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शहादत सप्ताह: न्यायिक हत्या थी भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को दी गयी फांसी

23 मार्च शहीदे आज़म भगत सिंह का शहीदी दिवस है। इसी दिन लाहौर सेंट्रल जेल, जो अब पाकिस्तान में है में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था। अब वहां एक चौराहा है जिसे शादमान चौक कहा जाता है। उस स्थान का नाम बदलने के लिये पाकिस्तान में एक आंदोलन चल रहा है। सरकार ने उनकी बात मान ली है। भगत सिंह स्वाधीनता संग्राम के एक अनोखे सेनानी हैं जो भारत और पाकिस्तान में समान भाव से याद किये जाते हैं। भगत सिंह को हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया था। पर जब गंभीरता से उनके मुक़दमे के बारे में अध्ययन किया जाता है तो यह बात निकल कर सामने आती है कि उनके विरुद्ध चलाया गया यह मुक़दमा विधिक रूप से गलत था और इसमें कई कानूनी कमियां भी थीं।

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था और 23 साल की उम्र में उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ एक ऐसे मुक़दमे में फांसी दे दी गयी जो कानूनी दृष्टिकोण से गैर कानूनी था। लाहौर, पाकिस्तान के एक एडवोकेट जो इस गैर कानूनी मुक़दमे और फांसी की सज़ा के विरुद्ध एक कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं के अनुसार, उन्हें जिस अदालत ने फांसी की सज़ा सुनाई उसे न्यायालय के रूप में पंजाब की विधायिका ने कोई अधिकार ही नहीं दिया था। उस अदालत का गठन ही गैर कानूनी था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के लिये जो डेथ वारंट जारी किया गया था वह उस अदालत द्वारा जारी किया गया था, जिसे डेथ वारंट जारी करने का अधिकार ही नहीं था। मुक़दमे की पूरी सुनवायी ही न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों के विपरीत की गयी थी।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में 8 अप्रैल 1929 को बम फेंका था। उस समय असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी बिल जो सरकार को किसी को भी बिना कारण बंदी बनाने का अधिकार और शक्तियां देता था, पर बहस चल रही थी। उसी के विरोध में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका और उक्त बिल के विरोध में कुछ पर्चे भी फेंके, और यह नारा लगाया कि बहरों के कान खोलने के लिये यह धमाका ज़रूरी था। उन पर्चों पर उनकी माँगे लिखी गयी थीं। यह एक बड़ी घटना थी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद को एक चुनौती थी। वह बम केवल धमाके की आवाज़ के लिये था न कि किसी को मारने के लिये। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहीं खड़े रहे और उन्होंने वहाँ से भागने का भी प्रयास नहीं किया। क्योंकि उनका इरादा ही बिल के खिलाफ जनता और ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करना था।

इस मुकदमे की सुनवाई 7 मई को ब्रिटिश मजिस्ट्रेट बीपी पूल के सामने शुरू हुई। भगत सिंह की तरफ से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता आसफ अली वकील के रूप में पैरवी करने के लिये खड़े हुए। सरकारी वकील राय बहादुर सूर्यनारायण अभियोजन की तरफ से थे। सरकारी वकील ने यह दलील दी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंका गया बम हत्या करने और असेम्बली को उड़ाने के उद्देश्य से फेंका गया था। उन्होंने कहा कि यह हिज मैजेस्टी की अस्मिता पर हमला था। यह ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध एक युद्ध की घोषणा है क्योंकि असेम्बली ब्रिटिश सम्राट का प्रतीक है। मजिस्ट्रेट ने आरोप तय किये और इसे सेशन जज लियोनार्ड मिडिलटन जो जिला जज भी था की अदालत में सुपुर्द कर दिया।

अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया था कि भगत सिंह ने असेम्बली में न केवल बम फेंका था, बल्कि उन्होंने अपनी रिवाल्वर से हत्या करने की नीयत से दो गोलियां भी चलाई थीं। यह आरोप बिल्कुल झूठा था। क्योंकि न तो भगत सिंह और न ही बटुकेश्वर दत्त ने कोई गोली चलाई । इस झूठे आरोप के कारण दोनों क्रांतिकारियों ने मुक़दमे की सुनवाई में सहयोग करने से मना कर दिया। यह बात सही है कि जब भगत सिंह असेम्बली में बम फेंकने गए थे तो उनके पास पिस्तौल थी, जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी देते समय पुलिस को वहीं सौंप दी थी। पुलिस को भी यह पता था कि उस पिस्तौल से कोई गोली नहीं चलायी गई है।

