‘‘उनकी मौत और इसका हम पर, खासकर मुझ पर पड़ने वाले असर पर बातें तब से शुरू हो गईं जब मैं तीन साल की थी।’’ अरुंधति रॉय अपने संस्मरण ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के दूसरे पन्ने पर इस कथन को दर्ज करती हैं। यह इस पुस्तक का मूल कथ्य बन कर आगे के पन्नों में दर्ज होता गया है। उनकी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक अपनी मां के साथ लगातार तल्खियों के साथ विकसित होते रिश्ते के बीच से गुजरते हुए अपनी जिंदगी की जमीन तलाशने और समय से जूझने के अनुभवों को दर्ज करती है। उपरोक्त उद्धरण एक ऐसी तकलीफ का बयान है जो भारतीय समाज के परिवारों में उपजने वाली तकलीफ के साथ जाकर जुड़ जाता है।
यह भारत की 80 प्रतिशत आबादी का वह केंद्रीय दुख है जिसके इर्द-गिर्द जिंदगी का सारा ताना-बाना बुना जाता है। और, इसी में पूरी जिंदगी खप जाती है। अरुंधति रॉय इसी सामान्य दुख को खास बनाती हैं। इसे खास बनाने के लिए उनके पास मां की पढ़ाई हुई अंग्रेजी भाषा है जो भारत में एक खास स्थान रखती है और लिखने की वह तलब, जिसकी आदत उनके जीवन में शुमार होती गई। उन्होंने भारतीय समाज के अपने हिस्से आये अनुभवों को इन्हीं खास संयोगों से एक शानदार अभिव्यक्ति दिया।
‘मदर मैरी कम्स टू मी’ की पाठ संरचना काफी जटिल है। यह पुस्तक मां के बारे में लिखने से शुरू होती है, और जल्द ही लेखक के जन्म के साथ जाकर जुड़ जाती है। जन्म की गांठ जैसे-जैसे खुलती है, भारतीय समाज का चेहरा सामने आने लगता है। लेखक की जिंदगी का आरम्भ असम के चाय बागान और कोलकाता से होता है लेकिन जीवन का सारा खेल केरल के सुदूर छोटे से कस्बे के आसपास घटित होता है। प्रकृति के शानदार परिदृश्य में मानव जीवन का खेल नाटक की तरह दिखने लगता है। अरुंधति रॉय अपनी भावनाओं की रोशनी में उन पात्रों को जैसे-जैसे उभार कर सामने लाती हैं, त्रासदी के दंश भाषा से निकल कर आपके शरीर में चुभने लगते हैं।
मैरी रॉय की जिंदगी भारतीय परिवार की सामान्य कथा से कुछ अलग है। वह अपने पति से अलग होने की स्थिति में कभी भी उसके साथ रूबरू नहीं होतीं और न ही उससे अपने जीवन के गुजारे के लिए और न ही बच्चों के लिए कोई गुजारा भत्ता मांगती हैं। वह अपने परिवार में लौटती हैं और अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा करती हैं। उनका यह दावा उन्हें अपने समुदाय, परिवार के सामने लाकर खड़ा कर देता है और अंततः उनका यह कदम एक क्रांतिकारी निर्णय में बदल जाता है।
धीरे-धीरे वह एक मॉडल स्कूल बनाने की ओर बढ़ती हैं जिसमें उनके अपने बच्चे भी पढ़ते हैं। स्कूल का स्थापत्य लैरी बेकर ने बनाया। यह सब कुछ मां के निर्णयों के साथ बुना जाता है और इन्हीं निर्णयों से अरुंधति रॉय भी गढ़ी जाती हैं। इस गढ़े जाने में मां, बेटी और बेटा एक दूसरे से एक गहरे संबंधों के साथ दूर और भाव-तीव्रता में अकेले पड़ते जाने को अभिशप्त से दिखने लगते हैं। अरुंधति रॉय लिखती हैंः ‘‘दिल्ली लौट आने के बाद मैंने उन्हें लिखा कि मैं उन्हें प्यार करती हूं लेकिन मैं अब घर आने वाली नहीं हूं और मुझे अब आपके पैसे की जरूरत नहीं है। उनका जवाब इतना अपमानजनक था कि मैं उनका लिखा हुआ पढ़ना भी बंद कर दिया।’’
स्मृतियां कभी भी जंगल सी नहीं होती। वह कितना भी सघन और बीहड़ हो, उसमें बने रास्ते आपको मालूम होते हैं। अरुधंति रॉय की स्मृतियों में घूमते हुए आप कई संयोगों को घटित होते हुए देखते हैं। रंगमंच पर अचानक बदले हुए दृश्य की तरह। जे.सी. से उनकी मुलाकात और गोवा से वाया मुंबई उनकी वापसी एक भयावह अनुभव की तरह है। इस अनुभव के साथ जो अकेलापन है, उसमें कोई और नहीं है। उनकी प्रदीप से हुई मुलाकात भी एक संयोग की तरह घटित होता है। लेकिन, यह संयोग एक नये जीवन की शुरुआत बन जाता है।
यहीं से उनकी केरल की पृष्ठभूमि, हासिल अनुभव आने वाले समय में लेखन, सामाजिक जीवन में सक्रियता और विद्रूपताओं से टकराने का हौसले का बढ़ना संयोग और निर्णय के साथ आकार लेता चला जाता है। इस दौरान उनके पिता की उपस्थिति अतीत से जाने एक पात्र के आ जाने और बने रहने की तरह है। वह एक ऐसे शेष की तरह वर्णित हैं जो न भी हो तब भी उसका उतना ही असर है जितना उसका अतीत में बने रहने की वजह बचा रह गया। निर्मल वर्मा के चिरपरिचित अंदाज में कहा जाए तो वह एक ‘पेड़ में खोखल की तरह शेष हैं’। इस हिस्से को पढ़ते हुए मुझे निर्मल वर्मा की शैली ही याद आई। कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं जिससे आप भाग नहीं सकते। उनके पिता की उपस्थिति ऐसी ही है।
