Sunday, May 22, 2022

पुस्तक समीक्षा: सर सैयद को समझने की नई दृष्टि देती है ‘सर सैयद अहमद खान: रीजन, रिलीजन एंड नेशन’

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19वीं सदी के सुधारकों में, सर सैयद अहमद खान (1817-1898) कई कारणों से असाधारण हैं। फिर भी, अब तक, अंग्रेजी में उनका कोई व्यापक मूल्यांकन या जीवनी संबंधी लेख उपलब्ध नहीं है। शायद, इस तथ्य के कारण कि सर सैयद के अधिकांश लेखन और भाषण मूल रूप से उर्दू में थे।

अन्य संभावित कारण यह भी हो सकता है कि जो लोग खुद को सर सैयद की आधुनिक शिक्षा की वकालत को स्वीकार करते थे, उनमें से बहुत से लोग उन ग्रंथों की तर्कसंगत व्याख्या के लिए तैयार नहीं थे, जिन्हें सर सैयद ने धार्मिक शिक्षा के लिए आगे बढ़ाने का प्रयास किया था। प्रासंगिक रूप से, यह सुधार एक परियोजना थी, मुसलमानों के बीच आधुनिक शिक्षा की परियोजना को प्राथमिकता देने और वास्तविक बनाने के लिए, सर सैयद को अपने अंदर मौजूद व्यावहारिकता को जल्द ही छोड़ना पड़ा।

इस प्रकार, बशीर अहमद डार ( रिलीजियस थॉट ऑफ सर सैयद अहमद खान , लाहौर, 1957) और क्रिश्चन डब्ल्यू. ट्रोल ( सैय्यद अहमद खान: अ रिइंटरप्रिटेशन ऑफ मुस्लिम थियोलॉजी, दिल्ली, 1978), ऐसे शुरुआती विद्वान थे, जिन्होंने उनके जीवन और कार्यों के अन्य सभी पहलुओं को छोड़कर, केवल उनके धार्मिक सुधारों को लेकर मंथन किया।

1960 से, यू.एस.ए. में रह रहे एक पाकिस्तानी विद्वान, हफीज़ मलिक (1930-2020) ने सर सैयद के सुधारवाद और राजनीति पर कुछ लेख प्रकाशित किए। यह मुख्य रूप से, सर सैयद को, पाकिस्तान के विचार और उसके धार्मिक रूप से प्रेरित क्षेत्रीय अलगाववाद के लिए, पुरातनता की तलाश करने के प्रयास मात्र थे।

सर सैयद के राजनीतिक विचार पर, हारून खान शेरवानी, के लेख ( इस्लामिक कल्चर, जुलाई 1944) ने यह तर्क देने का प्रयास किया कि 1858 से 1867 और 1885 तक, यथार्थवादी और व्यावहारिक, सर सैयद, को अपनी राजनीतिक स्थिति में कई बदलाव करने पड़े, और अत्यावश्यकताओं के बावजूद, उनकी अनिवार्य प्रतिबद्धता यह थी कि ‘हिंदुओं और मुसलमानों के हित समान थे और उन्होंने राजनीति, सामाजिक सुधारों और शैक्षिक मामलों में, शब्द और कर्म दोनों अर्थों में, एकजुट भारत का समर्थन किया’।

परिणामस्वरूप, भारतीय इतिहासलेखन में, नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (1946) और आर.सी. मजूमदार की पुरानी पाठ्यपुस्तक, ‘एन एडवांस हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में संक्षिप्त टिप्पणियों के अपवाद के साथ, सर सैयद को एक खास चश्मे से जांचा परखा जाने लगा, कि उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में स्थापित) का विरोध किया, उनकी उर्दू (भाषा और लिपि) की वकालत को, अलगाववादी राजनीति के बीज के रूप में देखा जाने लगा, जो सर सैयद की मृत्यु के बाद भी दशकों तक चलता रहेगा।

एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस (1886 में स्थापित) और बाद में जिसको मुस्लिम लीग (1906 में स्थापित) द्वारा हाइजैक या अपना लिया गया, ने शिक्षा और अनुसंधान के संस्थानों के प्रसार को आगे बढ़ाने के बाजाए इसे पुन: र्निर्देशित कर राजनीति तक सीमित कर दिया, जिसने सर सैयद के बारे में घिसी-पिटी धारणा को और अत्यधिक भ्रामक रूप में बढ़ावा देने में मदद की। जबकि तथ्य यह है, कि सर सैयद की मृत्यु 1898 में हो चुकी थी, जब भारतीय राष्ट्रीयता अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी और यह अभी भी एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में विकसित होने के लिए संघर्ष कर रहा था, और औपनिवेशिक भारत के सभी सुधारक, धार्मिक विशिष्टता से ग्रसित थे, जिसको नजरअंदाज करने के लिए, सर सैयद को जान बूझ कर चुना गया था।

इसके अलावा, भारत के विभाजन के प्रमुख इतिहास लेखों ने भी केवल मुसलमानों पर दोषारोपण करने के लिए (और मुस्लिम लीग और मुस्लिम लीग विरोध, के बीच अंतर करने से इनकार करते हुए), इस प्रेरित धारणा को और भी अधिक बढ़ावा दिया।

जैसा कि सर सैयद के अध्ययन पर शोध की घोर कमी, निराशा जनक है, वैसे में, प्रोफेसर शाफे क़िदवई ने, सर सैयद के ऊपर अपने बेहद पठनीय जीवनी–लेख में, इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। सर सैयद अहमद खान: रीजन, रिलीजन एंड नेशन (सर सैयद अहमद खान: तर्क, धर्म और राष्ट्र, 2021), यह पुस्तक गहन और विस्तृत अध्यन के साथ ही प्राथमिक स्रोतों पर भी आधारित है।

उर्दू और अंग्रेजी दोनों भाषा में पारंगत, शाफे किदवई, ने सर सैयद के ऊपर बड़े पैमाने पर शोध और लेखन का कार्य किया है। उन्होंने, अपनी उर्दू पुस्तक, सवानीह-ए-सर सैयद: एक बाज्याफ्त (सर सैयद की जीवनी पर पुनर्विचार), जिसका कई संस्करण प्रकाशित हो चुका है, में उन्होंने, सर सैयद के आधिकारिक और अर्ध-आधिकारिक जीवनी लेखों में, कई तथ्यात्मक त्रुटियों को उजागर किया, और उन्हें सुधारने का प्रयास किया है। शाफे किदवई, सीमेंटिंग एथिक्स विद मोडरनाईज़ेशन (आधुनिकता के साथ नैतिकता का जुड़ाव, 2010) के भी लेखक हैं, जो सर सैयद द्वारा प्रकाशित दो पत्रिकाओं, अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट (1866 में लॉन्च) और तहज़ीब-उल-अख़लाक (या मोहम्मडन सोशल रिफॉर्मर, 1870 में लॉन्च) का विश्लेषण करता है।

समीक्षाधीन पुस्तक, सर सैयद का समग्र रूप से आकलन और मूल्यांकन करने का प्रयास करती है। यह पुस्तक सर सैयद से जुड़े लगभग सभी विवादास्पद मुद्दे को ध्यान में रखते हुए, उनके लेखन, जैसे, ट्रैक्ट्स, निबंध, संपादकीय, समीक्षा, भाषण, पत्र/पत्राचार, आदि का आकलन और मूल्यांकन करने का प्रयास करती है।

प्रस्तावना में, शाफे किदवई लिखते हैं:

सर सैयद अहमद खान (1817-1898) विदेशी शासन द्वारा किए गए दमन और अधीनता के खिलाफ खड़े दिखते हैं और नागरिक समाज के रूप में एक दीवार बनकर, हठधर्मिता और अंधविश्वासों को मुक्त करने का प्रयास करते हैं। और सामाजिक वर्ग के लिए सशक्तिकरण के मुद्दे को प्रचारित करते नजर आते हैं।

