Subscribe for notification

‘मुक्तिबोध के बाद रघुवीर सहाय हिन्दी कविता के सबसे बड़े आइकन’

नई दिल्ली। प्रेस क्लब के सभागार में इतवार शाम को हुए रघुवीर सहाय स्मृति समारोह में मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि-पत्रकार विष्णु नागर ने कहा कि मुक्तिबोध के बाद रघुवीर सहाय हमारी कविता के सबसे बड़े आइकन हैं। उन्होंने कहा कि सहाय हिन्दी कविता के अंतिम आइकन हैं।

रघुवीर सहाय के निधन के क़रीब 30 बरस बाद उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ और युवा लेखकों की भागीदारी इन दिनों के लिहाज़ से एक सुखद अहसास कराने वाली बात रही। इस मौक़े पर विष्णु नागर ने कहा कि मुक्तिबोध का पहला और सबसे चर्चित संग्रह 1964 में आया जब वे मरणासन्न स्थिति में थे। वे हमारी दुनिया के हिन्दी के सबसे बड़े आइकन के रूप में स्वीकार किए गए। रघुवीर सहाय का पहला कविता संग्रह `आत्महत्या के विरुद्ध` इसके तीन साल बाद आया। मुक्तिबोध जैसे बड़े कवि जिनकी कहानी और आलोचना की भी वैसी ही चर्चा थी, की छाया में आने के बावजूद रघुवीर सहाय के कविता संग्रह की बेहद चर्चा रही। विवाद भी हुए और उसे महत्व भी मिला।

नागर ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य के संबंध में जितनी स्पष्टता और साहस के साथ रघुवीर सहाय ने बात रखी, उतनी किसी और ने नहीं रखी। सहाय मानते थे कि पत्रकारिता और साहित्य में बहुत दूरी नहीं है। पत्रकारिता और साहित्य दोनों का तथ्यों से सामना होता है। पत्रकार के लिए तथ्यों की क्रमबद्धता ज़रूरी है, साहित्यकार के लिए यह ज़रूरी नहीं है। उन्होंने इस बात का खंडन किया कि पत्रकारिता नियोजित रूप से रचनात्मकता की क्षति करती है। सहाय अपनी कविता को पत्रकारिता कहे जाने पर कहते थे कि तमाम तरह की वे प्रेम कविताएं और फिल्मी गीत जिनमें प्रतिरोध नहीं है, पत्रकारिता (ख़राब ढंग की) हैं। एक बार असग़र वजाहत ने रघुवीर सहाय को कहा कि आप नौकरी छोड़कर सिर्फ़ कविता लिखिए तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं कवि इसलिए हूँ क्योंकि पत्रकार हूँ। जिस दिन पत्रकारिता छोड़ दूंगा, कविता भी नहीं लिखा पाऊंगा।

विष्णु नागर ने कहा कि कविता के आधुनिक होने के बावजूद यह माना जाता है कि वह ऊपर से टपकती है। रघुवीर सहाय का स्पष्ट मानना था कि कविता कोई दैवीय चीज़ नहीं है। `लोग भूल गए हैं` और `आत्महत्या के विरुद्ध` को तो वे इमेजेज को कैंची और गोंद से जोड़कर किया गया मैकेनिकल-टेक्निकल काम कहते थे। उन्होंने कविता में शिल्प के महत्व को रेखांकित किया। वे तो कहते थे कि कविता हुई नहीं कि कविता मरी नहीं। वे कविता में उपमा और प्रतीकों के इस्तेमाल के विरुद्ध बोलते रहे। उन्होंने अपनी कविता में उपमा और प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं किया। भूल-ग़लती से इस्तेमाल किया हो तो किया हो। उन्होंने अपनी कविता में हिन्दू, इस्लाम या किन्हीं भी प्राचीन धर्मग्रन्थों से कभी भी, कहीं भी धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं किया।

नागर ने याद दिलाया कि रघुवीर सहाय कहते थे कि साधारण भाषा से ख़बरदार रहिए, कठिन भाषा से डरिए नहीं। भाषा की सरलता की क़ीमत पर विचारों को ढीला नहीं बनाया जा सकता। सहाय अख़बारों की साम्प्रदायिक भूमिका को लेकर चिंतित थे। 1989 में राम मंदिर के नाम पर हुए साम्प्रदायिक दंगों में उत्तर प्रदेश और बिहार के अख़बारों की भूमिका को लेकर वे अपनी सांस उखड़ने तक रिपोर्ट तैयार करने में जुटे हुए थे। नागर ने रघुवीर सहाय की जीवनी लिखते समय आई इस कठिनाई का ज़िक्र भी किया कि उनके लेखन पर तो काफ़ी सामग्री उपलब्ध थी पर उनके जीवन को लेकर इंटीमेट डिटेल्स उस तरह नहीं थीं। गौरतलब है कि नागर ने `रज़ा फाउंडेशन` की योजना के तहत रघुवीर सहाय की जीवनी `असहमति में उठा एक हाथ` लिखी है जो हाल ही में राजकमल प्रकाशन से छपी है।