एफआईआर में भी यह बात दर्ज नहीं की गयी थी। जबकि एफआईआर पुलिस ने ही लिखाई थी। मौके से गिरफ्तारी पुलिस ने खुद नहीं की थी, बल्कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वतः ही अपनी गिरफ्तारी दे दी थी। उन्होंने भागने के बजाय गिरफ्तारी देना उचित समझा। लेकिन जज लियोनार्ड मिडिलटन की सेशन अदालत ने 14 साल की सज़ा, असेम्बली में बम फेंकने, हत्या के प्रयास, आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव एक्ट के अंतर्गत सब मिला कर दे दिया।

लेकिन ब्रिटिश सरकार इस सज़ा से भी संतुष्ट नहीं हुई। भगत सिंह को जितनी सजाएं उपरोक्त धाराओं में दी जा सकती थीं, दे दी गयीं थीं। अब उन्हें दूसरी तरह से फंसाने का उपक्रम सरकार द्वारा किया जाने लगा। लाहौर में ही साइमन कमीशन के आगमन पर उसका जबरदस्त विरोध 30 अप्रैल 1928 को पंजाब केसरी कहे जाने वाले कांग्रेस के नेता लाला लाजपत राय ने किया था। पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज लाला लाजपत राय के नेतृत्व में निकले जुलूस पर किया था, जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए और फिर उन्हीं चोटों से उनकी मृत्यु 17 नवंबर 1928 को हो गयी। लाला लाजपत राय ने अपनी घायलावस्था में पुलिस के इस बर्बर लाठीचार्ज पर कहा था कि, मेरे शरीर पर पड़ने वाली लाठी की एक एक चोट, ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील साबित होगी।

लाला लाजपत राय के ऊपर हुए इस हमले में सारा दोष डिप्टी कमिश्नर का था जिसे मारने के लिये क्रांतिकारियों ने योजना बनायी। लेकिन डिप्टी कमिश्नर के ऊपर घात लगा कर हमला करने की योजना सफल तो हुई पर उक्त डिप्टी कमिश्नर की जगह एक युवा अंग्रेज अफसर सांडर्स मारा गया। सांडर्स के साथ एक हेड कॉन्स्टेबल चरण सिंह की भी मृत्यु इस हमले में हुई थी। यह घटना 17 दिसंबर 1928 की है। घटना की एफआईआर, लाहौर के थाना अनारकली में धारा 302, 120 बी आईपीसी की बनाम दो अज्ञात हमलावर युवकों के खिलाफ दर्ज की गयी थी। सांडर्स की हत्या के बाद घटनास्थल और कुछ स्थानों पर कुछ पर्चे चिपकाए गए थे। पुलिस का कहना था कि यह उसी प्रकार के पर्चे थे जो असेम्बली बम कांड में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने फेंके थे। यही एक सुबूत था पुलिस के पास जिसके आधार पर भगत सिंह को ब्रिटिश पुलिस फंसा सकती थी।

सांडर्स और चरण सिंह के मारे जाने का यह मुक़दमा लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सांडर्स, वायसरॉय लॉर्ड इरविन के निजी सचिव का होने वाला दामाद भी था। इसलिए यह मामला ब्रिटिश हुकूमत के लिये और भी महत्वपूर्ण बन गया। यह मुक़दमा, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के खिलाफ ब्रिस्टल जेल में सुना गया और इसकी सुनवाई फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट पंडित किशन लाल ने की । जिनको बाद में अंग्रेजों ने राय बहादुर के खिताब से नवाजा। किशन लाल के ही फैसले से यह मुक़दमा सेशन सुपुर्द हुआ था।

मुक़दमे की सुनवाई के दौरान ही जेल की बदइंतजामी से क्षुब्ध होकर भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी साथियों ने जेल में ही अनशन शुरू कर दिया। उन्होंने मुक़दमे की सुनवाई की तारीखों पर जाना बंद कर दिया और ट्रायल में किसी भी प्रकार से सहयोग देने से मना कर दिया। अभियोजन के पास भगत सिंह के विरुद्ध कोई ठोस सबूत भी नहीं था। जिस पर्चे के आधार पर यह केस खड़ा किया गया था, उस पर्चे की पुष्टि असेम्बली में फेंके गए पर्चे से प्रमाणित नहीं हुई। हालांकि आरोप तय हो चुके थे, पर उसके बाद की सुनवाई बेहद लचर थी।

