शिगूफा छोड़ने के अलावा कुछ नहीं किया मोदी ने, संकट में डाल दिया देश को!

यह नरेंद्र मोदी सरकार की विफल विदेश नीति ही है कि अमेरिका भारत का बॉस बनने की कोशिश कर रहा है। जिगरी दोस्त रूस के साथ ही पुराने दोस्त ईरान से भी नाराजगी मोल ले ली गई है। ईरान पर इजरायल और अमेरिका हमले के बाद भारत को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। घरेलू गैस के साथ ही कमर्शियल गैस की भारी किल्लत पैदा हो गई है।

यदि पीएम मोदी अमेरिका के दबाव में न आते और इजरायल के साथ न खड़े होते तो आज की तारीख में ईरान चीन और रूस की तरह भारत को भी गैस देता रहता। मीडिया को हाईजैक कर मोदी लगातार जनता को गुमराह कर रहे हैं। 

जनता की गाढ़ी कमाई पर पूरी दुनिया में घूमने वाले पीएम मोदी एक पर्यटक से ज्यादा न हो सके। भारतीय मूल के लोगों को इकठ्ठा कर भाषण देने के अलावा कुछ न कर सके। उपलब्धि के नाम पर शून्य साबित हुए। पाकिस्तान युद्ध में हम अलग थलग पड़ ही चुके थे पर विदेश नीति पर भी कहीं नहीं टिक रहे हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन, चीन उससे भी खतरनाक, रूस और ईरान को नाराज कर लिया। अमेरिका अपमान के सिवाय कुछ दे नहीं सकता। इजरायल से भी हम कुछ ज्यादा नहीं ले सकते। अपनी छवि ही बिगाड़ेंगे

मोदी ने ज्यादा होशियार बनने के चक्कर में देश के सामने बड़ा संकट पैदा कर दिया है। जिस तरह से अमेरिका ने ट्रेड डील में हमारा कृषि बाजार अपने किसानों के लिए खुलवा लिया है। जिस तरह से रूस से तेल खरीदने के लिए भी भारत अमेरिका पर निर्भर हो गया है। अमेरिका से अनुमति लेनी पड़ रही है। रूस ने अब सस्ता तेल देने के लिए इनकार कर दिया है। इससे साबित होता है कि भारत विदेश नीति में पूरी तरह से अलग थलग पड़ चुका है। फिर भी एक बड़ा तबका आज भी अंधभक्ति के दौर में जी रहा है। 

यह सब  ऐसे ही नहीं हो गया है। एक रणनीति के तहत लोगों को भ्रमित किया गया है। मीडिया को हाईजैक कर अपने हिसाब से खबरें परोसी गई हैं, इस दौर के संकट के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार देश का मीडिया ही माना जाएगा। जो पत्रकार इस दमन के दौर में भी सच्ची पत्रकारिता कर रहे हैं वे क्रांतिकारी कहलाएंगे।

एक समय होता था कि पार्टियों को अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए पार्टी का बुलेटिन निकालना पड़ता था। सरकार को अपनी उपलब्धियों के प्रचार प्रसार के लिए कार्यक्रम करने पड़ते थे, विज्ञापन देने पड़ते थे। अब तो विभिन्न चैनल और अख़बार, पत्रिकाएं ही सरकार के बुलेटिन बन गए हैं। एंकर सत्ता के प्रवक्ता बन गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि मोदी ने एक रणनीति के तहत लोगों को बेवकूफ बनाया और लोग बनते गए। एक बड़ा तबका तो अब भी समझने को तैयार नहीं। 

इसे विवेकहीनता, अंधभक्ति और मायाजाल में फंसना ही माना जाएगा कि पीएम मोदी जो बोलते  रहे उस पर लोग विश्वास करते रहे। कोरोना भगाने के लिए थालियां और  तालियां भी बजाई। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने शिगूफा छोड़ने के अलावा कुछ नहीं किया पर उनके समर्थक उनको विश्वगुरु की संज्ञा देने लगे। अवतार बताने लगे। मतलब जिस भारत की प्रतिभा का लोहा दुनिया मानती है उस भारत के के बड़े दबके के सोचने और समझने की शक्ति मोदी ने खत्म कर ही दी। 

2014 लोकसभा चुनाव में मोदी ने वादा किया था कि सरकार बनने के बाद वह दुनिया से इतना काला धन ले आएंगे कि प्रत्येक नागरिक के खाते में कम से कम 15 लाख रुपए आ जाएंगे। प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात की। सरकार बनने पर किसानों की आय 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कर दी। 100 स्मार्ट सिटी और 100 स्मार्ट विलेज बनाने की बात की। बीजेपी के हर सांसद को एक गांव गोद लेने की बात की। और भी न जाने क्या-क्या बातें कीं।

कोई बताएगा कि इन वादों में से कौन सा वादा मोदी ने पूरा किया? किसी को कोई मतलब नहीं। अब 2047 एक सत्ता में रहने के लिए 2047 तक विकसित भारत बनाने का शिगूफा मोदी ने छोड़ दिया है। हिन्दू मुस्लिम का दांव अब हल्का पड़ता देख यूजीसी एक्ट बनाकर जाति का दांव चल दिया है। मतलब किसी भी तरह से सत्ता चाहिए।  

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