वरिष्ठ कवि और पत्रकार मंगलेश डबराल ने कहा कि रघुवीर सहाय की कविताएं प्रतिरोध की कविताएं हैं। भले ही वे व्यंजनात्मक हों। वे व्यंजना को अभिधा में व्यक्त करते हैं। उनका कहने का अंदाज़ अभिधात्मक ही है। रघुवीर सहाय की कविता पंक्ति है `अब काम हमारे आती हैं पिछली ये कविताएं`। उनकी कविताएं रोज़ ही हमारे काम आती रहती हैं। अपने समय की व्याख्या के लिए, जीवन की व्याख्या के लिए और कभी नैतिकता की व्याख्या के लिए जिसका तेज़ी से क्षरण हो रहा है। मंगलेश डबराल ने कहा कि एक कवि अपनी अंतरदृष्टि से समाज की गति को देखता है। समाज किस तरफ़ जा रहा है, इसकी पहचान करता है। रघुवीर सहाय जान चुके थे कि यह एक तरह की तानाशाही है। हम इमरजेंसी की ओर जा रहे हैं। इमरजेंसी से पहले लिखी गई `आने वाला ख़तरा` आज भी रोज़ ही सच होती रहती है।

मंगलेश डबराल ने कहा कि इंदिरा गांधी के दौर की इमरजेंसी के नियम निश्चित थे। कह सकते हैं कि खेल के नियम तय थे लेकिन आज तय कुछ भी नहीं है। कलबुर्गी को कहीं से भी गोली लग सकती है। गौरी लंकेश को कभी भी मारा जा सकता है। यह ऐसा समय है कि `ताक़त ही ताक़त होगी चीख़ न होगी`, और भी सांकेतिक है। चंद लोगों को छोड़कर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। देख रहे हैं कि `रामदास` को किस तरह से मारा जा सकता है।

सहाय की कविताओं की इस अंतरदृष्टि की ताक़त के उदाहरण देते हुए मंगलेश डबराल ने कहा कि यह प्रतिरोध व्यंजनात्मक है और दुनिया की प्रतिरोध की कविताओं में इसकी लंबी परंपरा है। उन्होंने याद दिलाया कि नेरुदा ने कहा था, पुराने समय में कवि अंधेरे की शक्तियों से समझौता करता था, आज अंधेरे की शक्तियों की व्याख्या करना कवि का काम है। डबराल ने विश्व कविता में प्रतिरोध की परंपरा पर महत्वपूर्ण व्याख्यान भी दिया जिसमें स्पेन, नात्शी दौर और वियतनाम पर अमेरिकी हमले के दौर की प्रतिरोध की कविताओं को ख़ासतौर से रेखांकित किया गया था।

कार्यक्रम में मौजूद लोग।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने विभिन्न गंभीर अपराधों में हिन्दी भाषी राज्यों के प्रमुख शहरों के अग्रणी होने संबंधी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हिन्दी समाज की तस्वीर बेहद हिंसक, आक्रामक, विकराल और असह्य है। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय का समय जितना भी विकराल रहा हो, हमारे समय से कम विकराल था। इस लिहाज़ से मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने अपने समय का जो वर्णन किया अतिरंजित लगता है पर अफ़सोस कि मुक्तिबोध की मृत्यु के 55 वर्ष बाद और रघुवीर सहाय की मृत्यु के 30 वर्ष बाद इनकी कविताओं की सच्चाई, हमारी रोज़मर्रा की सच्चाई बन गई है।

अशोक वाजपेयी ने याद दिलाया कि रघुवीर सहाय की एक बड़ी चेतना भाषा को लेकर थी। सहाय की पंक्तियों `मगर मुझे पाने दो/पहले ऐसी बोली/जिसके दो अर्थ न हों/` का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज शिखर से ऐसे वाक्य बोले जा रहे हैं जिनका अर्थ जो आपको लगता है, वही नहीं है बल्कि अलग-अलग समुदायों को उनके अलग-अलग अर्थ मिलते हैं। रघुवीर सहाय ने कहा था कि राजनीति बहुत ज़रूरी है पर मैं भी अपने लिए बहुत ज़रूरी हूँ। रघुवीर सहाय अपने को होम करके राजनीति करने वाले या राजनीति में विश्वास करने वाले नहीं थे। इस तरह वे जाहिर करते हैं, बहस एक चीज़ है, जिसे पहले से सहमति के बिना किया नहीं जा सकता। वाजपेयी ने कहा कि सोचिए,उस समय बहस नहीं की जा सकती थी तो अब तो बोला भी नहीं जा सकता।

