Friday, December 2, 2022

एक गैर गांधीवादी का गांधी को श्रद्धांजलि

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कल शाम से ही अनमयस्क की स्थिति में हूं। सोच रहा था कल गांधी जयंती होगी। मैं किस तरह से गांधी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करूंगा? मैं गांधीवादी नहीं हूं ।गांधी से मेरे बहुत मतभेद हैं ।उनकी इतिहास समाज दृष्टि को लेकर मेरे बहुत से सवाल हैं। लेकिन फिर भी मैं गांधी जयंती के दिन तनावग्रस्त हो जाता हूं।  गांधी विचार विरोधी इस काल खण्ड में पाखंड और अनैतिकता का जैसा दौर चल रहा है उसमें हो सकता है कि कल उस परिवार के लोग भी श्रद्धांजलि अर्पित करें जिन्होंने बरसों गांधी विरोधी अभियान चलाकर एक हत्यारे मनुष्य को तैयार किया था ।’वह आदमी था’ यह कहते हुए मुझे शर्म आ रही है ।गांधी की हत्या करने वाला मनुष्य हो ही नहीं सकता। जिसके अंदर से उसके मनुष्यत्व को मार दिया गया होगा।

लेकिन एक दिन में तो ऐसा हुआ नहीं होगा। हत्यारों का सरगना योजना बद्ध तरीके से मनुष्य के दिमाग को इस लायक बनाया होगा। गांधी की हत्या के लिए तैयार कर पाना कितना कठिन रहा होगा ।एक लंपट आवारा वैश्या गामी शराब का अवैध कारोबार करने वाला अंग्रेजी सेना का चाकर इतना साहस कैसे अपने अंदर इकट्ठा कर लिया कि क्षीणकाय कमजोर लाठी के सहारे चलने वाले बूढ़े को प्रणाम करके गोली मार दे ।और उसके बाद गर्व के साथ कहे कि” गांधी बध क्यों  “? 

बड़े ही परिश्रम का काम रहा होगा ।कितनी मेहनत से उसके मस्तिष्क को क्रूर हिंसक बनाया गया होगा। इसके लिए हो सकता है उसे बरसों तक संरक्षण दिया गया हो। उसे हर तरह की मदद व सुख सुविधा की गारंटी की गई हो ।

चूंकि यह जघन्य कृत्य कोई सामान्य चेतना वाला व्यक्ति नहीं कर सकता, सोच भी नहीं सकता ।गांधी से असहमत होते हुए अंबेडकर, भगत सिंह, स्वामी सहजानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वप्न में भी सोचा नहीं होगा कि गांधी की हत्या भी कोई कर सकता है और गांधी को प्रार्थना स्थल पर जाते समय शहीद कर दिया जाएगा।

अंग्रेज शासक कृषकाय शरीर वाले आत्मिक शक्ति ईमानदारी और मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम से भरपूर व्यक्ति के सामने आकर टिक नहीं पाते थे। बड़े-बड़े आभामंडल वाले इस व्यक्ति से टकराकर बौने हो जाते थे। तो ऐसे व्यक्ति की हत्या करने वाला कितने कठिन परिश्रम से खूनी संस्कृति में दीक्षित संस्कारित और क्रूर बनाया गया होगा।

हत्यारे के संरक्षक कितने ताकतवर और हृदय हीन पाषाण चरित्र के मनुष्य रहे होंगे। शायद वे मानव भक्षी प्राणियों की प्रजाति रहे हों। उनके डीएनए में हिंसक आनुवांशिक गुण रहे होंगे। जिन्होंने एक लंपट को इस काम के लिए तैयार किया होगा। 

हो सकता है आज के दिन गांधी के ऊपर उसके हत्यारे का महिमामंडन हावी हो जाए। गांधी अमर रहे की जगह पर गोडसे जिंदाबाद की डरावनी हुंकार ज्यादा तेज आवाज में सुनाई दे ।लेकिन यह हुंकार कायरों के वंशजों की होगी। आत्मग्लानि और हीन भावना को छिपाने के लिए वह जोर-जोर से गोडसे जिंदाबाद बोल रहे होंगे। गांधी वध जैसे शब्दों का उच्चारण कर रहे हों।

फिर भी अंदर से वह कांप रहे होंगे। यह डरी कायरों की जमात होगी । जो जीते जी गांधी का सामना नहीं कर सकती थी ।खुद सामने जाकर ललकारने की ताकत उसमें नहीं थी।  गांधी के सामने जाने पर बौना महसूस करती रही होगी । जीवित गांधी के हिंदू के सामने उनका हिंदुत्व तुच्छ हो जाता रहा होगा। 

