जी हाँ, ईरान के पास आसमान में कोई हार्मुज तो नहीं है कि साहिब जी के हवाई जहाज को रोक लिया जाए। वे तो गुलाम पिंजड़ा विहीन पंछी हैं अपने आका की एक धमकी पर सरेंडर हो जाते हैं। ईरान और रुस भारत के परम्परागत मित्र रहे हैं, कठिन वक्त के साथी हैं। लेकिन साहिब जी अमेरिकी चापलूसी की हदें तोड़ने में यह भी भूल जाते हैं कि ईरान और रुस भारत जैसे अपने मित्र राष्ट्र को जो सस्ते में हमें खनिज तेल भेजते रहे हैं।
हां, ये बात और है कि उस तेल को साहिब का अमीर दोस्त अंबानी विदेश भेजता रहा और शेष गैस, तेल पर राज्य और केंद्र सरकार ने इतना टैक्स लगाया, इतनी कमाई की कि भाजपा के आज हर शहर में आलीशान दफ्तर बन गए तथा अडानी अरब खरबपतियों की दुनिया में दूसरे नंबर तक पहुंच गए थे।
इधर ईरान पर इज़राइल अमेरिका ने हमला किया। उधर ऐप्स्टीन फाईल में फंसे ट्रम्प और साहिब की यारी ने जो गुल खिलाए उनकी तस्वीर सिंदूर आपरेशन के बाद समझ आने लगी। चाबहार छीन लिया गया, भारतीय कृषि सम्बन्धी डील चोरी छिपे हुई और इसके बाद राजाज्ञा की तरह फरमान जब आने लगे कि फलां से एक माह तेल खरीद लो,बंद करो। ईरान से आया तेल लौटा दो।
अब हमारे उपनिवेश वेनेजुएला से तेल लेना होगा वगैरह वगैरह। यह वही देश है जहां के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का रातों रात अमेरिका ने अपहरण किया और उन्हें जेल में डाल दिया। वहां अपनी पसंद की सरकार बनाई।
इस बीच ईरान के विदेश मंत्री भारत आए उनसे सौहार्द पूर्ण बातचीत हुई लेकिन तेल पर चुप्पी रही। सस्ते तेल की जगह अब अमेरिकी परस्ती वैनेजुएला की उपराष्ट्रपति अपने दल के साथ भारत आईं। आका की मर्जी के मुताबिक वहां से तेल आयात की सहमति दी गई है। विदित हो यह तेल काफी मंहगा पड़ने वाला है क्योंकि यह अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर काटकर लगभग 45 दिनों में भारत पहुंचेगा जबकि ईरान या रुस से आने में सिर्फ पांच दिन लगते।
बहरहाल, साहिब जी की मर्जी का क्या वे तो अमेरिका के गुलाम हैं। अमेरिका ने कहा इटली जाओ मैलोनी को समझाओ अपने जहाज इज़राइल भेजो लेकिन मेलौडी खाकर भी मैलोनी नहीं पिघली। वे अमेरिका की गुलाम नहीं और इधर अमेरिका ने भारत को वैनेजुएला की तरह ज़रखरीद उपनिवेश बना दिया है। राज क्या है सब जानते हैं।
सारा रिपोर्ट कार्ड आका के पास है वह कह भी चुका है कि साहिब का कैरियर उसके हाथ में है।अब भला वे सच्चे राष्ट्रभक्त होते तो अपना जुर्म कबूल करते और देश बचा सकते थे किन्तु संघ की दीक्षांत, सत्ता सम्मोहन, उसका सुख और उससे बाहर होने पर मिलने वाली स्थितियों को उन्होंने समझ लिया है। इसलिए सत्ता बचाने वे कितना गिरते चले जाएंगे ये समय बताएगा।
संदेह यह भी होता है कि आका ने बेवजह तो बुलाया नहीं होगा। पता नहीं देश का क्या हाल होने वाला है। आर्थिक तूफान से भी बड़ा कुछ होने की संभावना है। अच्छा यह है कि इस वक्त तथाकथित काक्रोच जो इतनी बड़ी तादाद में एकत्रित हुए हैं उनसे अपेक्षा है कि वे और तमाम देशभक्त मिलकर इस कड़वी सच्चाई से मुख नहीं मोड़ेंगे। देश को बचाने भरसक यत्न करेंगे।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)