ना अमेरिका ने तारा, ना चीन उबारेगा!

सारी दुनिया के साथ-साथ चीन के साथ भी भारत को व्यापार करना होगा- इस वाक्य से एक तरह की मजबूरी जाहिर होती है। बाकी दुनिया के सिलसिले में संभव है कि यह एक आम वक्तव्य हो, लेकिन चीन से भारत के जैसे रिश्ते रहे हैं और चीन को लेकर जिस तरह की धारणाएं देश में मौजूद हैं, उसके बीच सहज ही यह बात बेबसी जताने वाली नजर आने लगती है। विडंबना तब और स्पष्ट होती है, जब यह कहा जाए कि भारत आगे चल कर चीन से प्रतिस्पर्धा करने योग्य बन सके, इसके लिए आज उसको अपने कारोबार को चीन से जोड़ना अनिवार्य है।

मगर ऐसी ही बातें विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कही हैं। इकोनॉमिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम में चीन के साथ संबंध, और भारत की आर्थिक रणनीति पर उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा- “हमें सारी दुनिया के साथ कारोबार करना है। उसमें चीन भी शामिल है। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि हम आत्म-विश्वास के साथ उनसे संबंध बनाएं।”

जयशंकर ने कहा- “हमारे लिए चीन से संबंध का उद्देश्य अंततः अपनी अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण एवं अपनी क्षमताओं को विकसित करना है। ऐसा करने के क्रम में बेशक चीन के साथ व्यापार होगा। उससे अन्य आर्थिक संबंध बनेंगे।”

वैसे, जयशंकर ने ऐसा पहली बार नहीं कहा है। ना ही नरेंद्र मोदी सरकार का ऐसा रुख पहली बार सामने आया है। 2024 में ही उसकी ये समझ स्पष्ट रूप से सामने आई थी, जब संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह दो टूक कहा गया- ‘भारतीय मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से भारत को जोड़ने के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि भारत खुद को चीन की आपूर्ति शृंखला से संबंधित करे।’

हाल में सरकार ने इस समझ को व्यावहारिक रूप देने के लिए कई कदम उठाए हैं। ऐसा इसके बावजूद किया गया है कि चीन की अरुणाचल प्रदेश में कथित घुसपैठ की शिकायतें राजनीति में गरम मुद्दा बनी हुई हैं। बहरहाल, छह साल पहले लद्दाख में किसी चीनी घुसपैठ का सिरे से खंडन करने की तर्ज पर अरुणाचल के मामले में भी भारत सरकार ने ऐसी कोई घटना के होने की बात को सिरे से नकार दिया है। इस बीच सीमा विवाद हल करने के लिए वार्ता में गति आने के लगातार संकेत मिले हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एवं चीन से सीमा वार्ता में भारत के विशेष प्रतिनिधि अजित डोवाल ने ताजा बीजिंग यात्रा उसी सिलसिले का हिस्सा है। उसके पहले जुलाई में विदेश सचिव विक्रम मिसरी चीन गए थे। मीडिया रिपोर्टों में इन यात्राओं का एक खास मकसद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (12-13 सितंबर) में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भागीदारी के लिए अनुकूल माहौल बनाना भी बताया गया है। 

मगर अपनी अर्थव्यवस्था के “आधुनिकीकरण” के लिए चीन से जुड़ने की बात का संदर्भ अलग है। इसे दो बातों की स्वीकृति के रूप में देखा जाएगाः पहली यह कि भारत ने खुद को चीन के बराबर की ताकत के रूप में देखना छोड़ दिया है, और दूसरी यह कि 2020 की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में चीन से आर्थिक संबंधों की राह में जो रुकावटें खड़ी की गईं, उनसे भारत को कुल मिलाकर नुकसान हुआ- इस बात का अहसास नई दिल्ली में हुआ है। 

अब यह विडंबना ही है कि भारत में ऐसी आत्म-स्वीकृति उस समय की जा रही है, जब अमेरिकी थिंक टैंक- पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकॉनमिक्स दुनिया भर में चाइना स्क्वीज का कथानक प्रचारित करने में जुटा हुआ है। यह कथानक वहां कार्यरत अर्थशास्त्री और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने तैयार किया है। अर्थशास्त्री सौमित्र चटर्जी  के साथ मिलकर इस वर्ष मई में प्रकाशित अपने रिसर्च पेपर- China’s Mercantilist Squeeze on Developing Countries- में उन्होंने अपने इस सिद्धांत का बखान किया। इस नैरेटिव के मुख्य बिंदु हैं:

