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प्रतिभा किसी कुल की दास नहीं होती: अल्पना मिश्र

अल्पना मिश्र को हिंदी का ‘अनकन्वेंशनल राईटर’ माना जाता है। भाषा की ताज़गी, विलक्षणता और लेखन में लोक रंग की उपस्थिति साहित्य की दुनिया में उनको एक अलग पहचान देती है। कथाकार अल्पना मिश्र से प्रदीप सिंह की बातचीत का प्रमुख अंश :

प्रश्न : आपकी कहानियों में घरेलू और बाहरी दुनिया के तनाव में उलझी स्त्री की तस्वीर, स्पष्ट तौर पर दिखायी देती है और वर्गीय दृष्टिकोण को भी सामने रखती है। यानी आपका लेखन मध्यवर्गीय स्त्रियों की समस्याओं पर ज्यादा केंद्रित है। सामान्य वर्ग की महिलाएओं की समस्याओं का कम जिक्र है। इसकी कोई खास वजह?

अल्पना मिश्र: हम जिस समाज से जुड़े होते हैं, उसी का सबसे प्रामाणिक चित्र खींचते  हैं, यह जितना सच है, उतना ही लेखक के लिये ‘परकाया प्रवेश’ भी सच है। जैसे कि महाश्वेता देवी ‘जंगल के दावेदार’ लिखती हैं पर वे आदिवासी नहीं हैं। प्रेमचंद निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्ग की बात करते हैं, जैनेन्द्र का ‘त्यागपत्र’ स्त्री संवेदना को सामने रखता है पर वे स्त्री नहीं। मैं मध्यवर्ग से हूं पर मेरी कहानियों में सिर्फ मध्यवर्गीय पात्र नहीं हैं। कुछ कहानियों में मध्यवर्गीय स्त्रियां मिलेंगी, बहुत सी कहानियों में निम्न वर्गीय या निम्न मध्य वर्गीय हाशिये के पात्र मिलेंगे, क्योंकि मैंने उनके जीवन को बहुत निकट से जाना है, इसलिए मेरी कहानियों और उपन्यासों में वे अपने अलग अलग शेड्स में मौजूद हैं। ‘मिड डे मील’ कहानी की मुख्य पात्र फैक्ट्री में काम करने वाली मजदूर स्त्री हो या ‘अस्थि फूल’ उपन्यास में भूख और गरीबी की मार झेलतीं, सवाल उठातीं, निहत्थी लड़ाइयां लड़तीं हाशिये के समाज की स्त्रियां हों या ‘अंहियारे तलछट में चमका’ की बिट्टो, दामोदर जी जैसे निम्न मध्यवर्गीय पात्र हों, मेरे पास उनकी केंद्रीय जगह रही है।

स्त्री जीवन को मैंने हमेशा व्यवस्था के सारे तंत्रों से जोड़ कर समझने की कोशिश की है। वह सारी संरचना और सारे तंत्रों से अलग नहीं पहचानी जा सकती, उसकी समस्या की शिनाख्त भी इसी के बीच की जाएगी। किंतु हिंदी में समस्या खांचे में बांटने की है। स्त्री रचनाकारों के लिखे को स्त्री लेखन कह कर कमतर या सीमित दायरे का मान लिया जाता है। स्त्री अगर कोई स्त्री पात्र ले कर आये तो वह सिर्फ स्त्री विमर्श लिखेगी, यह खांचावाद अद्भुत है। दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं है।

मेरी एक प्रिय पुस्तक है- ‘गॉन विथ द विंड’, यह युद्ध पर लिखे दुनिया के महत्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है और इसे एक स्त्री मार्गेट मिशेल ने लिखा है। उसके स्त्री चरित्र गहरे और विविध शेड्स वाले हैं। किंतु इसे कभी भी स्त्री समस्या का उपन्यास नहीं कहा गया। हिंदी में भी कृष्णा सोबती आदि ने बड़े कैनवास पर काम किया है। साहित्य में जीवन आना चाहिए न कि ‘स्त्री विमर्श’ के नाम पर रूढ़ कर दिया गया कोई फार्मूला।

प्रश्न : ‘सुनयना! तेरे नैन बड़े बेचैन!’ में एक जगह आप लिखती हैं- “कुछ ऐसी ही हैरानी से खुली और प्रसन्नता से सिहरती आंखें लिए मैं चारों तरफ देख रही थी। और वही गीत मेरे मन में बज रहा था। हमेशा बजता रहा। वही गीत ‘अजीब दास्तां है ये…।” तो इस अजीब दास्तां का कोई अंत आप देखती हैं?

