जनजातीय समाज पर कैसे लागू होगी समान नागरिक संहिता?

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पहले लगता था कि समान नागरिक संहिता लागू करने वाला उत्तराखण्ड पहला राज्य होगा। लेकिन अब विधि आयोग की तत्परता और  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात से संकेत मिलने लगा है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले ही सारे देश में और कम से कम भाजपा शासित राज्यों में तो समान नागरिक संहिता लागू हो ही जायेगी। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा बनाया जा रहा समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है, जिसकी पूरी जानकारी 22वें विधि आयोग को देने के बाद गृहमंत्री अमित शाह को भी दी जा चुकी है।

इसलिये जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में तैयार ड्राफ्ट उत्तराखण्ड के काम आये या न आये मगर ऐन वक्त पर विधि आयोग और भारत सरकार के काम जरूर आ ही जायेगा। संभव है कि उत्तराखण्ड के ड्राफ्ट को ही संवैधानिक, न्यायिक और व्यवहारिकता की कसौटी पर कसने के बाद भारत सरकार अपनी समान नागरिक संहिता बना ले जो कि लोकसभा से आसानी से पास हो जायेगी साथ ही राज्य सभा से भी थोड़ी मशक्कत के बाद पारित हो ही जायेगी।

लेकिन सवाल उठता है कि इतनी अधिक सांस्कृतिक विविधताओं वाले इस देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक हो पायेगी? खास कर जनजातीय भारत में इसका लागू होना संभव हो सकेगा ? मेघालय जैसे राज्य जहां मातृ सत्तात्मक समाज है, वहां समान नागरिक संहिता कैसे कैसे थोपी जा सकेगी। कर्नाटक और केरल में भी कुछ समुदाय मातृ वंशात्मक हैं। इन्हीं कारणों से जनजातीय बहुल पूर्वाेत्तर में नये पंचायती राज्य संबंधी संविधान का 73 वां संशोधन लागू नहीं हुआ था।

समान नागरिक संहिता का लक्ष्य विभिन्न धर्मो और समुदायों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, भरण-पोषण सम्बन्धी नियमों में एकरूपता लाना है। नागरिकों के धर्म और धार्मिक रीति रिवाजों की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों को लेकर इस बहुप्रतीक्षित कानून पर सवाल तो उठ रही रहे हैं। इसके साथ ही संविधान ने 7 सौ से अधिक जनजातियों और उनकी सैकड़ों उपजातियों को भी उनके रीति रिवाजों और परम्परागत जीवन शैली की गारंटी भी दे रखी है।

इसी गारंटी के चलते अनुसूची-6 के पूर्वोत्तर राज्यों में संविधान के 73 वां और 74 वां संशोधन लागू नहीं हो सके। मोदी सरकार ने दृढ़ता का परिचय देते हुये अनुच्छेद 370 की धारा 35 ए तो हटा दी मगर अनुच्छेद 371 की ए से लेकर एच तक की धाराएं अब भी ज्यों की त्यों हैं। धारा 370 हटाने के पीछे भी कहा गया कि एक देश और एक कानून सोच लागू किया गया। अब कहा जा रहा है कि समान नागरिक संहिता के पीछे भी वही सोच है।

बहुत संभव है कि  संविधान के 73 वें और 74वें संशोधन की तरह पूर्वोत्तर राज्यों को समान नागरिक संहिता में भी छूट दे दी जाय। लेकिन सवाल केवल पूर्वोत्तर का नहीं है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की कुल जनसंख्या लगभग 4.57 करोड़ दर्ज हुयी थी। जबकि जनजातीय समाज जम्मू-कश्मीर से लेकर अण्डमान निकोबार और पूर्वोत्तर से लेकर गुजरात तक फैला हुआ है।

सन् 2011 की जनगणना में आदिवासी जनसंख्या 10.42 करोड़ थी जो कि कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। इनमें आंगे, सेंटिनली, राजी और जरावा जैसी 18 ऐसी आदिम जातियां भी हैं जिनका अस्तित्व तो खतरे में है ही लेकिन उन तक शासन-प्रशासन की भी पूरी तरह पहुंच नहीं है। देश में सर्वाधिक 14.7 प्रतिशत जनजातीय आबादी मध्य प्रदेश में है। 2011 की जनगणना के अनुसार नागालैण्ड में 86.46 प्रतिशत मेघालय में 86.15, मीजोरम 94.4, मणिपुर 40.9, अरुणाचल 68.8  और छत्तीसगढ़ में 30.6 प्रतिशत जनजातीय आबादी है।

संथाल भारत के सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक है जो मुख्यतः असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में फैले हुए हैं। इसी प्रकार भील भी सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक हैं जो कि छत्तीसगढ़, गुजरात कर्नाटक, मध्य प्रदेश महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान में निवास करते हैं। अगर देश की इतनी बड़ी जनसंख्या को समान नागरिक संहिता से अलग कर दिया जाता है तो संहिता में समानता कहां रह जाती है। 