इसलिए उन्होंने एक पाषाण हृदय नफरती ऑब्जेक्ट तैयार किया।

सोचता हूं क्या गांधी को यह जानकारी नहीं थी। क्या अपने खिलाफ चलाए जा रहे कुत्सित अभियान से गांधी वाकिफ नहीं थे? नोआखाली में घूमते हुए उन्होंने नफरत के मंजर देखे थे। वहां उन्होंने अपने रास्ते में बिछाए जा रहे कांटे, की जा रही गंदगी या मारे जा रहे ताने को नहीं सुना होगा। लेकिन वे जरा भी विचलित नहीं हुए। वह आगे बढ़ते रहे। धीरे-धीरे बढ़ता रहा शांति सद्भाव प्रेम का कारवां। 

वे “वैष्णव जन तो तेनो कहियो ,जो पीर पराई जाणे रे”। गाते हुए आगे बढ़ते रहे। वह इंसान की पीर को समझने और बांटने की कोशिश कर रहे। लेकिन परपीड़कों  को नागवार गुजरा। गांधी का यह काम उनके मानसिक संरचना के खिलाफ था। विचार प्रक्रिया के प्रतिकूल था ।

वे तो उस समय भी उसके चरित्र हनन में लगे थे । नौजवान बेटियों के कंधे पर हाथ रखकर लड़खड़ाते हुए चल रहे गांधी पर कीचड़ उछाल रहे थे। चरित्र हनन करने पर लगे थे। जो आज उनके वंशजों का स्वाभाविक  व्यवहार भी है।

लेकिन वह बूढ़ा पीर का गीत गाते पीड़ा की आन्तरिक धुन सुनते हुए धीरे धीरे लाठी और आत्मशक्ति के सहारे चला जा रहा था। उसके पीछे पीछे शांति फैलती जा रही थी। सद्भाव बढ़ता जा रहा था। यही नागवार गुजरा उन लोगों पर। जो पर पीड़क थे। जो पीड़ा का विस्तार करने में लगे थे। जो खून आग हिंसा बलात्कार बांट रहे थे। लेकिन वह उन लोगों की पीर जिन्हें वे” पराया “कहते हैं उनकी पीर के साथ जुड़ने की बात कर रहा था ।वह आदमी के पीर की दर्द को महसूस करने की बात कह रहा था।

यह दो राष्ट्रवादी नफरती सिद्धांत कारों को ना पसंद था ।वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। क्योंकि वे राजमहल में बैठे गोरों की दया और रोटी के टुकड़े पर पल रहे थे। इसलिए वह गांधी के खिलाफ थे।

उनके पास गांधी के विचारों का जवाब नहीं था। वे अंबेडकर नहीं थे कि गांधी के सामने खड़ा होकर गांधी के सनातनी विचारों को ललकार सकें। नेता जी सुभाष चंद्र बोस नहीं थे कि गांधी से लड़ने के बाद निर्वासन झेल सकें। गांधी के कर्म का तोड़ नहीं था उनके पास। गांधी के कदमों के साथ चलने की ताकत नहीं थी उनमें।

इसलिए उन्होंने हत्यारों को तैयार किया। ऐसे संस्थान बनाए होंगे ,शिक्षण केंद्र बनाए होंगे ।जहां ऐसे हत्यारों को तैयार किया जा सके। उनकी मानवीय संवेदना शोख ली जाए जिससे वह कृषकाय  मनुष्य की हत्या कर सके। 

क्या 78 साल के गांधी को गोली दागने में उन्हें हिचकिचाहट नहीं हुई होगी। जैसा आज सुपारी किलर को नहीं होती।

सोचता हूं क्या गांधी को पता नहीं था? गांधी अपने खिलाफ चलाए जा रहे घृणा अभियान से वाकिफ नहीं थे। क्यों नहीं समझ रहे थे कि उनकी हत्या की जा सकती है।

हत्या के पहले चार बार हमले हो चुके थे।यह पांचवा हमला था। गांधी अनजान नहीं रहे होंगे। लेकिन वह हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे भयानक नरसंहार के दौर में शांति कायम करने के लिए इतना व्यस्त थे। इतना अंदर से दुखी और पीड़ित थे। की खुद की चिंता शायद न रही हो।

नरसंहार और पीड़ितों की कराह उनके कानों में गूंज रही थी। अपने बारे में सोच ही नहीं सकते थे। आत्मरक्षा के विचार से मुक्त थे। बिहार दिल्ली और लाहौर से आने वाली खबरों से वह हिल गए थे। इसलिए नोआ खाली से खाली होते ही बिहार आए और वहां से दिल्ली पहुंच गए। वे पाकिस्तान जाना चाहते थे। शांति के लिए, भाईचारा का संदेश देने के लिए।