अल्पना मिश्र: अजीब दास्तां का अंत तभी होता है, जब हमारा समाज उसके खात्मे की स्थितियां रचता है। समाज ने जहां कहीं भी अपने अनुकूलन और नियंत्रण की रस्सी कुछ ढीली की है, वहाँ स्थितियां बेहतर बनी है। स्त्री की आकांक्षा भी बेहतर दुनिया की आकांक्षा ही है। यद्धपि स्त्री जीवन की समस्याएं कम नहीं हुई हैं, बल्कि वे अनेक नए रूपों में भी उठ खड़ी हुई हैं, तथापि कुछ नई परिघटनाओं ने उम्मीद की रोशनी कम नहीं होने दी। आज माता पिता अपनी पढ़ी लिखी, नौकरीपेशा बेटियों के साथ अपना सोशल स्टेटस जोड़ कर देखने लगे हैं। अब केवल पुत्र ही नहीं, आत्म निर्भर पुत्री भी माता पिता के बुढ़ापे का सहारा बन रही है और उसे सामाज स्वीकार कर रहा है,पर इसका प्रतिशत अभी बहुत कम है। स्त्री पर हिंसा पहले से बढ़ी है, रेप और नियंत्रण की स्थितियां भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं तो स्त्रियों का जुझारूपन और संघर्ष भी बढ़ा है। ‘अस्थि फूल’ लिखते समय यातना के सौ सौ नरक जीती स्त्रियों का जीवन मैंने जाना, तो उनका जूझना भी देखा। अंधेरे में भी उम्मीद की लौ संघर्ष की हिम्मत देती है।

प्रश्न : आप सामाजिक समस्याओं मसलन बाल श्रम, मिड डे मील के साथ ही व्यापक स्तर पर सरकारी मशीनरी की निरंकुशता और संवेदनहीनता को लेखन के माध्यम से उजागर करती हैं, लेकिन ऐसी समस्याओं का निदान क्या देखती हैं ?

अल्पना मिश्र: साहित्य का काम व्यक्तिमन की जलवायु को कुछ बदल देना है, संवेदनशील बनाना और विचार की तरफ ले जाना है। वह समस्या का समाधान नहीं कर सकता, उसके लिए जमीन जरूर तैयार कर सकता है। रियलिटी दो तरह की मानी गई है- एक, रियलिटी सरफेस पर दिखती है, जो आज इल्यूजन से घिर गई है, दूसरी कंक्रीट रियलिटी, जिसे हम सतह के भीतर का यथार्थ कहते हैं। साहित्य इसी कंक्रीट रियलिटी को दिखाता है। समाधान करना व्यवस्था का काम है।

प्रश्न : आपका परिवार शिक्षा के साथ ही सेना से भी जुड़ा है। ‘छावनी में बेघर’ कहानी में आप लिखती हैं-  “बाहर जो हो रहा होता है, वह मानो नींद में हो रहा होता है। जो नींद में हो रहा होता है, वह बाहर गुम गया-सा लगता है। उस गुम गए को तलाशती रहती मैं यहां-वहां खटर-पटर करती रहती हूं। यानी कि घर के काम में अपने को उलझाए रखती हूं।”-क्या यह आप का भोगा गया यथार्थ है ?

अल्पना मिश्र: किसी विदेशी लेखक ने कहा है कि असहनीय यंत्रणाओं को नींद में ही सहा जा सकता है। यह कुछ ऐसा ही विचार है, जब आदमी के पास विकल्प न रह जाये तो सहने के अलावा उपाय नहीं बचता। सैनिक जीवन की हीरोइक छवि बनती है तो उसकी समस्याएं छिप जाती हैं। फौजी अपनी परेशानियां नहीं बताते। मेरी कोशिश थी कि सैन्य जीवन को उसकी वास्तविक समस्याओं के साथ रखा जाए। निश्चित ही इस यथार्थ से मेरा गहरा और आमरण रिश्ता है, कभी यह संघर्ष थोड़ा सा मेरा हो जाता है, कभी मेरे निकट के लोगों का, कभी मेरे प्रिय पास पड़ोस का, और कभी देश दुनिया का… इस तरह यह संघर्ष अपना दायरा बढ़ाता जाता है।

प्रश्न : आपको साहित्यिक परिवेश विरासत में मिला है। आप पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के परिवार की हैं। पंडित जी के निधन के वक्त आप दस वर्ष की रही होंगी, कुछ यादें जिसे आप साहित्य और जीवन के लिए मंत्र मानती हो?