यह पुस्तक शिक्षा और सामाजिक-धार्मिक सुधारों में, सर सैयद के हस्तक्षेप की व्याख्या या प्रशंसा करने का प्रयास नहीं करती है, बल्कि, यह बताने की कोशिश करती है कि कैसे उन्होंने भारत के सामूहिक जीवन को क्रिस्टलीकृत किया … और पुस्तक का उद्देश्य सर सैयद को चुनौतीपूर्ण प्रश्न के संदर्भ में खोजना है, जो उन्नीसवीं सदी के भारत में बार-बार सामने आए” (p.xvi)।

शाफे किदवई का मत है कि सर सैयद का मूल्यांकन आधिकारिक/अर्ध-आधिकारिक जीवनियों के आधार पर अधिक किया गया है, और इस प्रकार यह पुस्तक विद्वानों को, सर सैयद के लेखन को गहराई से देखने समझने के लिए आमंत्रित करती है।

अब तक, अनिवार्य रूप से, सर सैयद को अंग्रेजों के सहयोगी के रूप में देखा जाता रहा है, इस समस्या को जाने बिना कि सुधारवादियों और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं में विरोधाभास और विसंगतियां एक औपनिवेशिक समाज में अधिक अपरिहार्य थीं, किदवई साक्ष्यों पर आधारित बहुत सारे सबूतों को बताते हैं,  जिसमें सर सैयद ने कई मौकों पर ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ, न केवल अपनी पुस्तक, असबाब–ए–बगावत–ए–हिंद (1857 के विद्रोह के कारण,1859) में बल्कि 1860 और 1880 में भी, अपने असंतोष को खुले तौर पर व्यक्त किया था।

भारतीयता की मजबूत जड़ें

किदवई, अपनी पुस्तक में, सर सैयद द्वारा अकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए राहत कार्यों के निर्वहन में उनके प्रशासनिक योगदानों का, 1860 से शैक्षिक प्रशासन में उनके योगदान का, उनके विधान परिषद में और स्वास्थ्य संबंधित बिलों के प्रस्ताव में गहन और विस्तृत हस्तक्षेप का, और इल्बर्ट बिल (1883) के खिलाफ उनके कड़े विरोध का भी विस्तार से चर्चा किया है, और उसको पुस्तक में सूचीबद्ध भी किया है।

शिक्षा पर बने हंटर कमीशन (1882), के कलकत्ता में आयोजित इसकी पहली बैठक से, सर सैयद ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि, ‘न तो एजेंडा प्रसारित किया गया था और न ही गंभीर चर्चा के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया गया था’ (पृष्ठ 36)। पद छोड़ने के बाद,सर सैयद ने हंटर आयोग की प्रगति पर पैनी नज़र रखी और इसकी विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करके, भारत के सांस्कृतिक लोकाचार और संवेदनशीलता की अनदेखी के लिए शिक्षा नीति के दस्तावेज पर प्रहार किया।

सर सैयद का भारतीय जड़ों से गहरा लगाव इस बात से प्रमाणित होता है कि उनकी पुस्तक, आसार-उस-सनादीद (1847), जो कि ‘1400 ई.पू. से 1843 ई. तक, दिल्ली पर शासन करने वाले राजाओं का एक प्रामाणिक कालानुक्रमिक विवरण है’। किदवई, अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजेटियर ( AIG,  जून 27, 1880) से उद्धृत करते हुए, सर सैयद के इस रुख को और अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं, जिसमें सर सैयद लिखते हैं, “जैसे आर्य राष्ट्रों के लोगों को हिंदू कहा जाता है, वैसे ही मुसलमानों को भी हिंदू कहा जा सकता है, यानी वे, जो भारत में रहते हैं”।  (पृष्ठ 115)।

सर सैयद का भारतीय जुड़ाव, केवल उनकी बौद्धिक व्याख्याओं तक ही सीमित नहीं था। उनका राजनीतिक जुड़ाव भी पान-इस्लामवाद के खिलाफ खड़ा था। अतः उन्होंने उम्मा (वैश्विक मुस्लिम पहचान) की धारणा को खारिज कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने मुसलमानों की भारतीय पहचान (कौम) पर अधिक बल दिया। अपने पत्र लेखन और भाषणों में वह शब्द, कौम से जुड़े विवादों के बारे में अधिक सर्तक हो गए, और उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल कई अर्थों में किया: जाति, भाषाई और उप-क्षेत्रीय पहचान, राष्ट्रीयता, और इसी तरह के दूसरे अर्थों में भी किया। 

