प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 के तमाशे का भरपूर उपयोग अपने प्रचार के लिए किया। अगर किसी इवेंट के राजनीतिक अपहरण के बारे में समझना हो तो जी-20 के सम्मेलन पर नजर डालना चाहिए। जी-20 के आयोजन से देश को कितना लाभ हुआ है, इसकी समीक्षा तो बाद में होगी, फिलहाल हमें मोदी सरकार के उस बडे कदम के बारे में बात करना चाहिए जो लोगों को सदियों तक याद रहेगा और भारतीय राष्ट्र के चरित्र पर असर डालेगा। यह है इंडिया नाम छोड़ने और भारत नाम अपनाने का।
विदेशी मेहमानों को भेजे गए निमंत्रण-पत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का ओहदा प्रेसिडेंट ऑफ भारत बताया गया और हर स्थल पर इंडिया नाम की जगह भारत लिखा गया। कई लोग प्रधानमंत्री मोदी के फैसलों को चौंकाने वाले या मनमाना बता कर इन फैसलों के नकारात्मक असर को हल्का कर देते हैं। गोदी मीडिया तो मास्टरस्ट्रोक बता कर इन पर चर्चा की गुंजाइश ही खत्म कर देता है। कई बार विपक्ष भी इनके असर का आकलन नहीं कर पाता है।
असली बात यह है कि उनके फैसले हमें इसलिए चौंकाने वाले लगते हैं कि यह कल्पना ये बाहर है कि किसी लोकतांत्रिक मुल्क में इस तरह फैसले लिए जाएं। हमें अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि उनके फैसले न तो चौंकाने के लिए होते हैं और न मनमानी के लिए। ये पक्के तौर पर राजनीतिक होते हैं और निर्ममतापूर्वक लिए जाते हैं। इन फैसलों को सनक के तहत लिया गया मानना भारी भूल है। देश का नाम बदलने की कोशिश जरूरी मुद्दों से भटकाने का तात्कालिक लाभ तो देता ही है, लेकिन इसका असली उद्देश्य लोकतंत्र तथा संविधान को कमजोर करना है।
गौर से देखने पर एक बात तो साफ लगती है कि इंडिया बनाम भारत के सवाल पर संघ परिवार ने अपने वैचारिक पुरखे विनायक दामोदर सावरकर की लाइन छोड़ने की तैयारी कर रखी है। आरएसएस ने गुरू गोलवलकर वाली लाइन पर अमल करने की ठान ली है जिसमें वह भारत नाम को कुछ समय के लिए अपनाने के लिए तैयार थे, लेकिन सीधे-सीधे हिंदू राष्ट्र बताने वाले नाम को रखना ही उनका लक्ष्य था।
सावरकर ने अपनी किताब हिंदुत्व’ में लिखा है, “कुछ थोड़े उदाहरणों को छोड़ कर, शायद ही कभी विदेशियों ने हमारे शैशव का नाम भुला कर नए नाम ‘भारत’ का प्रयोग किया हो। आज भी सारा संसार हमें ‘हिंदू’ और हमारे देश को ‘हिंदुस्तान’ ही जानता है, मानो हमारे वैदिक पूर्वजों द्वारा स्वीकृत नाम की रक्षा कर रहा हो।”
सावरकर आगे लिखते हैं, “पर नाम का दस्तूर ही यह है कि जिस किसी का भी नाम हो वह दूसरों की इच्छा पर निर्भर करता है। हम अपना चाहे जो नाम रखना पसंद करें, नाम माना जाएगा वही जो और लोग पसंद करेंगे।”
“हमारे देश का प्राचीन से प्राचीन नाम जो ग्रंथों में मिलता है वह सप्त सिंधु या सिंधु है। ‘भारतवर्ष’ भी पीछे का नाम है और यह वैयक्तिक है। व्यक्ति-विशेष का गौरच चाहे कितना महान हो समय के साथ कम हो जाता है। महाराज भरत आए और चले गए। पर सिंधु अभी तक वर्तमान है और सदा ऐसे ही वर्तमान रहेगा।”
साल 1939 में हिंदू महासभा को संबोधित करते हुुए अपने अध्यक्षीय भाषण में सावरकर ने अपनी बात फिर से दोहराई और यह मांग की कि राष्ट्र का नाम हिंदुस्तान ही होना चाहिए। वह इंडिया नाम को भी स्वीकार करने को तैयार हैं, लेकिन भारत, आर्यावर्त जेसे नामों को अस्वीकार करते हैं। उनकी राय में एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देश का नाम हिंदुस्तान होना चाहिए।
सावरकर कहते हैं, “हमारे देश का नाम हिंदुस्तान ही होना चाहिए। इंडिया, हिंद जैसे शब्द भी मूल शब्द सिंधु से निकले हुए हैं और इनका प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ इस अर्थ में कि जो हिदुओं का राष्ट्र है यानि जहां हिदू निवास करते हैं। आर्यावर्त, भारतभूमि जैसे नाम निश्चित तौर पर प्राचीन हैं, मातृभूमि के गुणों को दर्शाने वाले विशेषण हैं और हमारे भद्र वर्ग को अच्छा लगते रहेंगे।”
लेकिन गुरू गोलवलकर की राय अलग थी और वह भारत को कुछ समय के लिए अपनाने के पक्ष में थे और मानते थे कि यह हिंदुओं के लिए ही है। शायद यह नाम संविधान ने स्वीकार कर लिया था तो इसका विरोध करना नहीं चाहते थे। लेकिन वह यही मानते थे कि आखिरकार सीधे हिंदू राष्ट्र कहा जाए।
‘अमृतवाणी’ नामक उनके कथनों के संग्रह में लिखा है, “इस राष्ट्रजीवन को किसी अन्य पर्यायी शब्द बोलने के लिए लोग सलाह भी देते हैं। आर्य का मतलब भी वही निकलेगा। भारत को कितना ही तोड़-मरोड़ कर कहा जाए तो भी उसमें अन्य कोई अर्थ नहीं निकाल सकता है। अर्थ केवल एक ही निकलेगा हिंदू। तब क्यों न हिंदू शब्द का ही असंदिग्ध प्रयोग करें। सीधा सादा प्रचलित शब्द हिंदू है।”