उस समय दिल्ली में नफरत का कारोबार चल रहा था। लगता था पूरा उपमहाद्वीप वहशी हिंसक और खूनी हो गया है। चारों तरफ लाश की बदबू आ रही थी दुर्गंध आ रही थी। दिल्ली पहुंच कर सरकार को अल्टीमेटम देते हुए वह आत्म शुद्धि के लिए अनशन पर बैठे गये।

हत्यारे गिरोह को यह नागवार गुजरा। गांधी का प्रयास उनके अघोषित प्रोजेक्ट के खिलाफ जा रहा था। उनकी योजना को ध्वस्त कर रहा था। “आपदा में अवसर” के उनके सिद्धांत के खिलाफ था। इसलिए उन्होंने गांधी के नश्वर शरीर को खत्म कर दिया। लेकिन गांधी के मरते ही भारत- पाक में मायूसी और दुख भरी शांति छा गई ।चारों तरफ दुख आत्मग्लानि का मंजर दिखाई देने लगा और हत्यारों के मंसूबे नाकामयाब हो गए।

आज गांधी के 159 वीं जयंती पर मैं सोचता हूं कि गांधी को मैं कैसे श्रद्धांजलि दूं? कैसे अपनी आस्था उनके प्रति व्यक्त करूं? 

क्योंकि आज का दौर उनका नहीं है। उनके हत्यारों का है ।यह पूंजी की सभ्यता का क्रूरतम दौर है। जब हत्यारे स्वयं श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हमने पाकिस्तान में मुर्तुजा भुट्टो के हत्या के संदिग्ध मुजरिम जरदारी को मुर्तुजा भुट्टो को श्रद्धांजलि अर्पित करते देखा था। शोक प्रकट करते हुए देखा था।

आज हम उसी पाकिस्तान से यह क्रूरता सीख रहे हैं। इसलिए आज गांधी के हत्यारों के वंशज भी उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे होंगे। उनके सामने अपने सर झुका रहे होंगे। उनके अंर्तमन में गोडसे होगा और वे इतने क्रूर और धूर्तता हो गए की जुबां पर गांधी का नाम ले रहे होंगे।शायद गांधी की समाधिस्थल राजघाट भी जायें।

गांधी अभी तक जिंदा रहे होते तो बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूर्ति रखने पर क्या प्रतिक्रिया देते। 6 दिसंबर 1992 को जब प्रायोजित उन्मादी भीड़ बाबरी मस्जिद को ढहा रही थी तो गांधी जिंदा होते तो उस दिन उनके मुंह से कौन सा शब्द निकलता।

यही नहीं फरवरी 2002 में अगर वह जिंदा होते तो अपने जन्म स्थान में हो रहे मानव नरसंहार को देखकर कौन सा कदम उठाते।क्या करते?

क्या वे धुआं आग खून जलते टायरों तलवार बरछी भाले त्रिशूल बम पेट्रोल और गैस सिलेंडरों के हो रहे विस्फोट के बीच साबरमती आश्रम में पड़े रहते या क्या करते?  स्वयं को नफरत की आग में जला लिए होते या प्राण त्याग देने का संकल्प लेते।

वह आज के 135 करोड़ भारतीयों की तरह मौन हो जाते ।चुप रहने की धूर्तता भरी मध्यवर्गीय चालाकी ओढ़ लेते या इस तूफान के बीच स्वयं को खड़ा पाते।

लेकिन मैं इतना जानता हूं 135 करोड़ भारतीयों में वह अकेला होता जो इन जगहों पर जाकर अपना 32 इंच का सीना खोल कर खड़ा हो जाता। उसे 56 इंच के सीने की जरूरत नहीं होती। 

मैं जानता हूं कि वह होता तो आज नफरत के सौदागरों और खून व्यापारियों का सबसे आगे जाकर प्रतिवाद करता। कायरों की तरह से अपनी आत्मरक्षा का शातिराना तर्क नहीं गढ़ता। वह भारत में सत्ता प्रायोजित सुपारी किलिंग की पूरी घटना का अकेले प्रतिवाद होता, प्रतिलोम होता, प्रतिकार होता और अंत में उसका निषेध करता। अपने उन्हीं अहिंसा सत्य और निडरता के हथियारों से।

इसलिए 2 अक्टूबर गांधी जयंती के दिन मैं बीसवीं सदी के श्रेष्ठतम नायकों में से एक नायक‌ शहीद गांधी के समक्ष नत सिर हूं, लज्जित हूं और उसके रास्ते पर न चल पाने की अपनी असमर्थता के कारण आत्म पीड़ित हूं। इसलिए भारी मन से उसे याद कर रहा हूं।

(जयप्रकाश नारायण सीपीआई (एमएल) उत्तर प्रदेश की कोर कमेटी के सदस्य हैं।)

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