  • सामान्यतः जब कोई देश अमीर और तकनीक में उन्नत होता है, तो वह वस्त्र, जूते और साधारण मैनुफैक्चरिंग जैसे कम-कौशल वाले क्षेत्रों को छोड़ देता है। लेकिन चीन ने उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में प्रगति के बावजूद इन पारंपरिक क्षेत्रों पर भी अपना भारी नियंत्रण बनाए रखा है। 
  • चीन के कम-लागत वाले मैनुफैक्चरिंग को ना छोड़ने के कारण भारत, बांग्लादेश, वियतनाम, अफ्रीकी देशों आदि जैसे निम्न और मध्यम आय वाले मुल्कों के लिए औद्योगीकरण और रोजगार सृजन के पारंपरिक अवसर कम हो गए हैं। 
  • इस आलेख में तर्क दिया गया है कि चीन की अवमूल्यित मुद्रा (Undervalued Currency), भारी सब्सिडी, और आक्रामक निर्यात नीतियों के कारण गरीब देशों को घरेलू और निर्यात- दोनों बाजारों में चीन ‘निचोड़’ (Squeeze) रहा है। 

(https://www.piie.com/publications/working-papers/2026/chinas-mercantilist-squeeze-developing-countries)

गौरतलब है कि इस आलेख में भारत का भी उल्लेख हुआ है। इस रूप में इस कथानक के जरिए भारत के अधूरे औद्योगीकरण को ग्लोबल साउथ की आम शिकायत से जोड़कर पेश किया गया है। बहरहाल, इस समय दुनिया में चल रही बहस के बीच इस कथानक का प्रतिवाद भी पेश किया गया है। मसलन, चीन के विश्लेषक लियोन लियाओ का दावा है कि उपलब्ध साक्ष्य China Squeeze नैरेटिव की उलट हकीकत पेश करते हैं। लियोन का दावा है कि जो देश चीन केंद्रित आपूर्ति शृंखला से जुड़े, उनका औद्योगीकरण अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से हुआ है। जबकि जिन देशों ने संरक्षणवाद की नीतियां अपनाईं तथा भू-राजनीतिक समीकरणों से प्रेरित हुए, वे अपने यहां मैनुफैक्चरिंग ढांचे को मजबूती प्रदान नहीं कर पाए। 

लियोन ने लिखा है- ‘भारत ने पिछला दशक एक बहुत बड़े वादे के साए में बिताया है। उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, एक विशाल घरेलू बाजार, सस्ता श्रम, अंग्रेजी बोलने वाली इंजीनियरिंग प्रतिभा, डिजिटल सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की ‘चीन+1’ की नीति से निर्मित भू-राजनीतिक लाभ मौजूद रहे हैं। मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI), इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश, व्यापारिक माहौल में सुधार, और उत्पादों के स्थानीयकरण की दिशा में ठोस प्रयास किए हैं।

उसके मद्देनजर जैसे-जैसे चीन में मजदूरी दर बढ़ी, उद्योगों की उन्नति हुई, और स्वचालन (automation) में तेजी आई, भारत को श्रम-केंद्रित और मध्यम स्तर की मैनुफैक्चरिंग के स्थानांतरण का सबसे बड़ा लाभार्थी होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है। कुछ पूंजी तथा क्षमता को उसने आकर्षित भी किया है। लेकिन यह उस पैमाने की छलांग नहीं है, जिसकी उम्मीद इसकी बड़ी आबादी, नीतिगत महत्वाकांक्षा और भू-राजनीतिक अनुकूल परिस्थितियों के कारण की जाती थी।’

लियोन के मुताबिक इसके विपरीत कई देश चीन की आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ गए। वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और कंबोडिया ने निम्न मैनुफैक्चरिंग से चीन के बाहर निकलने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने चीनी कच्चे माल, मध्यवर्ती वस्तुओं (intermediate goods), मशीनों, औद्योगिक उपकरणों, और पुर्जों का आयात किया और अपनी खुद की निर्यात क्षमता का निर्माण करने के लिए उनका उपयोग किया। इन देशों की औद्योगिक उन्नति चीन की औद्योगिक क्षमताओं के इर्द-गिर्द हुई।

इस बात में दम है, लेकिन क्या वियतनाम जैसे देशों की आर्थिक प्रगति सिर्फ इसलिए हुई, क्योंकि वे चीनी आपूर्ति शृंखला से जुड़ गए? इसी सिलसिले में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि बेहतर क्षमताओं के बावजूद भारत अनुकूल परिस्थितियों का लाभ क्यों नहीं उठा पाया? क्या इसकी वजह चीन की आपूर्ति शृंखला से ना जुड़ना, चीन से कारोबार पर प्रतिबंध लगाना, और पश्चिमी पूंजी एवं तकनीक पर अधिक भरोसा करना रहा है? 

