Monday, October 25, 2021

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योगी के दिल्ली प्रवास के क्या हैं मायने?

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अब भाजपा का पूरी तरह कांग्रेसीकरण हो चुका है। पहले भाजपा कैडर की पार्टी मानी जाती थी पर राष्ट्रव्यापी प्रसार और किसी भी कीमत पर सत्ता पाने की हवस ने पार्टी का दरवाजा कांग्रेस सहित अन्य दलों के लिए खोल दिया, जिससे 35-40 साल पुराने संघी कम भाजपाई कब हाशिये पर चले गए पता ही नहीं चला। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी कांग्रेस आलाकमान की तरह आचरण कर रहा है और राज्यों में पार्टी की असंतुष्ट गतिविधियों को हवा दे रहा है, क्योंकि उसे राज्यों के नेतृत्व के चेहरे पसंद नहीं हैं। उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां मार्च के तीसरे हफ्ते से सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आलाकमान ने मोर्चा खोल दिया लेकिन उन्हें पता नहीं था कि योगी आदित्यनाथ वास्तव में कल्याण सिंह नहीं हैं। नतीजतन योगी भारी पड़ते नजर आये और आलाकमान की भारी किरकिरी हुई। अब संघ के हस्तक्षेप से योगी दिल्ली दरबार में मिलने गये हैं, जिसको लेकर एक खेमा फिर उछलकूद मचा रहा है लेकिन होना जाना कुछ नहीं है।   

भाजपा में जहां कभी पार्टी लीडरशिप पर अपवाद स्वरूप कोई सवाल उठाता था आज भाजपा शासित कोई प्रदेश नहीं है, जहां सरकार और पार्टी में असन्तोष और गुटबन्दी न हो। फिर बंगाल के चुनाव में अप्रत्याशित पराजय और कोरोना संकट में आपराधिक मिसमैनेजमेंट ने शीर्ष नेतृत्व को इतना बौना साबित कर दिया कि कार्पेट के नीचे दबा असन्तोष और गुटबंदी का लावा फूट पड़ा और हर राज्य में पार्टी की अंतर्कलह सतह पर आ गयी है। दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टी में अब राजनीति शुरू हो गयी है और पार्टी कांग्रेस की बी टीम बनती जा रही है, जिसमें आलाकमान की भूमिका संदिग्ध है।

भाजपा के तीन मुख्यमंत्री आंतरिक कलह के शिकार हो रहे हैं। जब आलाकमान ही असंतुष्टों को शह दे रहा हो तो ऐसा तो होना ही है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक की अंदरूनी कलह संघ और भाजपा के लिए ऐसा घाव बनता जा रहा है, जिसकी सर्जरी समय रहते नहीं की गयी और अनुशासन का पाठ नहीं पढ़ाया गया तो इसके नासूर बनने में देरी नहीं लगेगी। दरअसल उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के गठन के साथ ही सरकार में अंदरूनी खींचतान, समानांतर सत्ता के केंद्र, विभागीय भ्रष्टाचार और इस पर नकेल की कोशिशों में नेतृत्व के प्रति असंतोष सामान्य बात हो गयी है।

भारतीय जनता पार्टी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का दावा करती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष और मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी में अनुशासन का स्तर नई ऊंचाई को छू लिया था लेकिन पार्टी का विस्तार करने के नाम पर जिस तरह कांग्रेस और अन्य दलों के लोगों को पार्टी में शामिल करके संघ से जुड़े ज़मीनी कैडर के नेताओं, कार्यकर्ताओं को हाशिये पर धकेल दिया गया उससे पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदल गया, अनुशासन की जगह अराजकता ने ले लिया। आज उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ हों या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान या फिर कर्नाटक के चीफ मिनिस्टर बीएस येदियुरप्पा- भाजपा के इन सभी मुख्यमंत्रियों की छवि को बट्टा लगाने वाली ख़बरें इनकी पार्टी के भीतर से ही बाहर आ रही हैं।

मई के तीसरे हफ्ते से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चल रहे अभियान में उस समय और घी पड़ गया जब 5 जून को योगी आदित्यनाथ के जन्मदिन पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से बधाई नहीं दिए जाने की ख़बरें सामने आयीं। इससे अटकलों का बाजार गर्म हो गया कि योगी का स्टाइल मोदी-शाह ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक धड़े को भी नहीं भा रहा है। हवा फैली कि भाजपा 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी को किनारे करने पर विचार कर रही है, लेकिन उसके सामने संघ के सर्थन का संकट है जो योगी के पक्ष में मजबूती से खड़ा है। योगी की मजबूत हिंदुत्ववादी छवि है। लेकिन दूसरी तरफ इससे सीधे प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती मिल रही है।

