Thu. Jun 4th, 2020

शहादत सप्ताह: भगत सिंह और अराजकतावाद

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भगत सिंह।

भगत सिंह एक निर्भीक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ बहुत गंभीर अध्येता भी थे। उन्होंने दुनिया भर की अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और क्रांतिकारी सिद्धांतों का बेहद गहरा अध्ययन किया हुआ था। अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास कि अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने ‘अराजकतावाद’ जैसी जटिल राजनीतिक विचारधारा पर किरती पत्रिका में लेखों की एक श्रृंखला शुरू की थी। 2 मई 1928 से अगस्त 1928 तक चली।

प्रस्तुत लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि अराजकतावाद से संबंधित अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन एवं इतिहास के अध्ययन के अलावा अराजकतावाद पर भगत सिंह की अपनी राय क्या थी, उनके चिंतन एवं कार्यप्रणाली को अराजकतावाद ने किस तरह निर्देशित किया था एवं उनके अपने चिंतन की क्या सीमाएं थीं। एक बात जो हमें विशेष रुप से ध्यान में रखनी है वह यह है कि 1907 में जन्मे भगत सिंह 1928 में केवल 21 वर्ष के थे।

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भारतीय संदर्भ में जब कभी अराजकतावाद की बात होती है तो कई बौद्धिक गांधी जी को “ ब्रिटिश संसद को बाँझ ” कहने वाली उनकी  टिप्पणी के कारण उन्हें भारत का अराजकतावादी चिंतक ठहराने की कोशिश करते हैं। लेकिन श्रम सघन लघु एवं कुटीर उद्योगों की वकालत और ग्राम स्वराज व लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण  के अपने सिद्धांतों के बावजूद गांधी जी को धर्म एवं राजनीति के घालमेल संबंधी उनके चिंतन और वर्ण व्यवस्था को एक आदर्श व्यवस्था मानने  की गफलत के साथ ही ट्रस्टीशिप के उनके सिद्धांतों के चलते उन्हें यथास्थिति वादी व्यवस्था का पोषक ही कहना होगा।

भगत सिंह के यहां इस तरह का कोई भ्रम नहीं है। एक आदर्शवादी क्रांतिकारी ही नहीं वरन एक ठोस क्रमबद्ध वैचारिक प्रणाली में विश्वास करने वाले चिंतक भी हैं। 

अराजकतावाद की अपनी लेख श्रृंखला में वह पहले ही खंड में भारतीय मानस की अज्ञानता और प्रगल्भता पर प्रहार करते हैं। वो कहते हैं-

” संसार में आज बहुत हलचल मची है जाने-माने विद्वान दुनिया में शांति स्थापना के कार्य में उलझे  हुए हैं………लेकिन आज हम गुलाम हैं। हम दुनिया की शांति के लिए क्या चिंता करें अपने देश के लिए ही कुछ नहीं कर पा रहे……..हमें तो अपने दकियानूसी विचार ही तबाह कर रहे हैं। और प्रभु को पाने के लिए आत्मा परमात्मा के विलाप में फंसे हुए हैं। यूरोप को हम तुरंत ही भौतिकतावादी कह देते हैं। उनके जो विचार हैं उनकी ओर ध्यान ही नहीं देते। हम आध्यात्मिक रुझान वाले जो हैं। हम बड़े त्यागी जो हैं। हमें इस संसार की बातें ही नहीं करनी चाहिए। ऐसी दुरावस्था हो गई है कि रोने का मन करता है।”

( संदर्भ भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, संपादक जगमोहन सिंह, चमन लाल पृष्ठ 149)

इसके बाद अपने लेख में भगत सिंह पाठकों को अराजकतावाद को समझाने का प्रयास करते हैं   

” आज हम संक्षेप में साम्यवाद और समाजवाद आदि अनेक विचारों के बारे में सुन रहे हैं इन सबसे ऊंचा आदर्श अराजकतावाद ही समझा जाता है……….. जनता अराजकता शब्द से बहुत डरती है………. एनार्किस्ट एक खूंखार व्यक्ति समझा जाता है, जिसके दिल में जरा भी दया ना हो। जो रक्त पिपासु हो। नाश महानाश  देखकर जो झूम उठता हो। शब्द इतना बदनाम कर दिया जा चुका है कि भारत में राजपरिवर्तनकारियों  को भी जनता में घृणा पैदा करने के लिए एनार्किस्ट कहा जाता है. ……. हालांकि अराजकतावादी सर्वाधिक संवेदनशील मन वाले सारी दुनिया का भला चाहने वाले होते हैं। उनके विचारों के साथ भिन्नता रखते हुए भी उनकी गंभीरता जनता से स्नेह, त्याग और उनकी सच्चाई आदि पर किसी प्रकार की शंका नहीं हो सकती…………… एनार्किस्ट का शाब्दिक अर्थ है किसी भी प्रकार से शासित ना होना……. उदाहरण स्वरूप काफी पहले एक यूनानी दार्शनिक ने कहा था “हम न शासक बनना चाहते हैं और ना ही प्रजा” (संदर्भ वही पृष्ठ 150)

