लघु पत्रिका आन्दोलन हिन्दी साहित्य की वह धड़कन रहा है जिसने मुख्यधारा की जड़ताओं, सत्ता–संरचनाओं और बाजारोन्मुख प्रवृत्तियों को लगातार चुनौती दी। इसी आन्दोलन की परंपरा में ‘लहर’ एक ऐसी पत्रिका के रूप में सामने आती है जिसने सीमित साधनों, उपेक्षा और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद साहित्य को उसकी सामाजिक–वैचारिक जिम्मेदारी से जोड़े रखा।
‘लहर’ को समझना वस्तुतः उसके सम्पादक प्रकाश जैन की साहित्यिक दृष्टि, वैचारिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक साहस को समझे बिना संभव नहीं है, क्योंकि यह पत्रिका किसी संस्थागत ढांचे की उपज नहीं, बल्कि एक सजग साहित्यिक चेतना का परिणाम रही है।
‘लहर’ की मूल पहचान प्रतिरोध है, लेकिन यह प्रतिरोध किसी नारेबाजी या क्षणिक उत्तेजना का नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सांस्कृतिक संघर्ष का प्रतिरोध है। यह पत्रिका सत्ता के हर रूप—राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक—से प्रश्न करती है। यहाँ प्रतिरोध का अर्थ केवल विरोध दर्ज करना नहीं, बल्कि उन वैचारिक आधारों को उजागर करना है जिन पर अन्याय, असमानता और दमन की संरचनाएँ टिकी होती हैं।
‘लहर’ की रचनाएँ समय के साथ चलने की बजाय समय के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखती हैं, और यही साहस इसे सामान्य साहित्यिक पत्रिकाओं से अलग करता है।
इस साहस के मूल में प्रकाश जैन की सम्पादकीय दृष्टि है। प्रकाश जैन उन सम्पादकों में नहीं रहे जिन्होंने पत्रिका को आत्मप्रचार या प्रतिष्ठा-निर्माण का माध्यम बनाया हो। उनका सम्पादन व्यक्तित्व-केन्द्रित नहीं, बल्कि विचार-केन्द्रित रहा है। ‘लहर’ में छपी रचनाएँ अक्सर असुविधाजनक प्रश्न उठाती हैं—ऐसे प्रश्न जो सत्ता को, समाज को और कभी-कभी स्वयं साहित्य को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।
प्रकाश जैन ने कभी यह नहीं चाहा कि पत्रिका लोकप्रियता की कसौटी पर खरी उतरे; उनका आग्रह हमेशा यह रहा कि वह वैचारिक ईमानदारी और रचनात्मक गुणवत्ता की कसौटी पर खरी उतरे।
‘लहर’ की एक बड़ी विशेषता उसका लोकतांत्रिक चरित्र है। यह पत्रिका स्थापित और नवोदित रचनाकारों के बीच कोई कृत्रिम दीवार नहीं खड़ी करती। यहाँ नाम नहीं, रचना महत्वपूर्ण है। प्रकाश जैन की सम्पादकीय नीति ने अनेक नये और हाशिये के रचनाकारों को पहली बार गंभीर पाठक-वर्ग तक पहुँचाया। यह कोई संयोग नहीं है कि ‘लहर’ में छपे कई लेखक बाद में हिन्दी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाते हैं।
लेकिन यह पहचान ‘लहर’ की कृपा से नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास से उपजी है जो एक ईमानदार सम्पादक किसी रचनाकार को देता है।
प्रकाश जैन की भूमिका केवल सम्पादक की नहीं, बल्कि एक सजग साहित्यिक कार्यकर्ता की रही है। वे साहित्य को समाज से काटकर देखने के पक्षधर नहीं रहे। उनके लिए साहित्य एक जीवित हस्तक्षेप है, जो सामाजिक यथार्थ से टकराता है, उसे समझता है और बदलने की आकांक्षा रखता है।
यही कारण है कि ‘लहर’ में कविता और कहानी के साथ-साथ आलोचना, वैचारिक लेख, सांस्कृतिक टिप्पणियाँ और समकालीन राजनीतिक-सामाजिक प्रश्नों पर गहन विचार मिलता है। यह बहुविधता पत्रिका को एकांगी होने से बचाती है और उसे एक समग्र सांस्कृतिक मंच बनाती है।