दिसंबर 2019 में ही पार्टी के 200 विधायकों ने विधानसभा में धरना दे दिया था। तब गाजियाबाद के लोनी से विधायक नंद किशोर गूर्जर के नेतृत्व में विधायकों का बड़ा जत्था मुखर हो गया था। अब भी कई विधायक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के तौर-तरीकों से काफी खफा हैं। कोई पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तो कोई ब्राह्मणों के प्रति भेदभाव तो कोई विधायकों के अधिकारों की नजरअंदाजी का मुद्दा उठाकर अपनी ही सरकार को घेरने में जुटा है। नाराज विधायकों में कई खुलकर मीडिया में बयान दे रहे हैं तो कुछ ने सोशल मीडिया का सहारा ले रखा है जबकि कुछ अन्य सामने न आते हुए भी योगी सरकार के खिलाफ हवा बना रहे हैं। ऐसे नेताओं में गोरखपुर सदर के विधायक डॉ. राधा मोहन दास से लेकर, सुल्तानपुर विधायक देवमणि द्विवेदी, सीतापुर शहर से विधायक राकेश राठौर, गोपामाऊ के विधायक श्याम प्रकाश आदि शामिल हैं। अब कहा जा रहा है कि योगी के खिलाफ 250 विधायकों ने हस्ताक्षर किया है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पसंद नहीं करते। कोरोना की दूसरी लहर के मैनेजमेंट को लेकर शिवराज पार्टी के अंदर ही घिर गए। ताजा लहर से राहत मिलते देख जब शिवराज सरकार ने ऑड-ईवन फॉर्म्युले पर अनलॉक की प्रक्रिया का ऐलान किया तो भाजपा के विधायकों ने ही सवाल खड़े कर दिए। सतना जिले के मैहर से पार्टी विधायक नारायण त्रिपाठी ने अनलॉक पॉलिसी के विरोध में सीएम को पत्र तक लिख दिया। यहां तक कि प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी सरकार से कड़ा सवाल पूछ लिया।

अप्रैल के आखिर में तो हद ही हो गई थी जब बीजेपी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पूर्व प्रदेश मंत्री श्रेष्ठा जोशी ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए मुख्यमंत्री के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने राज्यपाल से शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग कर दी थी। बहरहाल, हाल में प्रदेश की राजधानी भोपाल में बैठकों के दौर ने भी कयासों का बाजार गर्म कर दिया। कांग्रेस से भाजपा में आये ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के दबाव और इन लोगों से भाजपा में पहले से मौजूद नेताओं के आपसी अंतर्द्वंद से भी शिवराज हलकान हैं।

कर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा के प्रति आलाकमान की नापसंदगी किसी से छिपी नहीं है। सरकार भी अंदरूनी कलह से पीछा नहीं छुड़ा पा रही है। वहां येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाने तक की चर्चा गर्म हो गई। हालांकि, उनके समर्थक 65 विधायकों ने विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने पत्र लिखकर ऐसे विधायकों के खिलाफ एक्शन लेने की मांग की जो अपनी गतिविधियों से सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रहे हैं।

दरअसल, येदियुरप्पा के खिलाफ पार्टी के अंदर आक्रोश रह-रहकर सामने आ ही जाता है। ताजा विवाद की जड़ में फंड एलोकेशन को लेकर पिछले साल हुई एक मीटिंग है। विधानसभा क्षेत्रों के लिए फंड एलोकेशन पर हुई आंतरिक बैठक में बीजेपी के कुछ विधायकों ने ही सीएम के खिलाफ मोर्च खोल दिया था। फिर कैबिनेट विस्तार को लेकर मुख्यमंत्री अपने विधायकों के निशाने पर आ गए। हाल के दिनों में पंचामशाली लिंगायतों को आरक्षण के मुद्दे पर भी विवाद हुआ और फिर कोविड मैनेजमेंट को लेकर भी सीएम अपने मंत्रियों और विधायकों के निशाने पर आ गए।

मध्य प्रदेश में किसी भी नेतृत्व परिवर्तन से फिर से इन्कार किया गया है, लेकिन कर्नाटक में स्थिति थोड़ी अलग है। वहां खुद मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को बार बार स्पष्ट करना पड़ रहा है कि उन्हें नेतृत्व का भरोसा प्राप्त है और हर दो चार दिनों बाद पार्टी के अंदर से बदलाव की खबरों को हवा दी जाती है, लेकिन ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है।

पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की चाह रखने वाली भाजपा को जब चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो इसका असर सत्ताधारी टीएमसी से उसका रुख करने वाले दिग्गजों पर भी पड़ा। बार-बार खबरें आ रही हैं कि टीएमसी में फूट की नींव रखने वाले मुकुल रॉय घर वापसी पर विचार कर रहे हैं। उनके साथ राजीब बनर्जी का नाम भी जोड़ा जा रहा है।

कहा तो यहां तक जा रहा है कि ऐसे 50 से ज्यादा नाम हैं जो बीजेपी के सत्ता में नहीं आ पाने के बाद फिर से टीएमसी का रुख करने की गुंजाइश ढूंढ रहे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी के कुल 34 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे। इनमें 13 को दुबारा चुनाव मैदान में खड़ा किया गया। मुकुल और राजीब जैसे बड़े नेता घर वापसी करें या नहीं, लेकिन इतना तो तय माना जा रहा है कि टीएमसी से आए नेताओं का एक बड़ा जत्था इसकी कोशिशों में जरूर लगा है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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