अल्पना मिश्र: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि ”प्रतिभा किसी कुल की दास नहीं होती।” यह मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म हिंदी के मनीषी साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के परिवार में हुआ। परिवेश मुझे मिला। आंख खोलते ही किताबें दिखाई पड़ीं- अनुशासन के साथ समता और न्याय के पाठ वातावरण में घुले हुए थे, तर्क और बहसों को सम्मान प्राप्त था। तो बहुत कुछ सीखने समझने की बेचैनी भी मिली। शब्द ही एक रचनाकार के लिए मंत्र हैं। इसलिए शब्दों की जिम्मेदारी भी उसी की है। उसके शब्दों में उन सबकी आवाज है, जो खुद नहीं बोल सकते या जिनकी बात पहुँच नहीं सकती। यह भी जाना कि हमारी आवाज में जाने कितनों की आवाज शामिल है तो लिखने की जिम्मेदारी का अहसास होता है। यही सीख मंत्र की तरह गांठ बांधे रही हूं आज भी।

प्रश्न : पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवनी व्योमकेश दरवेश में आप काफी त्रुटियां होने की बात करती रहीं है, वे क्या हैं, पुस्तक के प्रकाशित होने के इतने वर्षों के बाद क्या वो त्रुटियां सुधारी गयीं?

अल्पना मिश्र : ‘व्योमकेश दरवेश’ एक अच्छी कृति है। विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने बड़ी प्रवाहमय भाषा में द्विवेदी जी के जीवन को विस्तार से रखने की कोशिश की है, किंतु उसमें असंख्य तथ्यात्मक गलतियां रह गई हैं। इनकी मैंने एक लंबी लिस्ट बनाई थी। यदि इनको सुधार लिया जाए तो यह द्विवेदी जी की एक प्रामाणिक जीवनी बन जाएगी और बेहतर हो जाएगी। इससे लेखक का ही मान बढ़ेगा। पता नहीं इन्हें अभी तक क्यों नहीं ठीक किया गया। आपने यह प्रसंग उठा कर मुझे उन मुसीबतों की याद दिला दी, जो इन त्रुटियों का जिक्र करने के कारण झेलनी पड़ी थीं। फ़ैज़ का एक शेर याद आ रहा है-

“ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रू सियाही लिखी गई।

यही दाग़ थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गए।।”

प्रश्न : हिंदी साहित्य की दुनिया बहुत अजीब है। किसी को पुरस्कार मिला तब उसके खिलाफ साजिश,अफवाह। पुस्तक प्रकाशित तो तरह-तरह की बातें। अभी तो सारी हदें पार हो रही हैं। अभी हाल ही में एक साहित्यिक पत्रिका के पूर्व संपादक के निधन के बाद उसी पत्रिका में जो श्रद्धांजलि लेख छपे, वे काफी कष्टकारी हैं, इस विडंबना को क्या कहेंगी?

अल्पना मिश्र: यह एक प्रवृत्ति बन चुकी है। किसी को गिरा कर खुद को उठा हुआ मान लेने का चलन बढ़ता जा रहा है। हिंदी समाज का वह वर्ग, जो लेखक होने का दावा करता है, भीषण कुंठा से भरा हुआ है, इसे वह भाषा के सबसे निचले स्तर पर जा कर प्रकट करता है। तर्क और विवेक की भाषा उसके पास नहीं रही, पढ़ने से कोई सरोकार भी नहीं, परम्परा का ज्ञान नहीं, आधुनिकता की पहचान नहीं, तो केवल ‘बिलो द बेल्ट ‘ बातों में विष वमन ही उसकी सामर्थ्य रह जायेगी। साजिशों, अफवाहों का गढ़ बनता जा रहा है हिंदी साहित्य। यही प्रवृत्ति उसकी अधोगति का सबसे बड़ा कारण है।

प्रश्न : ‘अस्थि फूल’ को सामाजिक राजनीतिक उपन्यास कहा गया है। इसकी कथा के मूल में आम आदमी है। यह सदियों से शोषित समाज के साथ ही नब्बे के दशक में उभरे तमाम जन आंदोलनों के साथ छल छद्म को उद्घाटित करता है। इसमें जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों के साथ ही स्त्री शोषण को प्रमुखता से उठाया गया है। क्या आप स्त्री और प्रकृति को एक रूप पाती हैं?