इन प्रश्नों का कोई सीधा उत्तर नहीं है। लेकिन जैसे China Squeeze कथानक के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाने की जरूरत है, वैसे ही इस दावे को भी सीधे स्वीकार नहीं किया जा सकता कि चीनी आपूर्ति शृंखला से जुड़ना विकास एवं प्रगति का रामबाण समाधान है। 

एक सौ से अधिक अर्थव्यवस्थाओं के अध्ययन के बाद विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट- Determinants of Global Value Chain Participation- में कहा था कि वैश्विक मूल्य शृंखला में किसी देश की भागीदारी वहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, भूगोल, राजनीतिक स्थिरता, मुक्त व्यापार नीति, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, और घरेलू औद्योगिक क्षमता पर निर्भर करती है।

इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि अंततः कोई देश कितना विकसित होगा, यह उसके अपने घरेलू हालात और वहां अपनाई गई नीतियों से तय होता है। इस रिपोर्ट का सार यह भी है कि आज के दौर में औद्योगिकरण का मतलब सिर्फ वस्तु व्यापार नहीं है। बल्कि इसका संबंध सीमापार से हासिल होने वाली सामग्रियां (इनपुट), आपूर्ति संबंध, कॉरपोरेट नेटवर्क और उत्पादन ढांचे के संगठन की स्थिति से भी है। 

यह बेहिचक कहा जा सकता है कि इनमें से अनेक पहलू भारत में मौजूद रहे हैं। फिर भी भारत चीन जैसी विकास कथा नहीं लिख पाया है, तो इसकी वजहों की तलाश की जानी चाहिए। यहां इन तथ्यों का उल्लेख जरूरी है कि भारत की स्थिति ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देशों जैसी कमजोर नहीं रही है। भारत के पास सॉफ्टवेयर सेवाओं, औषधि उद्योग, ऑटो-मोबिल उद्योग के पार्ट-पुर्जों का उद्योग, वित्तीय सेवाएं, ऊर्जावन उद्यमी, अपेक्षाकृत बेहतर पूंजी बाजार, और तकनीक एवं प्रबंधकीय योग्यता रखने वाला मानव संसाधन मौजूद रहा है। 

इसलिए यह सवाल कभी प्रासंगिक नहीं रहा कि भारत के पास विकास की क्षमता है या नहीं। मुद्दा यह है कि भारत अपनी क्षमताओं का लाभ क्यों नहीं उठा पाया? या इस प्रश्न को और ठोस रूप में इस तरह पूछा जा सकता है कि भारत के पास मौजूद क्षमताओं के लाभ कुछ तबकों तक ही सीमित क्यों रह गए- वे व्यापक संपन्नता का स्रोत क्यों नहीं बने?  

आजादी के बाद से भारत में औद्योगिक नीतियां अपनाई गईं। आजादी के बाद पहले चार दशक में ये नीतियां नियोजित विकास की समझ से जुड़ी थीं। उस दौर में भारत को तत्कालीन सोवियत संघ से विशेषज्ञता एवं मशीनों की मदद भी मिली। मगर भारत की योजनाबद्ध विकास की नीति सोवियत संघ या आज के चीन जैसे परिणाम नहीं दे सकी। हालांकि उस दौर की अपनी उपलब्धियां हैं, इसके बावजूद सच यही है कि उस दौर में भारत मानव विकास से लेकर आम आर्थिक विकास की वैसी जमीन तैयार नहीं कर सका, जो आगे चल कर देश की सर्वांगीण उन्नति का आधार बनती।

मोदी काल में मेक इन इंडिया, पीएलआई, इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर पूंजी खर्च, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, आयात शुल्क के जरिए घरेलू उद्योग को संरक्षण आदि जैसी नीति एवं कार्यक्रमों को अपनाया गया। इसके बावजूद भारत मुक्त अर्थव्यवस्था वाले जापान, दक्षिण कोरिया आदि देशों जैसी विकास यात्रा तय कर पाया है। 