राष्ट्र की अवधारणा

किदवई, इस पुस्तक में, ‘राष्ट्र’ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (पृष्ठ. 114-120) के मुद्दे से जुड़े हुए दिखते हैं। वह वतन (मातृभूमि), कौम, और इस मुद्दे से जुड़ी बहसों के अर्थपूर्ण जुगलबंदी को उजागर करते हुए नजर आते हैं। हालांकि, किसी को यह लग सकता है कि इस पुस्तक को, औपनिवेशिक भारत में विकसित हो रहे राष्ट्रवाद पर, प्रमुख विमर्शों के साथ अधिक सूक्ष्म और ऐतिहासिक रूप से जुड़ाव की आवश्यकता है, जैसा कि पार्थ चटर्जी और सी.ए. बेली के अध्ययन में दिखता है।

तीसरा अध्याय, जिसका शीर्षक, ‘अनरावेलिंग सर सैयद’ है, आज के समय में हम सब जिस असहिष्णुता के वातावरण का सामना कर रहे हैं, के संदर्भ में, विशेष रूप से प्रासंगिक है। किदवई का तर्क है:

“ईशनिंदा, धर्मांतरण, मुसलमानों के लिए आरक्षण [शिक्षा, विधायिका और रोजगार], लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिहाद, राष्ट्र, लोकतंत्र, बहुलतावाद, शिक्षा, अधीनता, आत्म-सम्मान, और महिला शिक्षा, मानवीय गरिमा के लिए एक स्थायी चिंता का विषय है, अभी भी इस विखंडित संसार में प्रासंगिक लगती है जिसमें हम रहते हैं” (पृष्ठ 86)।

विलियम मुइर की किताब के अनुसार, जिसमें पैगंबर मोहम्मद के ऊपर तिरस्कारपूर्ण टिप्पणी की गई थी, सर सैयद ने ‘विलियम मुइर द्वारा इस्तेमाल किए गए स्रोतों को क्रॉसचेक करके एक निष्पक्ष उत्तर तैयार करने’ और ‘निगमनात्मक तर्कों को नियोजित करने, इतिहास और न्यायशास्त्र में अपने आधार के साथ मिलकर’, लेखक द्वारा इस्तेमाल की गई अनुमान पद्धति पर प्रश्न उठाया है। और पैगंबर मोहम्मद के द्वारा किए गए मानवीय कार्यों और समाज के लिए उनके नैतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता को उजागर करने के लिए, कई उदाहरणों का हवाला भी दिया है’ (पृष्ठ 88)।

शाफे किदवई ने अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट ( AIG) में सर सैयद के लेखन का उल्लेख किया है, जो इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के खिलाफ, एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस (1889 सत्र में) के उस दावे के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी देती है, जिसका मवाद, हिंदू-मुस्लिम में घृणा को भड़काने का काम करती है। इस सत्र ने, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित, जॉर्ज डब्लू. कॉक्स द्वारा लिखित पुस्तक– हिस्ट्री ऑफ द इस्टैब्लिशमेंट ऑफ ब्रिटिश रूल इन इंडिया (1884) के विशिष्ट तीन पृष्ठों,को हटाने का प्रस्ताव पारित किया। जो अंततः 1892 में, व्हीलर की टेल्स फ्रॉम इंडियन हिस्ट्री से बदल दिया गया।

जैसा की औपनिवेशिक काल की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों ने, दो समुदायों (हिन्दू–मुस्लिम) के बीच घृणा फैलाने का काम किया। शिबली नोमानी (1857-1914) ने, एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस में एक ऐसे इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की परियोजना को लाने का प्रस्ताव रखा था, जो औपनिवेशिक प्रेरित सांप्रदायिकता को कम कर,उसे मारक प्रदान कर सके। ज़काउल्लाह ने, अपने ‘तारिख़-ए-हिन्दुस्तान’ (1915) के पहले खंड के ‘परिचय’ में इलियट और डाउसन की पुस्तक (1849) में सांप्रदायिक तत्वों की ओर इशारा किया है। हालांकि, एजुकेशनल कांफ्रेंस की यह योजना उपेक्षित ही रही, और अंततः 1932 में, सैयद सुलेमान नदवी (1884-1953) ने, इस विषय को वापस लाने का सुझाव दिया।