यह एक सरलीकरण होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ इंडिया और भारत दोनों के साथ-साथ प्रयोग के बदले सिर्फ भारत नाम के प्रयोग का फैसला विपक्षी दलों के गठबंधन का नाम इंडिया हो जाने के कारण किया है।
‘इंडिया दैट इज भारत’ यानि इंडिया जो भारत है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 का शुरूआती वाक्य है। इस वाक्य की रचना डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने की थी और वह इसमें कोई हेरफेर के लिए तैयार नहीं थे। यह अनुच्छेद 18 सितंबर 1949 यानि संविधान स्वीकृत होने के दो महीने पहले संविधान सभा के सामने आया। संविधान 26 नवंबर 1949 को स्वीकृत हुआ।
इस पर बहस आई तो कुछ लोगों ने इंडिया के आगे भारत रखने का, तो कुछ लोगों ने यह लिखने के लिए कहा कि इंडिया भारत का अंग्रेजी में अनुवाद है। कुछ लोगों ने सिर्फ भारत रखने की बात कही और देश का नाम दो शब्दों वाला रखने पर आपत्ति की। लेकिन डॉ आंबेडकर टस से मस नहीं हुए। उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता एचवी कामथ को डांट भी दिया कि वह वक्त बर्बाद कर रहे हैं। सविधान सभा के पास समय की कमी है। वे यह भाषाण कहीं और दे सकते थे।
सवाल उठता है कि ये वाक्य संविधान में ज्यों का त्यों क्यों रखा गया? सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस भारत शब्द के खिलाफ थी? क्या हिंदू महासभा या आरएसएस ने आजादी के आंदोलन के समय देश का नाम भारत रखने के लिए कहा था? क्या सावरकर के अध्यक्षीय भाषण से यह साफ नहीं हो जाता कि हिंदू महासभा देश का नाम हिंदुस्तान रखने के पक्ष में थी और भारत शब्द को लेकर उनका कोई आग्रह नहीं था?
गोलवलकर भी यही चाहते थे। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने भारत या आर्यावर्त नाम को सावरकर की तरह खारिज नहीं किया था। सच्चाई तो यही है कि भारत माता की छवि देशभक्तों के बीच इतनी लोकप्रिय थी कि सभी इसे अपने तरीके से परिभाषित करते थे। इसे हिंदुओं की देवी बताने और धार्मिक छवि बनाने को विरोध करते हुए महर्षि अरबिंदो ने 1920 में कहा था कि इसे किसी धर्म विशेष का प्रतीक नहीं बनाना चाहिए और यह सारे भारतीयों की प्रतीक है।
निश्चित तौर पर भारत का आख्यान शकुंतला-दुष्यंत की कहानी से निकला है। लेकिन इसे एक सेकुलर प्रतीक बनाने की कोशिश आजादी के आंदोलन में लगे लोग कर रहे थे। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी मशहूर किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा है कि किस तरह उन्होंने किसानों के बीच लोकप्रिय ‘भारत माता की जय’ के नारे को परिभाषित करने की कोशिश की।
यह 1937 का काल है जिस समय देश में सांप्रदायिकता अपने चरम पर थी। नेहरू ने किसानों को समझाया कि भारत माता कोई दुनिया से बाहर की चीज नहीं हैं। देश की जनता ही भारत माता है। यह भारत माता की धार्मिक छवि से अलग छवि थी। कांग्रेस और संविधान सभा ने इसी छवि को अपनाया और देश का नाम हिंदुस्तान रखने से परहेज किया। जाहिर है कि पाकिस्तान बनने के बाद हिंदुस्तान नाम रखने का सीधा अर्थ था कि हम धर्म के आधार पर देश के विभाजन को स्वीकार कर लेते।
पाकिस्तान के जन्मदाता मुहम्मद अली जिन्ना भी नहीं चाहते थे कि इंडिया नाम भारत को मिले क्योंकि इसका अर्थ था कि अंग्रेजों के मातहत इंडिया आजाद हो गया और पाकिस्तान नाम का टुकड़ा इससे अलग हुआ। यानि इंडिया ही मूल देश है। हिंदुस्तान नाम रखने का मतलब था धर्म के आधार पर बंटवारे को स्वीकार करना।
भाजपा और संघ परिवार यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इंडिया नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है। यह सच नहीं है। इंडिया नाम ग्रीक का दिया है और सिकंदर के पहले से प्रचलित है। यह लगभग उतना ही पुराना है जितना हिंदू नाम। सिंधु लैटिन में इंडस और फारसी में हिंद कहलाता है। पाकिस्तान बनने और फारसी की पहचान मुसलमानों की भाषा के रूप में हो जाने के बाद इंडिया नाम एक सेकुलर पहचान कराता है। संघ परिवार इस सेकुलर पहचान को मिटाना चाहता है और संस्कृत शब्द तथा संस्कृत महाकाव्य से निकले भारत नाम के जरिए एक सांप्रदायिक पहचान स्थापित करना चाहता है। वैसे भारत नाम की विरासत से उसका खास संबंध नहीं है। इसे वह जबर्दस्ती हथियाना चाहता है।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
+ There are no comments
Add yours