Tue. Oct 15th, 2019

फासिस्ट सरकार के खिलाफ बने राष्ट्रीय मंच: प्रो. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

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प्रोफेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। प्रो. सिंह हिंदी के उन आलोचकों में से हैं जिन्होंने मध्यकालीन भक्ति कविता से लेकर आधुनिक साहित्य का गहन अध्ययन किया है। हालांकि उनके सक्रिय जीवन के बीस वर्ष शिक्षक आंदोलन से संबधित रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने शिक्षकों के सेवा-शर्तों में सुधार की मांग को लेकर शिक्षकों के ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया। आधुनिक साहित्य: विवाद और विवेचना, पाश्चात्य दर्शन और सामाजिक अंतर्विरोध, प्रेमचंद: विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, श्रीलाल शुक्ल: जीवन ही जीवन, 1857: बग़ावत के दौर का इतिहास, देवीशंकर अवस्थी निबंध संचयन, हिंदी-उर्दू: साझा संस्कृति, पूंजीवाद और संचार माध्यम, समाजवाद का सपना, ‘जाग उठे ख़्वाब कई’, 1857: इतिहास और संस्कृति और प्रभाष जोशी स्मृति संचयन ‘ हद से अनहद गए’ नामक रचनाओं के वे लेखक-सम्पादक हैं। प्रो. सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्राचार पाठ्यक्रम में हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त होकर साहित्य सृजन में लगे हैं। आजकल जनवादी लेखक संघ के महासचिव के साथ ‘नया पथ’ के संपादक का दायित्व भी निभा रहे हैं। प्रो. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से जनचौक के राजनीतिक संपादक प्रदीप सिंह की बातचीत का संपादित अंश:


अपने जन्म-परिवार एवं शिक्षा-दीक्षा के बारे में बताएं?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: मेरा जन्म 29 जून,1936 को बरौनी में एक किसान परिवार में हुआ था। बरौनी तब बिहार के मुंगेर जिले का अंग था लेकिन अब बेगूसराय जिले के अंतर्गत है। दो भाई और दो बहनों में मैं सबसे बड़ा था। प्रारम्भिक शिक्षा बरौनी मिडिल स्कूल में हुई। राधाकृष्ण चमड़िया विद्यालय से हाईस्कूल करने के बाद मैं बेगूसराय आ गया और 1957 में जीडी कालेज से बीए आनर्स किया। पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के लिए पटना आया और 1959 में पटना विश्वविद्यालय से एमए (हिंदी) प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया और स्वर्ण पदक मिला। एमए करने के तुरंत बाद जनवरी,1960 में जेके कॉलेज पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हुआ लेकिन यहां मन नहीं लगा। आठ महीने अध्यापन करने के बाद अगस्त महीने में नौकरी से इस्तीफा देकर पटना चला आया। इसके बाद संघर्ष के दिन शुरू होते हैं। पुरुलिया से आने के बाद पटना विश्वविद्यालय में अस्थायी प्रवक्ता नियुक्त हुआ। पटना विश्वविद्यालय में मई,1961 तक ही रह सका क्योंकि इसी बीच संघ लोकसेवा आयोग ने मेरे स्थान पर दूसरे व्यक्ति को स्थायी तौर पर नियुक्त कर दिया। पद्म नारायण का एकेडमिक कैरियर बहुत अच्छा नहीं था वे सेकंड डिवीजन थे जबकि मैं फर्स्ट डिवीजन था। लेकिन वे तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण सुधांशु के सुपुत्र थे और मैं किसान परिवार का था। उसके बाद मैं पटना में ही भारती भवन प्रकाशन में काम करने लगा और डेढ़- दो साल काम करने के बाद दिल्ली आ गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय में कब आए ?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: 1963 में पटना से दिल्ली आ गया था। उसी समय डीयू के स्कूल ऑफ करेस्पॉडेंट कोर्सेज में पार्ट टाइम लेक्चरर की वैकेंसी निकली थी। मैंने अप्लाई किया। अक्टूबर,1963 में मेरी नियुक्ति पार्ट टाइम लेक्चरर के पद पर हुई। साल भर बाद मैं स्थायी प्रवक्ता बना दिया गया। अब इसका नाम स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग है। यहां जनवरी, 2002 तक काम करता रहा। सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हूं।