अशोक वाजपेयी ने कहा कि तीन बड़े कवियों राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने हिन्दी कविता में गद्य की घुसपैठ की। रघुवीर सहाय ने यह काम अधिक सुघड़ता से किया। वे भाषा की नैतिक और राजनीतिक चौकसी की जिम्मेदारी को कविता का काम मानते थे। वे मानते थे कि काव्य भाषा समझ-जतन से शिल्पित हो तो वह यह काम करने में सबसे अधिक सक्षम है। हमारा लोकतंत्र सीधे-सीधे कविता में पहली बार रघुवीर सहाय के यहां आता है।

वाजपेयी ने कहा कि रघुवीर सहाय ने कविता के लिए पत्रकारिता का बहुत लाभ उठाया। पत्रकारिता के कारण उन्हें राजनीति और सत्ता को सीधे देखने का मौक़ा मिलता था। उन्होंने इस मौक़े का औरों से बिल्कुल अलग उपयोग किया। यह आकस्मिक नहीं है कि वे अपनी मृत्यु से पहले दंगों में हिन्दी मीडिया की भूमिका पर एक रिपोर्ट लिख रहे थे। एक अर्थ में रघुवीर सहाय आज भी वह रिपोर्ट लिख रहे हैं क्योंकि आज हालत और ज़्यादा भयानक है। मीडिया का पतन और ज़्यादा व्यापक हो चुका है। यह बात प्रेस क्लब में कहना ज़रूरी है क्योंकि यह भी पतन का एक केन्द्र बन चुका है या बन गया होगा।

अशोक वाजपेयी ने कहा कि रघुवीर सहाय को छंद का अद्भुत हुनर हासिल था। उन्होंने छंद में जो कविताएं लिखीं, बाकायदा छंद में लिखीं। `आत्महत्या के विरुद्ध` के बाद उनके यहां लय का जो लगभग उन्मेष है, यानी गद्य को लय का उपहार दे देना, पहले कभी नहीं था। रघुवीर सहाय ऐसे कवि थे जो न ख़ुद को रियायत देते थे, न दूसरों को। वे ऐसे बेरियायत कवि के रूप में याद किए जाएंगे, जैसे मुक्तिबोध बेराहत कवि के रूप में। 

अपने भाषण की शुरुआत में अशोक वाजपेयी ने रघुवीर सहाय के चारों कविता संग्रहों पर लिखी गईं अपनी समीक्षाओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनकी आलोचना के विकास में सहाय की बड़ी भूमिका रही। `क्या लेखक हत्यारों के साझीदार होंगे?` – सहाय की विभिन्न पंक्तियों का हवाला देते हुए उन्होंने आज बेहद मुखर सवाल की तरह उपस्थित इस पंक्ति का भी ज़िक्र किय़ा।

उद्भावना के संपादक अजेय कुमार ने कहा कि रघुवीर सहाय फासिस्ट विरोधी कवि थे। वे आज होते तो सारे पुरस्कार लौटा चुके होते। अजेय ने रघुवीर सहाय की तमाम तारीफ़ें करते हुए उनकी कविताओं में जनता की संघर्षशीलता, फाइटिंग स्प्रिट, आंदोलन, व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के आह्वान जैसी बातों का अभाव होने का उल्लेख किया। कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने `लिखावट` संस्था और उससे रघुवीर सहाय के जुड़ाव के बहाने सहाय से जुड़े संस्मरण सुनाए। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि विमल कुमार के नये संग्रह `जंगल में फिर लगी है आग` और उद्भवना की रघुवीर सहाय पर केंद्रित पुस्तिका `आने वाला खतरा` का लोकार्पण भी हुआ। विमल कुमार का यह संग्रह उद्भावना प्रकाशन से आया है। `आने वाला खतरा` का संपादन अजेय कुमार और युवा कवि कुमार मंगलम ने संयुक्त रूप से किया है। कार्यक्रम का संचालन `आजकल` के संपादक राकेश रेणु ने किया।

रघुवीर सहाय की पुत्री मंजरी जोशी ने उनकी तीन कविताओं का पाठ किया। सविता सिंह, अनामिका, प्रियदर्शन, राकेश रेणु, तुषार धवल, देवयानी भारद्वाज, रश्मि भारद्वाज और कुमार मंगलम ने अपनी कविताएं पढ़ीं। आमंत्रण पत्र पर कवितापाठ के लिए छपे नामों में से देवी प्रसाद मिश्र और कुमार अंबुज कार्यक्रम में नहीं आ सके। वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल ने मंच की शोभा बढ़ाई। आयोजक के बिना नाम वाले इस सफल आयोजन का श्रेय वरिष्ठ कवि-पत्रकार विमल कुमार को जाता है। यह आमंत्रण पत्र पर छपे उनके फोन नंबर से ज़्यादा दरवाजे पर मेहमानों की इंतज़ार में उनकी मौज़ूदगी से पहचाना जा सकता था।

(दिल्ली से जनचौक के रोविंग एडिटर धीरेश सैनी की रिपोर्ट।)

This post was last modified on December 9, 2019 6:41 pm

Share