नए संसद भवन में एक महिला की राजनीतिक बलि!

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कल की तारीख संसद के लिए शर्मसार कर देने वाली थी। लोकसभा की तेज तर्रार, काफी पढ़ी लिखी और तथ्यों के साथ सदन में अपनी बात रखने वाली सांसद महुआ मोइत्रा की शुक्रवार को राजनीतिक बलि चढ़ा दी गई। उन्हें लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया। विपक्ष वाले हंगामा मचाते रहे, चर्चा की बात करते रहे और महुआ को अपनी बात रखने की गुजारिश आसन से करते रहे। लेकिन आसन यानी स्पीकर को किसी की परवाह की कहां? किसी की बात नहीं सुनी गई। कोई दलील काम नहीं आयी और फैसला यही हुआ कि महुआ मोइत्रा को तत्काल लोकसभा से निष्कासित कर दिया जाए। संसद का फैसला था। इस फैसले को कौन चुनौती देता? इस फैसले के साथ ही सदन अगली तारीख तक के लिए स्थगित हो गया। महुआ पलकें नीचे किये सदन से बाहर हो गईं। 

बता दें कि महुआ मोइत्रा टीएमसी की सांसद रही हैं। वे बंगाल की कृष्णनगर सीट से जीतकर 2019 में संसद में पहुंची थीं। ममता बनर्जी को आज भी महू पर गर्व है और गर्व तो देश के उन तमाम लोगों को भी है जो लोकतंत्र में यकीन रखते हैं और बोलने की आज़ादी पर विश्वास करते हैं।  

महुआ पर इल्जाम है कि उन्होंने एक कारोबारी से पैसे लेकर संसद में वैसे सवाल किये जिससे अडानी को धक्का लगा। मोदी और अडानी के रिश्तों का खुलासा हुआ। जिस कारोबारी से महुआ ने कथित रूप से पैसे लेकर सदन में सवाल किये हैं उसके कोई सबूत आज तक सामने नहीं आये लेकिन कारोबारी ने एक हलफनामे के जरिये कहा है कि उसने महुआ को घूस दिए हैं। और ये घूस सवाल पूछने के लिए दिए हैं। 

दरअसल महुआ की यह पूरी कहानी एक फ़िल्मी कहानी जैसी है। महुआ के एक ख़ास दोस्त हैं जो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस भी करते हैं। महुआ की उनके साथ दोस्ती थी लेकिन बाद में सब कुछ खराब हो गया।पहले तो उनके दोस्त ने महुआ पर कुत्ता चोरी का आरोप लगाया। और फिर बाद में इस बात का खुलासा किया कि महुआ ने एक कारोबारी से पैसे लेकर अडानी के खिलाफ सदन में सवाल किये हैं। महुआ के दोस्त ने इसकी शिकायत की थी। बाद में इसी मामले को बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने आगे बढ़ाया और इसकी शिकायत लोकसभा स्पीकर के पास की। इसकी जांच कराने की मांग की गई। सांसद दुबे ने इस मामले की शिकायत कई और मंचों पर की।               

लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने मामले की जांच के लिए इसे संसद की सदाचार समिति यानी एथिक्स कमेटी को भेज दिया। एथिक्स कमेटी ने इसकी सुनवाई भी की। इस कमेटी के 9 सदस्य हैं जिसमें पांच सदस्य बीजेपी के हैं। चार सदस्यों में अलग-अलग दल के सांसद हैं। कह सकते हैं विपक्षी सांसद हैं। एक दिन महुआ को कमेटी के सामने बुलाया गया। महुआ से कई निजी सवाल पूछे गए। महुआ तमतमाकर बाहर निकल गईं और समिति के अध्यक्ष विनोद सोनकर पर ही कई  आरोप लगा दिए। लेकिन सोनकर साहब की अपनी तैयारी थी। इधर निशिकांत दुबे की शिकायत अलग से थी। इस समिति के चार सांसदों ने महुआ के खिलाफ अपना तर्क दिया जबकि पांच सांसदों ने महुआ के खिलाफ तर्क देकर एक पांच सौ पेज की रिपोर्ट तैयार कर दी। 

उस रिपोर्ट में संसद को सिफारिश किया गया कि महुआ ने अनैतिक और कानून, संविधान और संसदीय आचरण के खिलाफ काम किया है इसलिए इन्हें संसद से बर्खास्त कर दिया जाए। 

शुक्रवार को संसद में एथिक्स कमेटी की वही रिपोर्ट पहले पेश की गई और फिर संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने स्पीकर से आग्रह किया कि एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार किया जाए।          

मजे की बात तो यह रही कि लगभग पांच सौ पन्ने की इस रिपोर्ट को पढ़ने और समझने के लिए विपक्ष के कई सांसदों ने स्पीकर से आग्रह किया कि कम से कम दो दिनों का समय इसे पढ़ने के लिए दिया जाए। लेकिन किसी की बात नहीं सुनी गई। 

इसके बाद कई सांसदों ने स्पीकर से यह भी आग्रह किया कि जिस सांसद पर एथिक्स कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी है कम से कम उसे तो अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। लेकिन स्पीकर ने इस आग्रह को भी ठुकराया और फिर वोटिंग के जरिये यह घोषित कर दिया गया कि महुआ मोइत्रा पर एथिक्स कमेटी द्वारा लगाए गए इल्जाम सही हैं और एथिक्स कमेटी ने महुआ को बर्खास्त करने की जो सिफारिश की थी उसे सही मानते हुए सदन ने महुआ को दोषी करार देते हुए अपना फैसला सुना दिया।  