जिसमें, मध्यकालीन भारत और उसके क्षेत्रीय राज्यों के, सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहास को लिखने का प्रस्ताव दिया गया था। मोहम्मद हबीब (1895-1971), हारून खान शेरवानी (1891-1980) और कुछ अन्य इतिहासकार, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, समिति में शामिल थे। उनके प्रकाशनों ने, इतिहास-लेखन के माध्यम से, उपनिवेशवाद से प्रेरित सांप्रदायिक जहर के प्रतिरक्षी की पेशकश की। यह प्रतिरक्षी मारक, दारुल मुसन्नेफिन शिबली एकेडमी (आज़मगढ़) से संबंधित नालंदा (बिहार) के दिस्ना गांव के सैयद सबाहुद्दीन अब्दुर्रहमान (1911-1987) के उर्दू भाषा के ऐतिहासिक लेखन में भी जारी रहा। उन्होंने रज़्म (राजनीतिक युद्धों और दरबारी इतिहास) के बजाय एक बज़्म (सांस्कृतिक इतिहास) श्रृंखला पर मंथन किया। कुंवर मोहम्मद अशरफ़ (1903-1962) के कार्यों के बाद, रहमान का लेखन, लोगों के (न कि शासक के लिए) इतिहास के लिए समर्पित हैं।

धर्मांतरण और जेहाद पर सर सैयद की अवधारणा

सर सैयद धर्मांतरण के सख्त विरोधी थे, चाहे वह बलपूर्वक हो या प्रलोभन से ही क्यों न हो। उनका मानना ​​था कि धर्मांतरण, समाज के बहु-सांस्कृतिक चरित्र को नष्ट कर देता है। जैसा कि शाफे किदवई लिखते हैं, ‘समावेशी और साझा करने के इर्द-गिर्द घूमते हुए सह-अस्तित्व के ज्ञानमीमांसीय ढांचे की व्याख्या की गई है’। (पृष्ठ 92)।

जेहाद के विषय पर, सर सैयद, जमालुद्दीन अफगानी (1839-1897) से पूरी तरह असहमत थे। उन्होंने हंटर की पुस्तक, आवर इंडियन मुसलमानस का खंडन किया। शाफे किदवई, सर सैयद के कई लेखों से कई ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, हालांकि, किदवई इस प्रासंगिक तथ्य को भूल जाते हैं कि सर सैयद ने मौलवी चिराग अली (1844-1895) से यह लिखने के लिए आग्रह किया था कि, कैसे जिहाद को काफी गलत तरीके से तोड़ मड़ोर के पेश किया गया है, इसलिए, यह बात बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है। संभवतः, किदवई ने, धार्मिक कट्टरता के खिलाफ सर सैयद के संघर्ष और धार्मिक सुधारों की उनकी परित्यक्त परियोजना पर अधिक विस्तार को, छोड़ दिया है, क्योंकि डार (1957) और ट्रोल (1978) पहले ही इस पहलू से निपट चुके हैं। हालांकि, इस विशेष एजेंडे को छोड़ने के पीछे के कारणों की, विस्तृत ऐतिहासिक जांच की प्रतीक्षा है।

आरक्षण के खिलाफ

सर सैयद के कुछ लेखों, जिन पर विद्वानों की नज़र अब भी नहीं पहुंच सकी है, को उजागर करने के लिए शाफे किदवई की सराहना की जानी चाहिए। सर सैयद ने पंजाब की अंजुमन-ए-इस्लाम के इस आशय की मांग (1877) का विरोध करते हुए लिखा:

‘भारतीयों, विशेषकर मुसलमानों ने लक्ष्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया, लेकिन खुद को इसके लिए तैयार करने का कोई प्रयास नहीं किया है। यह देश और मुल्क दोनों को गहरा नुकसान पहुंचा सकता है’।