जेल में चल रहे आमरण अनशन की खबरें लाहौर के दैनिक अखबार ‘द ट्रिब्यून’ में नियमित छप रही थीं। 1930 में ही लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन भी तय था। उस सिलसिले में जब जवाहरलाल नेहरू लाहौर गए तो, वे भगत सिंह से मिलने जेल गए। भगत सिंह से मिलकर जब जेल के बाहर नेहरू निकले तो उनका एक लंबा इंटरव्यू ‘द ट्रिब्यून’ ने छापा। नेहरू ने भगत सिंह और उनके साथियों के इस अनशन का विवरण दिया और इन क्रांतिकारियों को जबरन खाना खिलाने की बात की निंदा की और सरकार से कहा कि वह इन क्रांतिकारियों को राजनीतिक बंदी की सुविधाएं दे। देश मे भगत सिंह की खूब चर्चा होने लगी और ब्रिटिश सरकार ने फिर इन क्रांतिकारियों की जेल में सुविधाएं देने की मांग मान ली। इस आमरण अनशन में क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु भी 13 दिसंबर 1929 को हो गयी।

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा के पृष्ठ 204 में इस मुलाकात का जिक्र इन शब्दों में किया है,

” मैं जब लाहौर में गया था तो यह भूख हड़ताल एक महीना पुरानी हो चुकी थी। मुझे कुछ कैदियों से जेल में जा कर मिलने की इजाज़त मिली थी। मैंने इस मौके का फायदा उठाया। मैंने भगत सिंह को पहली बार देखा और जतिन दास तथा अन्य भी वहीं थे। वे सभी बहुत कमजोर हो गए थे और बिस्तर पर ही पड़े थे, इस लिये उनसे बहुत मुश्किल से ही बात हो सकी। भगत सिंह एक आकर्षक और बौद्धिक लगे जो गज़ब के शांत और निश्चिंत। मुझे उनके चेहरे पर लेश मात्र भी क्रोध नहीं दिखा था। वे बहुत ही सौम्य लग रहे थे और शालीनता से बात कर रहे थे। लेकिन मैं यह सोच बैठा था कि जो एक महीने से भूख हड़ताल पर बैठा हो वह तो आध्यात्मिक व्यक्ति जैसा दिखेगा। जतिनदास तो और भी सौम्य, कोमल तथा लड़कियों जैसा दिखा। हालांकि निरन्तर भूख हड़ताल से वह बहुत कष्ट में था । “

भगत सिंह ने अदालत में अपनी पेशी पर अपना मुक़दमा खुद ही लड़ा। उन्होंने जो दलीलें दी वह अपने बचाव में कम बल्कि उन्होंने अपनी वैचारिक पीठिका के आधार पर अपनी बात कही। उनके भाषण जो अदालत में हुए वे अखबारों में भी खूब छपे और भगत सिंह की एक बेहद प्रबुद्ध और विवेकशील विचारक की क्षवि उभर कर सामने आयी। ब्रिटिश हुकूमत जल्दी से जल्दी मुक़दमे का समापन चाहती थी और भगत सिंह इसे और लम्बा खींचना चाहते थे। उन्हें इस मुकदमे के परिणाम का पता था। लेकिन वे ब्रिटिश न्यायतंत्र को उघाड़ कर रख देना चाहते थे। वे साम्राज्यवाद के शराफत और न्याय के मुखौटे को खींच कर फेंक देना चाहते थे।

उधर सरकार भी जल्दी से जल्दी भगत सिंह के मुक़दमे की सुनवाई खत्म कर देना चाहती थी। 1 मई 1930 को तत्कालीन वायसरॉय लार्ड इरविन ने एक अध्यादेश द्वारा केवल इस मुकदमे की सुनवाई के लिये एक ट्रिब्यूनल का गठन किया जिसे लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई की जिम्मेदारी दी गई। 7 अक्टूबर को ही जब इस ट्रिब्यूनल अवधि समाप्त हो रही थी, इस ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को , अंग्रेज अफसर, सांडर्स और हेड कॉन्स्टेबल चरण सिंह की हत्या का दोषी ठहरा दिया और मृत्युदंड की सज़ा सुना दी।