क्या सचमुच भारत सरकार यह सोचती है कि चीन की आपूर्ति शृंखला से जुड़ने से इस स्थिति का समाधान निकल आएगा? या चीन की आपूर्ति शृंखला से जुड़ना भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की जरूरत है, जिसे अपने मुनाफा केंद्रित कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए चीन निर्मित सस्ते इनपुट, तकनीक और कुशल कर्मियों की आवश्यकता है? इस सिलसिले में यह जिक्र जरूरी है कि नरेंद्र मोदी सरकार की आम सोच कुछ गिने-चुने पूंजीपति घरानों को अपनी विकास नीति के केंद्र में रखने की रही है। वह उन घरानों के हित को ‘राष्ट्रीय हित’ के रूप में पेश करती रही है।

जयशंकर के ताजा बयान के संदर्भ में यह सवाल इसलिए प्रासंगिक हो उठा है, क्योंकि इस बारे में स्पष्टता का अभाव एक बार फिर देश को गलत दिशा में ले जाएगा। इस पर इसलिए भी विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि सरकार का ध्यान अंदरूनी प्राथमिकताओं में किसी तब्दीली पर नहीं है। उसकी सोच में यह पहलू सिरे से गायब है कि तमाम सकारात्मक पहलू होने के बावजूद भारत में जो कमी है, उसकी जड़ में राज्य एवं पूंजी के बीच बिगड़े तालमेल की मौजूदगी है। पूंजी से नियंत्रित एवं उसकी प्राथमिकताओं से संचालित राज्य (अपवाद स्वरूप आए एक दौर को छोड़ कर) कहीं भी जन-केंद्रित विकास हासिल कर पाया हो, इसकी संभवतः एक भी मिसाल नहीं है। 

आज यह स्वीकार करने की जरूरत है कि आजादी के बाद भारत में राज्य ने जो भूमिका अपनाई, वह अपर्याप्त थी। राज्य ने तब अपनी भूमिका विभिन्न सामाजिक हितों के बीच समन्वय बैठाने वाली संस्था के रूप में तय की। हालांकि नियोजन को अपनाया गया और पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए उसे लागू करने के कई मायनों में सफल प्रयास भी हुए, लेकिन राज्य भूमि संबंधों को बदलने, पूंजी का उचित दिशा-निर्देशन करने, समाज के सभी हिस्सों तक शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को पहुंचा कर कुशल मानव श्रम तैयार करने और राष्ट्रीय लक्ष्य तय कर उसके मुताबिक सभी सहभागी इकाइयों को नेतृत्व देने की प्रभावी भूमिका निभाने में कमजोर साबित हुआ।

नव-उदारवादी नीतियों को अपनाए जाने के बाद तो राज्य ने अपनी पूर्ववर्ती भूमिका भी छोड़ दी। तब उसने अपनी भूमिका पूंजी (यानी पूंजीपति वर्ग) के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित करने वाली एजेंसी के रूप में बनाई। इसका सीधा परिणाम सामाजिक एवं मानव विकास की दीर्घकालिक योजनाओं में निवेश की उपेक्षा के रूप में सामने आया है।

चुनावी मजबूरी के कारण प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण का चलन ज़रूर बढ़ा है, लेकिन यह विकास यात्रा नहीं है। दरअसल, तजुर्बा यह है कि चुनावी लोकतंत्र वाले देशों में निवेश पर उपभोग और सार्वजनिक धन निर्माण पर प्रत्यक्ष जन कल्याणकारी योजनाओं को तरजीह देने की प्रवृत्ति सहज हावी होती जाती है। इससे लोगों को फौरी राहत भी मिलती है, लेकिन लंबे समय में यह रुझान नुकसान का सौदा बन जाता है। यही अब होता दिख रहा है।

आज असल जरूरत इस पूरी स्थिति की आमूल समीक्षा की है। यह सवाल उठाने की आवश्यकता है कि क्या भारतीय राज्य ने जिस तरह अपनी शक्तियां पूंजी को हस्तांतरित की हैं और जिस तरह अपने सीमित संसाधन नकदी हस्तांतरण जैसी योजनाओं पर खर्च किए हैं, उसके मद्देनजर क्या राष्ट्रीय शक्ति के निर्माण में वह सक्षम भी रह गया है?

आज असल मुद्दा भारतीय राज्य की क्षमता का ही है। इस पर मंथन किए बिना कभी अमेरिका तो कभी चीन से जुड़ कर आगे बढ़ने की सोच खुद को भ्रम में रखने और दूसरों को भ्रमित करने का जरिया ही हो सकता है। अतः ये बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि इस स्थिति में चीन के भरोसे आर्थिक आधुनिकीकरण की आस का वही हश्र होगा, जो कई दशकों तक अमेरिका से जोड़ कर रखी गई उम्मीदों का हुआ है।  

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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