‘लहर’ का सम्पादन किसी सुविधाजनक समय में नहीं हुआ। यह वह दौर रहा है जब हिन्दी साहित्य में भी बाजार का दबाव, पुरस्कारों और संस्थानों की राजनीति तथा गुटबंदी का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। ऐसे समय में प्रकाश जैन ने समझौते की राह नहीं चुनी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने पत्रिका की वैचारिक स्वायत्तता को बनाए रखा। यह स्वायत्तता ही ‘लहर’ की आत्मा है। प्रकाश जैन जानते थे कि लघु पत्रिका का वास्तविक मूल्य उसकी संख्या, चमकदार कागज या विज्ञापनों में नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक दृढ़ता में होता है।
‘लहर’ की सामग्री में सामाजिक यथार्थ का तीखापन साफ दिखाई देता है। यहाँ वर्ग-संघर्ष, जाति-वर्चस्व, स्त्री-प्रश्न, सांप्रदायिकता, राज्य-हिंसा और सांस्कृतिक क्षरण जैसे मुद्दे किसी हिचक के बिना सामने आते हैं। प्रकाश जैन ने कभी इन विषयों को ‘असाहित्यिक’ या ‘विवादास्पद’ मानकर किनारे नहीं किया। उनके लिए साहित्य का मूल्यांकन उसकी शालीनता से नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई से होता है। यही दृष्टि ‘लहर’ को एक साहसी पत्रिका बनाती है।
प्रकाश जैन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है आलोचना के प्रति उनका स्वस्थ दृष्टिकोण। ‘लहर’ में आलोचना को किसी व्यक्ति या कृति को ध्वस्त करने के औजार के रूप में नहीं, बल्कि साहित्यिक विवेक को विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया। यहाँ आलोचना में तल्खी हो सकती है, असहमति हो सकती है, लेकिन दुर्भावना नहीं। यह आलोचनात्मक संस्कृति हिन्दी साहित्य में दुर्लभ होती जा रही है, और ‘लहर’ इस कमी को भरने का प्रयास करती है।
लघु पत्रिका आन्दोलन की ऐतिहासिक भूमिका को समझते हुए ‘लहर’ ने स्वयं को किसी मुख्यधारा का विकल्प नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक चेतना के रूप में स्थापित किया। प्रकाश जैन इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि लघु पत्रिकाएँ कभी भी सत्ता-संरक्षित या संसाधन-संपन्न नहीं रहीं, लेकिन उनकी शक्ति हमेशा वैचारिक निर्भीकता में रही है।
‘लहर’ इसी निर्भीकता की विरासत को आगे बढ़ाती है। यह परंपरा का अंधानुकरण नहीं करती, बल्कि परंपरा से संवाद करते हुए उसे समकालीन संदर्भों में पुनर्परिभाषित करती है।
‘लहर’ और प्रकाश जैन का संबंध केवल सम्पादक और पत्रिका का नहीं, बल्कि विचार और माध्यम का संबंध है। पत्रिका में जो स्वर सुनाई देता है, वह प्रकाश जैन की व्यक्तिगत आवाज़ नहीं, बल्कि उस सामूहिक विवेक की अभिव्यक्ति है जिसे उन्होंने लगातार प्रोत्साहित किया। यह विवेक प्रश्न पूछता है, असहज करता है और पाठक को निष्क्रिय उपभोक्ता बनने से रोकता है।
आज जब हिन्दी साहित्य में पत्रिकाओं का संकट गहराता जा रहा है, ‘लहर’ का महत्व और बढ़ जाता है। यह पत्रिका याद दिलाती है कि साहित्य केवल मनोरंजन या अकादमिक अभ्यास नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम भी है। प्रकाश जैन का सम्पादन इस विश्वास का प्रमाण है कि एक अकेला, प्रतिबद्ध व्यक्ति भी साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर सकता है।
अंततः ‘लहर’ को एक पत्रिका के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में देखना अधिक उचित होगा। यह दस्तावेज उस समय का है जब साहित्य ने समझौतों से इनकार किया और सच के पक्ष में खड़ा होने का जोखिम उठाया।
इस जोखिम के केंद्र में प्रकाश जैन हैं—एक ऐसे सम्पादक के रूप में जिन्होंने सत्ता की नहीं, बल्कि साहित्य की सुनी; लोकप्रियता की नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता की चिंता की। ‘लहर’ इसी कारण हिन्दी लघु पत्रिका आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होती है—एक ऐसी लहर, जो शांत नहीं, बल्कि चेतना को झकझोरने वाली है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)