अब इस मुक़दमे की कानूनी कमियों पर चर्चा करते हैं। पूरा मुक़दमा ही कानूनी कमियों से भरा पड़ा था।

● जिस प्रथम सूचना पर सांडर्स और चरण सिंह की हत्या का दोष भगत सिंह और साथियों पर साबित किया गया था, उस एफआईआर में उनका नाम ही नहीं था।

● पुलिस की तफ्तीश में भी उनका नाम प्रकाश में नहीं आया था।

● उनका नाम बइस्तवाह यानी संदेह के रूप में भी पुलिस ने उक्त एफआईआर में दर्ज नहीं किया था।

● जब असेम्बली बम कांड में उन पर मुकदमा चलाया जाना शुरू हुआ तब इनका नाम लाहौर षड्यंत्र केस में अभियोजन द्वारा जोड़ा गया।

● जिस अध्यादेश के अंतर्गत गठित ट्रिब्यूनल द्वारा, लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई हुई थी उसका अनुमोदन विधायिका से कभी लिया ही नहीं गया था। जबकि कानूनन ऐसा करना ज़रूरी था।

● जिस डेथ वारंट पर भगत सिंह और साथियों को फांसी दी गयी थी, वह भी काल बाधित हो गया था।

● जिस डेथ वारंट पर इन शहीदों को फांसी दी गयी थी, उक्त डेथ वारंट को उस अदालत द्वारा ज़ारी भी नहीं किया गया था, जिसने फांसी की यह सजा सुनाई थी।

● नियमानुसार, ट्रायल कोर्ट ही जिसने फांसी की सज़ा सुनाई है वही डेथ वारंट जारी कर सकता है। अतः यह डेथ वारंट ही अवैधानिक था।

● लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह और साथियों को बचाव का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया।

● अभियोजन के कुछ 450 गवाहों में से बचाव पक्ष को जिरह की अनुमति दी ही नहीं गयी।

● केवल उन्हीं गवाहों से पूछताछ करने की अनुमति मिली जो वायदा माफी गवाह, (अप्रूवर) बन गए थे।

● ट्रिब्यूनल की पूरी कोशिश थी कि जल्दी से जल्दी फांसी की सज़ा सुना दी जाए। जैसे सब कुछ पहले से तय हो।

● एफआईआर में दो अज्ञात युवकों का उल्लेख है। विवेचना में राजगुरु और सुखदेव के नाम बाद में आये। फिर भगत सिंह का नाम कब और किस संदर्भ से आया यह न तो पुलिस विवेचना में बता पायी और न अभियोजन अदालत में।

● संक्षेप में कहें तो, न वकील, न दलील न अपील का यह एक उदाहरण था।

लाहौर, पाकिस्तान के एक एडवोकेट, इम्तियाज रशीद कुरेशी ने लाहौर हाईकोर्ट में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ चले लाहौर षड्यंत्र के मुक़दमे को पुनः खोलने के लिये उक्त ट्रायल में हुई कमियों को रेखांकित करते हुए एक याचिका भी दायर की है। कुरेशी, लाहौर में भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष भी हैं। ऊपर जो कमियां बिन्दुवार बताई गयी हैं वह इन्हीं कुरेशी की याचिका से ली गयी हैं।

यह सब विवरण, पाकिस्तान के अखबार डॉन की साइट पर उपलब्ध है। भगत सिंह आज भी पाकिस्तान और विशेषकर पंजाब के इलाके में लोकप्रिय हैं। इम्तियाज कुरेशी यह भी चाहते हैं कि लाहौर षड्यंत्र के मुक़दमे की गैर कानूनी सुनवाई और भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को दुर्भावनापूर्ण तरीके से मृत्युदंड देने के लिये ब्रिटेन मांफी मांगे।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस कानून के राज का नक़ाब ओढ़ रखा था वह लाहौर षड्यंत्र केस में बुरी तरह से उतर गया और शोषक, साम्राज्यवाद का विद्रूप चेहरा सामने आ गया। इंक़लाब ज़िंदाबाद और साम्राज्यवाद का नाश हो का उद्घोष करते हुए भारतीय स्वाधीनता संग्राम का यह अमर योद्धा अपने दो साथियों सहित शहीद हो गया।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on March 25, 2020 4:05 pm

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