी 2023 को जारी की गई थी। उस तिथि को झारखंड के मात्र 41% मजदूरों के खाते ही जुड़ पाए थे।

अर्थात नोटबंदी की तर्ज पर एक झटके में 59% मजदूरों को मनरेगा से दूर कर दिया गया। 60 दिनों तक दिल्ली के जंतर मंतर में मजदूरों के धरने के मद्देनजर पहले 31 मार्च तक इस आदेश को मंत्रालय ने शिथिल रखा।

फिर 30 जून, इसके बाद 30 अगस्त और बाद में 31 दिसंबर तक इसे बढ़ाया गया था। लेकिन अब पहली जनवरी से इसे अनिवार्य कर दिये जाने के कारण आज 44.86 लाख मजदूरों को उनके काम करने के अधिकार और किए गए काम के लिए भुगतान पाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।

राज्य की सरकार ग्राम सभाओं के अधिकारों को भी लगातार कमजोर करती रही है। जहां कानून में योजना प्रस्ताववित करने का अधिकार ग्राम सभाओं के पास है, वहीं ग्रामीण विकास विभाग योजनाओं का निर्धारण स्वयं करती रही है और फिर उन्हीं योजनाओं को ग्राम सभाओं को थोपने का काम करती रही है।

जैसे वित्तीय वर्ष 2022-23 और 2023-24 में सरकार ने एक लाख बिरसा कूप संवर्द्धन सिंचाई योजना पर काम कर रही है। पूर्व के अनुभव बताते हैं कि इससे रोजगार के अवसर खासकर महिलाओं के लिए बिल्कुल सीमित हो जाते हैं, क्योंकि कूप निर्माण की एक योजना में अधिकतम 10 से 12 श्रमिकों को ही काम मिल पाता है।

साथ ही इसमें व्यापक पैमाने पर सामग्री मद में राशि खर्च होती है। जिसमें मजदूरी मद और सामग्री के अनुपात को संतुलित रख पाना काफी मुश्किल होता है। साथ ही सामाग्री मद में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा जमकर फर्जी बिल के जरिए सरकारी राशि के दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ जाती है।

विगत 2 सालों से राज्य में पड़े सूखे की वजह से कृषि की संभावनाएं क्षीण होती चली गईं। दूसरी तरफ गांव में मजदूरों के समक्ष रोजगार का संकट लगातार गहराता चला गया है। यही वजह है कि आज झारखंड के ग्रामीण इलाकों का कोई भी गांव ऐसा नहीं हैं जहां के मजदूर दूसरे राज्यों को पलायन नहीं कर गए हों। गांव वीरान से हो गए हैं। गांवों में मौजूद हैं तो सिर्फ असहाय बुजुर्ग, बच्चे और महिलायें।

जबकि मनरेगा कानून के अन्य लक्ष्यों में से एक टिकाऊ स्वरूप की परिसंपतियों के सृजन, उन्नत जल सुरक्षा, मृदा संरक्षण और उच्च भूमि उत्पादकता के जरिए निर्धनों के लिए आजीविका सुनिश्चित करना था।

आज प्रशासनिक संवेदनहीनता और भ्रष्ट तंत्र ने मनरेगा जैसी महत्वकांक्षी कानून को लक्ष्यहीन बना दिया है। पर्याप्त बजटीय आवंटन, सम्मान जनक मजदूरी दर, ससमय मजदूरी भुगतान और पारदर्शी क्रियान्वयन प्रक्रियाओं के जरिए मनरेगा को व्यापक सामाजिक सुरक्षा की पटरी पर फिर से लाने की सख्त जरूरत है।

उक्त प्रेस वार्ता में शामिल लोगों में झारखंड के लोहरदगा जिला अंतर्गत सेन्हा प्रखंड की सरिता उरांव ने बताया कि वे मेट का काम करती हैं, लेकिन उनको नियमित काम नहीं मिल पाता है। आखिरी बार उन्हें लॉकडाउन के समय काम मिला था। यही वजह है कि महिला मेटों को काम के प्रति कोई रुचि नहीं रह गई है।

लोहरदगा जिला के ही कैरो प्रखण्ड के मंटू उरांव का कहना था कि कूप योजना में काम करने के महीनों बीत जाने के बाद भी पैसा नहीं मिला। कर्जा उधार करके घर चला रहे हैं। कर्ज देने वाले भी पैसा वापसी की मांग कर रहे हैं।

वहीं सेन्हा की सुमानी उरांव का कहना था कि मनरेगा योजना का काम करने के बाद जब साल भर तक क्षेत्र के लोगों को मजदूरी नहीं मिली तो वे सब मजबूर होकर ईंट भट्ठा में कमाने के लिए दूसरे राज्यों में जाने लगे हैं। वे लोग गांव की तमाम वयस्क महिला समूहों से कर्ज लेकर बाहर मजदूरी करने के पलायन कर गए हैं। कुछ इसी तरह की जानकारियां शीलवती देवी, महरू मुंडा, शमसुल अंसारी आदि लोगों ने भी बताई।

प्रेस वार्ता में प्रमुख रूप से सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व राज्य सलाहकार सदस्य बलराम, नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज, नरेगा वाच की ही तारामणि साहू, अर्पणा बाड़ा, मनोज भूईया, शनीयरो उरांव, माहेश्वरी देवी आदि कई लोग उपस्थित थे।

(विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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