भारत में आज के दौर में अरुंधति रॉय सबसे लोकप्रिय लेखिका हैं। वह सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली लोकप्रिय लेखिका हैं। वह भारत के लेखकों के पूरे समुदाय में उन चंद लोगों में से एक हैं जिन्होंने लेखक की हैसियत को हासिल किया और लेखक की तरह अपने समाज और राजनीतिक परिवेश में हस्तक्षेप किया। वह पत्रकार नहीं हैं। आज भारत में पत्रकारों का एक समूह लेखकों की तुलना में अब भी सर्वाधिक मुखर है और दमन के बावजूद बोल और लिख रहा है।
लेखकों का एक बड़ा समूह या तो चुप हो गया है या सत्ता के साथ इस या उस तरीके से चलने लगा है। एक लेखक और पत्रकार होने का फर्क उसके प्रसंग और संदर्भ से जुड़ा हुआ है। ये दोनों ही जनवाद के लिए उतने ही जरूरी हैं जितनी इसको बनाये रखने के लिए पार्टी, कार्यकर्ता और नेतृत्व की जरूरत होती है। लेखक और पत्रकार होने के लिए देश-काल के औसत से अधिक ज्ञान, संदर्भ और परिप्रेक्ष्य का होना भी जरूरी है।
अरुंधति रॉय अपने पाठक को अपनी स्मृतियों की उस दुनिया में ले जाती हैं जहां से होते हुए वह आई हैं। वह किसी भी दुख को झेलने, किसी घटना को देखने, जीवन के चुनाव और लेखन में उतरने में कहीं भी वह अपने पाठक से खुद को विशिष्ट नहीं दिखाती हैं। अपने बारे में लिखते हुए वह पाठक से दूर नहीं जाती हैं, वह अपनी भावनाओं में उसे अपना साथी बनाते हुए चलती हैं। उनकी यह विशिष्टता घटनाओं को चुनने और अभिव्यक्त करते समय प्रसंगों और संदर्भों का एक विशाल ताना-बाना बुनने में है। ‘मैरी मदर कम्स टू मी’ उनके लेखन और चिंतन की इसी विशिष्टता की एक सघन अभिव्यक्ति है।
इस पुस्तक को पढ़ना लेखक के साथ लगातार बने रहना, उसे सुनना, उससे बात करना, उसके चुप हो जाने पर खुद ही सोचना और खुद के चुप हो जाने पर लेखक को बोलते हुए सुनने जैसा है। उनके साथ इस पुस्तक से गुजरते समय एक छोटा सा हिस्सा गायब सा लगा। मैंने यही सोचा, उनसे मिलने पर पूछूंगा: ‘आपने डा. भीमराव आंबेडकर और गांधी जी को क्यों छोड़ दिया? मां की जाति सूचक गालियों और उस पर आपका भयावह गुस्सा के संदर्भ में मुझे ‘एनहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ की आपकी लिखी हुई भूमिका याद हो आई!’
इस पुस्तक का अंत बर्तोल्ट ब्रेख्त के नाटकों के अंत की तरह हैः ‘‘हवा की गति बढ़ रही है। मुझे अपने कंधों को और मजबूत बनाना होगा। क्योंकि: (अ) किसी के भी साथ कुछ भी हो सकता है, (ब) सबसे अच्छा है खुद को तैयार रखना।’’ यह अपने समय पर लिखी गई शानदार टिप्पणी है और उस यथार्थ के करीब है जिसमें हम रह रहे हैं और अपने होने के अहसास के साथ आवाज उठा रहे हैं। हवा की गति कभी भी बंद नहीं होती, यह हमारी धरती का सच है। ठीक वैसे ही जैसे सूरज का उगना और धूप का होना सच है। लेकिन, ऐसा हम बारिश के बारे में नहीं कह सकते हैं। बहुत कुछ बदल रहा है।
अरुंधति रॉय की यह पुस्तक प्रकृति और जिंदगी में हो रहे बदलावों में एक अपने होने की सक्रिय उपस्थिति को दर्ज करती हैं। विश्व पटल पर एक देश की उपस्थिति एक इतिहास की मांग करती है और इस देश में एक इंसान अपनी उपस्थिति के लिए अपनी स्मृतियों में पीछे लौटता है। इतिहास और स्मृतियां अस्तित्व और जीवन के लिए सबसे जरूरी तत्व हैं। इन्हें सहेजना ही जीवन के रुके रास्तों को खोल देना होता है।
आज जब लोगों के बनाये घरों को गिराने में प्रभुत्वशाली वर्गों को समय नहीं लगता है, विभेद को बढ़ाने में दीवार को और ऊंची करने में कोई हिचक बाकी नहीं रहा, इतिहास को स्लेटों पर लिखी इबारत की तरह मिटा देने वाले हाथ और क्रूर होते जा रहे हैं, बर्बादियों पर चुप्पियां ही बयान बन गई हों, …ऐसे में खुद को सजोना और अभिव्यक्ति को दुरूस्त करना भी जरूरी है। अरुंधति रॉय की इस पुस्तक को इन संदर्भों में भी ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।
(अंजनी लेखक और टिप्पणीकार हैं।)