अब सबसे बड़ा सवाल है कि महुआ आगे क्या करेंगी ? सवाल यह भी है कि संसद और सरकार भी उसके साथ आगे क्या कुछ कर सकती है? महुआ अदालत का खटखटा सकती हैं तो सरकार भी उस पर कार्रवाई कर सकती है। एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महुआ ने जो किया है उससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी क्षति हो सकती है इसलिए इस मामले की जांच किसी एजेंसी से कराई जाए। अगर इसी बिंदु को आगे बढ़ाए तो कहा जा सकता है कि महुआ की परेशानी आगे भी बढ़ सकती है। उनके ऊपर लगाए गए आरोप की जांच कराई जा सकती है और फिर उसके पीछे किसी जांच एजेंसी को लगाया जा सकता है। 

लेकिन आगे क्या होगा यह तो देखने की बात है। बड़ी बात तो यह है कि आखिर महुआ के खिलाफ बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे क्यों सक्रिय हुए? जब महुआ को सजा दी जा रही थी तब दुबे खूब मुस्कुरा रहे थे। जाहिर है यह सब एक साजिश भी हो सकता है। यह सब बीजेपी की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। बता दें कि कुछ महीने पहले ही संसद से सड़क तक महुआ और दुबे के बीच जमकर शाब्दिक बाण चले थे।

दुबे की डिग्री पर महुआ ने सवाल खड़ा किया था और उनकी डिग्री को महुआ ने चुनौती भी दी थी। जहां से डिग्री लेने की बात कही गई थी उस विश्वविद्यालय ने भी डिग्री की सत्यता की पुष्टि नहीं की थी। फिर यह मामला स्पीकर तक पहुंचा। स्पीकर ने इसे जांच कमेटी के पास भेज दिया। लेकिन अभी तक उसकी जांच नहीं की जा सकी है। लेकिन दुबे शक के दायरे में तो आ ही गए थे। उसी समय से सांसद दुबे और महुआ के बीच अदावत शुरू हो गई थी। 

महुआ की बर्खास्तगी की सभी विपक्षी दलों ने निंदा की है और विरोध भी किया है। विरोध करने वालों में सोनिया गांधी भी शामिल रहीं। लेकिन बाद में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया ने जो बयान दिया है वह काफी कुछ कहता नजर आ रहा है। हालांकि अखिलेश यादव ने किसी का नाम नहीं लिया है लेकिन उन्होंने कहा है कि  विपक्ष के प्रति भाजपा नेतृत्व का विद्वेषपूर्ण रवैया पूर्णतः असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है और ऐसा लगता है जैसे भाजपा ने विपक्ष की हर आवाज को कुचलने का इरादा कर लिया है।

अखिलेश ने अपने बयान में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भाजपा को न विश्वास है और न ही संविधान पर उसकी निष्ठा है। डॉ भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में संविधान के दुरुपयोग और एकाधिकारी प्रवृत्ति के प्रति संदेह जताया था। उनका अंदेशा सही साबित होने जा रहा है। उन्होंने कहा कि भाजपा राज में अघोषित तानाशाही की प्रवृत्तियां साफ नज़र आ रही हैं। अच्छा हो, सत्ताधारी दल विपक्ष के लोगों की सदस्यता लेने के लिए किसी सलाहकार को रख ले जिससे मंत्रीगण और सत्तापक्ष के सांसदों और विधायकों का समय षड्यंत्रकारी गतिविधियों में न लगकर लोकहित के कार्यों में लगे। जिन आधारों पर सांसदों की सदस्यता ली जा रही है, अगर वह आधार सत्तापक्ष पर लागू हो तो शायद उनका एक दो सांसद, विधायक ही बचेगा।

अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा अपने विरोधियों की सदस्यता छीनने के कुचक्र के साथ उनको बदनाम करने के लिए सरकारी एजेंसियों, इनकम टैक्स, ईडी, सीबीआई आदि का इस्तेमाल करके इन संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी नष्ट कर रही है। लोकतंत्र में ऐसी हरकतों का कोई स्थान नहीं हो सकता है।

उधर सदन से निष्कासन के बाद महुआ मोइत्रा ने कहा है कि आचार समिति के पास निष्कासित करने का कोई अधिकार नहीं है और यह बीजेपी के अंत की शुरुआत है। उन्होंने यह भी कहा कि वह अभी 49 साल की हैं और अगले 30 साल तक संसद के अंदर और बाहर बीजेपी से लड़ती रहेंगी। मोइत्रा ने यह भी कहा कि “कोई सबूत नहीं है। निष्कासन इस आधार पर है कि मैंने अपना लोकसभा पोर्टल लॉग इन साझा किया है। इसके लिए कोई नियम नहीं हैं। जैसा कि एथिक्स कमेटी की सुनवाई से पता चलता है कि हम सभी सांसद जनता से, नागरिकों से सवाल पूछने और संसद में आवाज उठाने के लिए कन्वेयर बेल्ट हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि ”कल मेरे घर पर सीबीआई भेजी जाएगी और मुझे परेशान किया जाएगा और अगले छह महीने तक परेशान किया जाएगा।”

कैश फॉर क्वेरी के कथित आरोप में मोइत्रा के निष्कासन की घोषणा करते हुए, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा: “यह सदन समिति के निष्कर्षों को स्वीकार करता है कि सांसद महुआ मोइत्रा का आचरण एक सांसद के रूप में अनैतिक और अशोभनीय था। इसलिए, उनका सांसद बने रहना उचित नहीं है।”

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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