धर्म और धार्मिक परम्पराओं की आजादी की ही तरह संविधान ने जनजातीय समाज को उनकी परम्परागत प्रथाओं की आजादी की गांरटी भी दे रखी है। इसीलिये संविधान में अनुसूची 6 का समावेश किया गया है। यह गारंटी भारत की सांस्कृतिक विविधता की अनूठी धरोहर को संरक्षित रखने के लिये दी गयी है। वास्तव में अपनी प्रथाओं पर कायम हमारी जनजातियां नये और प्राचीन युग के बीच की कडियां या सेतु हैं। हमारे संविधान निर्माता इस सेतु को हर हाल में बचाना चाहते थे। अगर जनजातियों पर समान नागरिक संहिता थोपी गयी तो उनकी पहचान ही समाप्त हो जायेगी।

समान नागरिक संहिता की सबसे बडी विसंगति मातृसत्तात्मक समाज वाले मेघालय में नजर आ रही है। मेघालय के खासी और गारो समाज में विवाह, तलाक और गोद लेने की भिन्न परम्पराओं के साथ ही सम्पत्ति और उत्तराधिकार के नियम भी बिल्कुल उलट हैं। मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं। सबसे छोटी बेटी, जिसे का खद्दूह के नाम से जाना जाता है, जिसको पैतृक संपत्ति विरासत में मिलती है। यदि किसी परिवार में बेटी का जन्म नहीं हुआ है, तो परिवार या तो एक बेटी को गोद लेता है या सबसे बड़ी महिला की बहन की बेटी को संपत्ति सौंप देता है।

शादी के बाद पति अपनी सास के घर रहते हैं और पत्नी के गोत्र नाम को अपनाते हैं। बच्चे अपनी मां का उपनाम धारण करते हैं। ससुर की मौत के बाद सास को पत्नी के रूप में रखना होता है। यदि कोई जोड़ा असंगति से लेकर संतान की कमी जैसे कारणों से अलग होना चाहता है, तो वह जोड़ा बिना किसी सामाजिक कलंक या बंधन के अलग हो सकता है। खासी कुर कबीले के अनुसार ये प्रथाएं ऐसे नियम हैं जो विरासत और संपत्ति के स्वामित्व को नियंत्रित करते हैं। वहां की खासी हिल्स ऑटोनाॅमसडिस्ट्रिक्ट कांउंसिल ने समान नागरिक संहिता के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है।

इसी प्रकार नागालैण्ड ट्राइबल काउंसिल ने भी इस संहिता को लेकर चिन्ता जाई है। क्योंकि उनके यहां सामाजिक परम्पराएं भिन्न होने के साथ ही उन्हें अपनी परम्पराओं की संवैधानिक गारंटी मिली हुयी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मेघालय की आबादी में 86.15 प्रतिशत आदिवासी थे। जिनमें खासी लोगों की आबादी लगभग 13 लाख थी।

भारत में ऐसे कुछ मातृवंशीय समाज हैं जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से मातृवंशीय परम्परा का पालन किया है। हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मातृसत्तात्मकता की सीमा और प्रथा विभिन्न समुदायों के बीच भिन्न होती है, और कई लोगों ने विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से समय के साथ अपनी परम्पराओं में बदलाव किया है। जैसे कुछ जनजातीय समाजों में बहुपत्नी प्रथा के साथ ही बहुपति प्रथा भी रही है मगर सामाजिक बदलाव के कारण बहुपति प्रथा को उन्हीं समाजों में हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। केरल में नायर समुदाय भी ऐतिहासिक रूप से मातृसत्तात्मक प्रणाली का पालन करता रहा है जिसे मरुमक्कथायम के नाम से जाना जाता है।

हालांकि, बदलते सामाजिक मानदंडों और कानूनी सुधारों के कारण, नायरों के बीच मातृवंशीय प्रणाली काफी कम हो गई है, और पितृवंशीय प्रणाली अब अधिक प्रचलित है। अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी में रहने वाला का छोटा सा अपातानी जनजाति समाज भी स्त्री प्रधान है, वहां भी संपत्ति और भूमि का स्वामित्व और प्रबंधन महिलाओं द्वारा किया जाता है। कर्नाटक के बंट और बिलावा समुदाय भी मातृसत्तात्मक माने जाते हैं। इनमें विरासत भले ही बहन के नाम होती है लेकिन परिवार के मुख्य निर्णय भाई ही लेता है। ऐसे बहुरंगी समाज में समान नागरिक संहिता की बात करना जितना असान है मगर लागू करना उतना ही मुश्किल है।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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