इस लेख में आगे भगत सिंह प्रूधों, बाकुनिन, प्रिंस क्रोपोटकिन, एम्मा गोल्डमैन, एलेग्जेंडर ब्रेकमन आदि कई अराजकतावादियों के हवाले से, अराजकतावादी सिद्धांत के विकास एवं उससे संबंधित व्यावहारिक कार्यवाहियों का एक दिलचस्प ब्यौरा  देते हैं। भगत सिंह बताते हैं कि अराजकतावादी तीन बातों को दुनिया से पूरी तरह खत्म कर देना चाहते हैं-

1-चर्च भगवान और धर्म 2-स्टेट 3-प्राइवेट प्रॉपर्टी

अराजकतावादी चिंतन के लिहाज से भगत से बारी-बारी इन तीनों पर विचार करते हैं, और संक्षेप में इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अराजकतावादी लोग ईश्वर स्टेट और निजी संपत्ति को माननीय स्वतंत्रता एवं भाईचारे के लिए एक बाधा के रूप में देखते हैं।

ईश्वर या धर्म को लेकर भगत सिंह कहते हैं-

” प्रश्न उठता है कि ईश्वर नहीं है। दुख भरी धरती क्यों बनाई। क्या तमाशा देखने के लिए। तब तो घर रूम के रूट संसार नीरो से भी अधिक जालिम होगा। क्या उसका चमत्कार है। इस चमत्कारी ईश्वर की क्या आवश्यकता है……..हमेशा से स्वार्थ क्यों नहीं पूंजीपतियों ने धर्म को अपने अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया है। इतिहास इसका साक्षी है। धैर्य धारण करो अपने कर्मों को देखो ऐसे दर्शन नहीं तो यातनाएं दी है। वह सबको मालूम है……….लोग कहते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व का अगर नकार दिया गया तो दुनिया में पाप बढ़ जाएगा और अंधेर गर्दी मच जाएगी।

जब तिवारी कहते हैं कि उस समय मनुष्य इतना ऊंचा हो जाएगा किस वर्ग का लालच और नर्क का भय बताए बिना वह बुरे कार्यों से दूर हो जाएगा और नेक काम करने लगेगा…….. गीता दुनिया की प्रमुख पुस्तक मानी जाती है, लेकिन श्रीकृष्ण निष्काम भाव के साथ कर्म करने की प्रेरणा देते हुए भी अर्जुन को मृत्यु उपरांत स्वर्ग और विजय प्राप्त कर राजभोग का लालच देने से भी पीछे नहीं रहे। लेकिन आज हम अराजकतावादियों के बलिदान को देखते हैं तो मन में आता है कि उनके पैर चूम लें……ना ईश्वर को पसंद करने का कोई लालच और नहीं स्वर्ग में जाकर मौज करने का लोभ……..लेकिन फिर भी हंसते-हंसते लोगों के लिए सत्य के लिए जीवन न्योछावर कर देना क्या कोई मामूली बात है।( वही पृष्ठ 153)

यहां पर ध्यान देने लायक बात है कि भगत सिंह द्वारा ईश्वर की तुलना शहंशाह नीरो जैसे जालिम से करने का तर्क, भगत सिंह के एक अन्य बेहद महत्वपूर्ण निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में ज्यादा बेहतर ढंग से स्थापित हुआ है और साथ ही यह भी गौर करने लायक है कि अराजकतावादियों की निस्वार्थ प्रतिबद्धता को लेकर भगत सिंह का जो प्रशंसा भाव है, वह भी शायद उनके स्वयं को एक उच्च लक्ष्य के लिए खुशी-खुशी बलिदान कर देने की असाधारण मनःस्थिति का एक निर्धारक कारक रहा है…..

इस श्रृंखला में आगे भगत सिंह स्टेट या राज्य की भूमिका पर विचार करते हुए, रूसो के सोशल कॉन्ट्रैक्ट के सिद्धांत पर विचार करते हुए कहते हैं-

“कॉन्ट्रैक्ट यह था कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का एक विशेष भाग अपनी आय का एक हिस्सा बलिदान करेगा जिसके एवज में उसे सुरक्षा और शांति उपलब्ध कराई जाएगी…… विचारणीय यह है कि क्या यह सौदा पूरी तरह ठीक रहा? शासन कायम हो जाने के बाद राजसत्ता और धर्म ने साजिश रच ली लोगों से कहा कि हम ईश्वर की ओर से भेजे गए हैं। लोग ईश्वर से भयभीत रहे और राजा मनमानी जुल्म करते रहे। जार बहुत अच्छे ढंग से ढोल की पोल खोल देते हैं…….( वही पृष्ठ 153)

अराजकता वादियों के हवाले से भगत सिंह ने अराजकतावाद के खिलाफ की गई आलोचनाओं का भी मकबूल जवाब देने की कोशिश की है-

” लोग कहेंगे कि भला यह भी कोई बात हुई राजसत्ता ना होगी कानून ना होगा, कानून बनवाने वाली पुलिस ना होगी अंधेर गर्दी मच जाएगी। राजनीति के प्रख्यात दार्शनिक डेवियत थोड़ी ने कहा है कि” no never made man a  whit  more just, and  by means after respect for it even the well disposed our daily made gents of injustice”

इसमें तो कोई असत्यता नजर नहीं आती, मैं नजर आता है कि ज्यों ज्यों  कानून सख्त होते हैं त्यों त्यों  भ्रष्टाचार भी बढ़ता है,………………… 

कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि बिना शासन के वह रह नहीं सकते।

(इसके लेखक मोहन आर्या स्वतंत्र लेखन करते हैं।) 

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