दिल्ली विश्वविद्यालय में आपकी पहचान एक शिक्षक नेता की रही है। शिक्षक आंदोलन से कब और कैसे जुड़े?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनने के कुछ वर्षों के बाद सहकर्मियों के कहने पर डूटा में सक्रिय हुआ। डूटा का एक बार सेक्रेटरी और तीन बार प्रेसिडेंट रहा। मेरे समय में डूटा ने दो बार ऐतिहातिक हड़ताल किया। डीयू में उस समय प्राध्यापकों को कोई प्रमोशन नहीं निलता था। इसको लेकर शिक्षकों में काफी आक्रोश था। मेरे अध्यक्ष बनने के बाद तय हुआ कि सेव-शर्तों में सुधार और पदोन्नति की मांग को लेकर सरकार को ज्ञापन दिया जाए। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ तब हम लोगों ने हड़ताल करने की योजना बनाई। मंत्रालय, यूजीसी और विश्वविद्यालय प्रशासन सेवा-शर्तों में सुधार करने से इनकार कर रहे थे। सेवा-शर्तों में सुधार की मांग को लेकर हम लोगों ने पहली बार 1973 में हड़ताल किया। ये हड़ताल 109 दिनों तक चली। लेकिन सरकार अड़ी रही। दूसरी हड़ताल 1976-77 में हुई। ये हड़ताल 75 दिनों तक चली। प्राध्यापकों की एकजुटता और संघर्ष के सामने सरकार, विश्वविद्यालय और यूजीसी को झुकना पड़ा। सेवा-शर्तों में सुधार की मांग मान ली गयी। इसके बाद हड़ताल समाप्त हुआ। डीयू में अध्यापन के साथ ही मैं डूटा के काम में लगा रहा। कई मित्रों ने मुझसे नाराजगी जाहिर की और कहा कि आप दिन भर डूटा के काम में ही लगे रहते हैं। मुझे भी लगता था कि मेरा अधिकांश समय डूटा के काम में जा रहा है। लेकिन लोगों के विश्वास के कारण मैं डूटा से अपने को अलग नहीं कर सकता था।
क्या आप छात्र राजनीति में भी सक्रिय थे ?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: छात्र जीवन में तो मेरा राजनीति और आंदोलन से ज्यादा जुड़ाव नहीं था। लेकिन पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान एक बार एमए का पेपर आउट हो गया। पेपर को माडरेशन करने वाले शिक्षकों ने ही आउट किया था। इसके खिलाफ हम लोगों ने आंदोलन किया। कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन चलता रहा। छात्र सड़कों पर आ गए। आंदोलन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था, छात्रों के दबाव में प्रशासन को झुकना पड़ा। माडरेशन बोर्ड बर्खास्त कर दिया गया। उसके बाद बाहर से शिक्षकों को बुला कर पेपर का माडरेशन कराया जाने लगा।
विश्वविद्यालयों में शिक्षक संघ और छात्र संघों की कितनी जरूरत है?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: विश्वविद्यालय को चलाने में नीति, पाठ्यक्रम और फीस आदि प्रमुख पहलू हैं। फीस का क्या ढांचा होगा और कैंपस को कैसे चलाना है यह सरकार तय करती है। जब सरकार फीस बढ़ाती है या राजनीतिक एजेंडे के तहत पाठ्यक्रम तय करती है तो छात्र इसका विरोध करते हैं। शिक्षक या छात्र विरोधी फैसले से सरकार और शिक्षक-छात्रों के बीच टकराव होता है। ऐसे समय में शिक्षक संघों और छात्र संघों की भूमिका प्रमुख हो जाती है। कैंपस की बात छोड़ दिया जाए तो भी जनविरोधी नीतियों से संघर्ष में छात्रसंघों का बहुत योगदान रहा है। छात्र संघों और सरकार के बाच टकराव की स्थिति में राजनीति भी आ जाती है। ऐसे में ये कहना कि विश्वविद्यालयों में शिक्षक और छात्र संघों की जरूरत नहीं है, सही नहीं होगा।