सर सैयद ने 1886 में अपनी स्थिति तब दोहराई जब ‘बंगाल और नोवाखाली के मुसलमानों ने आरक्षण के लिए उनका समर्थन मांगा’; उन्होंने इन शब्दों के साथ अपनी अस्वीकृति व्यक्त की:

 ‘हम इसका समर्थन नहीं कर सकते सेल्फ हेल्प हमारा आदर्श तरीक़ा है, और हम चाहते हैं कि मुसलमानों को प्रगति के लिए प्रयास करना चाहिए’

सर सैयद ने, इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल (1883) के अपने भाषण में, चुनाव प्रणाली पेश किए जाने का कड़ा विरोध किया, इस आधार पर कि ‘भारत जैसा देश, जहाँ जाति भेद अभी भी पनपता है और जहाँ जातियों का कोई मेल नहीं है, जहाँ धार्मिक भेद अभी भी हिंसक हैं, जहाँ शिक्षा अपने आधुनिक अर्थों में समान नहीं है या जनसंख्या के आधार पर सभी वर्गों के लिए  आनुपातिक प्रगति नहीं की है। मुझे विश्वास है कि चुनाव के सिद्धांत की शुरूआत, शुद्ध और सरल हो, … को आसानी से नहीं अपनाया जा सकता है’ ( AIG, 20 जून, 1883)।

हाल ही में, अकादमिक और राजनीतिक हलकों में, सर सैयद के कुछ भाषणों और लेखों ने विशेष रूप से, मुसलमानों के अंदर की शोषित जातियों या समुदायों के खिलाफ अवमानना पर, अधिक ध्यान आकर्षित किया है। हालाँकि, इन आलोचकों ने कई अन्य उदाहरणों की भी उपेक्षा करते नज़र आते हैं, जहाँ सर सैयद ने कमजोर और पीड़ित वर्गों के शैक्षिक समावेश के लिए अपनी चिंता जाहिर की है। हाली की राजनीतिक चेतना के अपने अध्ययन (1959) में मोईन अहसन जज़बी (1912-2005), इस मामले में सर सैयद की आलोचना करने में स्पष्ट थे, हालांकि संक्षेप में ही सही। किदवई, सर सैयद के इस पहलू में उलझने से कतराते नज़र आते हैं।

शाफे किदवई, सर सैयद के कई लेखों का हवाला देते हैं जिसमें सर सैयद लगातार सांप्रदायिक सौहार्द के लिए, गाय की बलि का विरोध करने की बात करते हैं। किदवई, सर सैयद के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरोध के सवाल पर, बदरुद्दीन तैय्यबजी और सर सैयद के बीच पत्रों के आदान-प्रदान को संदर्भित किया है। हालांकि, शेरवानी ( इस्लामिक कल्चर , जुलाई 1944) और डेनिस राइट ( ऑस्ट्रेलियन जर्नल ऑफ पॉलिटिक्स एंड हिस्ट्री,  1989) के निबंधों के साथ जुड़ाव, साथ ही इफ्तखार आलम खान के उर्दू मोनोग्राफ, सर सैयद की लिबरल, सेक्युलर और साइंसी तर्ज़- ए-फ़िक्र,(2018) के साथ थोड़ा और जुड़ाव, ने पुस्तक के इस विशिष्ट खंड को काफी बेहतर बना दिया है। पुस्तक के पांचवें अध्याय के शीर्षक ‘डायलॉजिक अफेयर’, के लिए इस तरह के जुड़ाव की और भी अधिक आवश्यकता थी, जहां उपनिवेशवाद और नस्लवाद के खिलाफ, सर सैयद के निडर दावे के कई उदाहरण अधिक स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। जो सर सैयद के बारे में बनाई गई नकारात्मक और भ्रामक धारणा के बिल्कुल विपरीत है।