अल्पना मिश्र: अस्थि फूल’ सामाजिक राजनीतिक उपन्यास है। इसकी कथा भूमि झारखंड से होती हुई हरियाणा और दिल्ली तक फैली है। इसमें समानांतर दो स्थितियां चलती रहती हैं। दोनों एक दूसरे से इंटरकनेक्टेड हैं। एक तरफ अधिकांश जनांदोलनों की खरीद फरोख्त है, उसके भीतर के छल हैं तो दूसरी तरफ स्त्री के गर्भ की खरीद फरोख्त है साथ ही पृथ्वी के गर्भ की भी।

आंदोलन हों या ट्रैफिकिंग, दोनों में जीवन को बेहतर की तरफ ले जाने का स्वप्न छिपा है और दोनों में स्वप्न की सौदगिरी का छल भी। मनुष्य बार बार स्वप्न की ओर खिंचता है और बार बार छल पाता है, कहीं नौकरी का स्वप्न है तो कहीं शादी का लालच, कहीं नए राज्य का स्वप्न है तो कहीं न्याय का। इसतरह स्वप्न और छल का एक सिलसिला है। कहीं विद्रोह की आवाजें हैं तो कहीं उन्हें कुचलने की अमानवीय चालें। भूख और गरीबी की मार झेलता हाशिये पर पड़ा आदमी कभी इधर जाता है तो कभी उधर। भूख और गरीबी की न कोई जाति रह जाती है न संस्कृति। दरअसल यह मनुष्यता के विस्थापन का आख्यान कहने की कोशिश है।

स्त्री और पृथ्वी का एक बड़ा रूपक बनाने की कोशिश की है। यदि हमारा इको सिस्टम नहीं बचेगा तो पृथ्वी पर जीवन कितना रह जायेगा? और यदि स्त्री नहीं बचेगी तो किस मानव जीवन के विकास की कल्पना की जाएगी? जहां तक स्त्री और प्रकृति के रूपक की बात है तो यह हमारा अत्यंत पुराना भारतीय रूपक है। इसका तात्पर्य सृष्टि की संकल्पना से है और सृष्टि के कल्याण की अवधारणा मानव कल्याण से जुड़ती है। इस पर संकट को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

इसे लिखना मुझे इसलिए जरूरी लगा कि यह संकट सिर्फ स्त्री का नहीं है, यह संकट सृष्टि का है, संवेदना और सरोकार का है और सबसे अधिक मनुष्यता पर गहराता संकट है।

प्रश्न :आजकल आप नया क्या लिख रही हैं?

अल्पना मिश्र: आजकल मैं अपनी जापान यात्रा संस्मरण पूरा कर रही हूं। नवम्बर 2018 में मैंने 15 दिनों की जापान की साहित्यिक यात्रा की। यह ग्लोबल लिटरेचर समिति, जापान सरकार का आयोजन था। मेरी जानकारी में पहली बार, विदेश की धरती पर, किसी हिंदी के लेखक के रचना संसार पर फोकस कर इतने दिनों का कार्यक्रम किआ गया। अपनी कहानियों, उपन्यासों के जापानी अनुवाद देखना सुखद था। वहां ओसाका, टोक्यो, कुमामोटो आदि कई शहरों में मेरा व्याख्यान और जापानी लेखकों से संवाद हुआ। कई जापानी साहित्य के प्रसिद्ध कवियों और आलोचकों ने मेरे साहित्य पर लंबे वक्तव्य दिए। विविध भाषाओं के विद्वान उपस्थित रहे। बहुत से प्रश्न भारतीय संस्कृति और साहित्य को ले कर हुए। वहां की प्रसिद्ध कवि योको तवाड़ा और अस्सी के दशक की मशहूर कथाकार हिरोमी इटो जी से संवाद अविस्मरणीय अनुभव रहा। इन अनुभवों ने मुझे समृद्ध किया। वहाँ से लौटते हुए मुझे रवींद्रनाथ टैगोर याद आते रहे। टैगोर भी एक बार जापान गए थे।

This post was last modified on July 30, 2020 8:30 pm

प्रदीप सिंह

लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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