आपातकाल में आप गिरफ्तार हुए थे, आपकी गिरफ्तारी के क्या कारण थे ?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: उस समय छात्र-नौजवान आंदोलनरत थे। जयप्रकाश नारायण (जेपी) को दिल्ली आना था। डीयू में उनकी एक सभा रखी गयी थी। हमने डीयू में मीटिंग के लिए हॉल बुक कराया था। लेकिन शासन के दबाव में विश्वविद्यालय प्रशासन ने बुकिंग रद्द कर दी। जेपी की सभा डीयू में नहीं मौरिस नगर चौक पर हुई। 25 जून,1975 की रात में आपातकाल की घोषणा हुई। मेरे ऊपर जेपी और चारू मजूमदार के बीच सेतु का काम करने का आरोप लगाया गया। उसी रात मॉडल टाउन स्थित मेरे घर पर पुलिस पहुंची और मुझे गिरफ्तार कर ले गई। चूंकि मैंने जेपी की सभा के लिए हॉल बुक करवाया था इसलिए सरकार विरोधी सूची में मेरा भी नाम आ गया। मुझे मीसा के तहत बंद रखा गया। तिहाड़ में लेफ्ट, समाजवादी और जनसंघ के काफी लोग बंद थे। हम लोगों के साथ अरुण जेटली भी तिहाड़ में थे तब वे एबीवीपी के नेता हुआ करते थे। तिहाड़ में 6 महीने रखने के बाद मुझे फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेज दिया गया। जेल में मेरी तबीयत काफी बिगड़ गई। मेरा एक पैर सुन्न हो गया था लेकिन इस हालत में भी मुझे छोड़ा नहीं गया बल्कि लखनऊ जिला जेल ट्रांसफर कर दिया जिससे मैं अपना इलाज करा सकूं। लखनऊ के इलाज से भी कोई फायदा नहीं हुआ। दर्द थोड़ा हल्का हुआ था बस। इधर नौकरी से निलंबित कर दिया गया। उस समय पत्नी और बच्चे दिल्ली में मेरे साथ ही रह रहे थे। जेल में लंबे समय तक रहने पर घर की परिस्थिति खराब हो गई। ऐसे में बच्चों को गांव भेजवा दिया। 19 महीने जेल में रहने के बाद फरवरी,1977 में रिहा हुआ। मेरी तबीयत इतनी खराब थी कि जेल से पुलिस मुझे घर तक पहुंचाने आई थी।
आप जनवादी लेखक संघ से जुड़े हैं। लेखक संगठनों की रचनात्मक सक्रियता कम और राजनीतिक सक्रियता अधिक होती है। लेखक संघ लेखकों का कम राजनीतिक दलों का हित ज्यादा करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आज के दौर में लेखक संगठनों की प्रासंगिकता क्या है?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: देखिए ! लेखक संघों के कुछ बुनियादी वसूल हैं ये लोकतंत्र का समर्थन करते हैं। लेखक संगठनों की जरूरत इसलिए भी है कि संगठनों की विचारधारा से लेखक प्रेरित होते हैं। लेखक संगठनों में विचारधारा, राजनीति और वर्तमान की चुनौतियों और जरूरतों पर बहस होती है। लेखक संगठन एक दिशा तय करते हैं इससे लेखकों का फायदा होता है।
आज के राजनीतिक परिदृश्य और वर्तमान सरकार को कैसे देखते हैं?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: आज की राजनीति में सांप्रदायिकता का जोर है। हिंदुत्व अपने उफान पर है। आज यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि फासिस्ट सत्ता में पहुंच गए हैं। मोदी-शाह शासन चला रहे हैं। दो लोगों के हाथ में पूरी सत्ता है। भाजपा –संघ और सारे लोग बैकग्राउंड में चले गए हैं। मोदी जी सरकार को निष्पक्ष नहीं सांप्रदायिक ढंग से चला रहे हैं। भाजपा-संघ के लोग गो-रक्षा के नाम पर मुस्लिम युवकों पर हमला कर रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में देश भर में कई मुस्लिम युवकों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। यह सरकार दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अलपसंख्यकों के खिलाफ काम कर रही है। देश भर में दलित उत्पीड़न बढ़े हैं, गुजरात इसका मॉडल है। गुजरात में हो रहे दलित उत्पीड़न का जिग्नेश मेवाणी ने विरोध किया। राज्य भर में दलितों ने संगठित होकर संघर्ष किया मेवाणी उसी संघर्ष से नेता बना।
इससे बचने का क्या रास्ता हो सकता है?
प्रो.मुरली मनोहर प्रसाद सिंह: व्यापक जनआंदोलन के बिना कुछ नहीं हो सकता है। आज कोई एक दल मोदी-शाह के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे सकती है। मोदी सरकार के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ और जनहित के मुद्दों पर एक राष्ट्रीय मंच बने तभी कुछ आशा की जा सकती है।

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