चौथे अध्याय में, किदवई ने, सर सैयद की, महिलाओं के आधुनिक शिक्षा के संबंध में, कुछ सीमाओं पर प्रकाश डाला। किदवई ने, गेल मिनॉल्ट ( मॉडर्न एशियन स्टडीज, 1990) द्वारा सैयद मुमताज अली (1860-1935) के संदर्भ में, सर सैयद के खिलाफ लगाए गए कुछ नाटकीय (मेलोड्रामेटिक) आरोपों को खारिज करने के लिए, कुछ महत्वपूर्ण सबूतों का हवाला दिया है, जिसे डेविड लेलीवेल्ड (1978) सहित कुछ अन्य विद्वानों द्वारा लोकप्रिय बनाया गया। शाफे किदवई इसके बाद कुछ और सबूतों की खोज करते हैं, जिसमें सर सैयद, विशेष रूप से अपने पत्र लेखन में, उभर कर सामने आते हैं, उस हिसाब से, वह उतने बड़े ‘अपराधी’ नहीं, जितना कि उन्हें बताया जाता रहा है।

आखरी अध्याय, ‘इंटलेकचुअल अवेकनिंग थ्रो पेरीयोडिकलस’ वाले शीर्षक में, लेखक का तर्क है कि सर सैयद ने पत्रकारिता का एक नया मानक स्थापित किया। यह बिंदु इस पुस्तक का एक और मजबूत पक्ष है। इस खंड में, राष्ट्रवाद की बहस के खंड के साथ, जिसको शाफे किदवई ने छोड़ दिया हैं, वह है कृषि अर्थव्यवस्था और समाज के औपनिवेशिक विनाश पर सर सैयद की व्याख्याएं। सर सैयद के आर्थिक राष्ट्रवाद को कृषि मुद्दों के माध्यम से व्यक्त किया गया, शब्दों के साथ-साथ कार्यों से भी … सर सैयद के कृषि उत्पादन में सुधार कर ग्रामीण भारत को फिर से जीवंत करने के फलस्वरूप ब्रिटिश राज की वित्तीय नींव को कमजोर करने के पहलू को, ऐसा लगता है कि किदवई द्वारा इस पहलू को छोड़ दिया गया है। यह भूल इस लिए भी आश्चर्यजनक है कि इफ्तखार आलम खान ने अपने उर्दू मोनोग्राफ,  सर सैयद और हिंदुस्तानी निजाम-ए-जराअत (2014) में, इस पहलू को शानदार तरीके से सामने लाया है। सर सैयद ने संपादकीय ( AIG, 12 जुलाई, 1892) में लिखा कि मेरे लिए, दादा भाई नौरोजी के हाउस ऑफ कॉमन्स के नामांकन की सराहना करना, कृषि मुद्दों के प्रयासों की सराहना जैसा ही तर्क संगत था।

ऐसी उम्मीद है, बाद के संस्करण में, इस प्रकार की चूकों को सुधारने के अलावा प्रूफ़ की त्रुटियों का ध्यान रखा जायेगा। ग्रंथ सूची में भी सुधार की आवश्यकता दिखाई पड़ती है।

कुल मिलाकर, शाफे किदवई की यह पुस्तक, सर सैयद पर अध्ययन के लिए एक मूल्यवान और ज्ञानवर्धक संस्करण है। पुस्तक में, साक्ष्यों की स्पष्टता और विश्लेषणात्मक व्यवहार, इसे सामान्य लोगों के पढ़ने में उतना ही आनंद और रूचि प्रदान करता है जितना कि यह विशेषज्ञों के लिए उपयोगी और ज्ञानवर्धक है। यह पुस्तक, सर सैयद से संबंधित, सही विवरण प्रस्तुत करने के अपने उद्देश्य में सफल है।

यह पुस्तक, 19वीं सदी के भारत के इतिहास पर पहले से उपलब्ध अध्ययनों और उस युग में औपनिवेशिक राज्य और समाज के साथ मुस्लिम जुड़ाव के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

पुस्तक:

लेखक : शाफे किदवई

प्रकाशन: रूटलेज, लंदन/न्यू यॉर्क, 2021

पेज: 239+xvii (हार्डकवर)

समीक्षक: प्रो. मोहम्मद सज्जाद, (फ्रंटलाइन, मार्च 12, 2021)

हिंदी अनुवाद: नूरूज्ज़मा अरशद

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