Saturday, October 16, 2021

Add News

अपनी कुदरती खूबसूरती के लिए मशहूर उत्तराखंड में जारी हैं कई नायाब प्रयोग

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

यह लेख उन लोगों को मदद कर सके जो इस वक्त देश के हालातों से विचलित हैं, उन्हें कोई राह नहीं सूझ रही। विपक्ष हीनता, विकल्प हीनता और तेजी से बढ़ते मोब के लिंचर में बदलते देश ने उन्हें सोचने समझने से बेजार कर दिया है। स्थापित लोकतान्त्रिक बहसों, प्रतिवाद, धरना प्रदर्शन से होने वाले जनदबाव का कोई असर नहीं दिखता। भयंकर मैंडेट और पहले से कहीं अधिक वोट प्रतिशत से आई बीजेपी-आरएसएस की इस जीत ने जैसे विपक्ष को वाकई में इस बार लक्ष्मण की तरह मूर्छित ही नहीं कर दिया है बल्कि पूरी प्राणवायु ही निकाल दी है। आज के हालात में बीजेपी ही पक्ष और विपक्ष है। सबसे बुरी हालत बुद्दिजीवी समाज की है।

क्योंकि वास्तव में अगर देखा जाए तो तन-मन-धन और आत्मा से सबसे अधिक सचेत विरोध अगर किसी ने किया था तो वह यही शिक्षक, लेखक, छात्र तबका था जिसे इस बात से बेहद तकलीफ थी कि हम तो एक लिबरल माहौल में थे, देश के हालात जैसे भी थे, वे ठीक तो नहीं ही थे, लेकिन हमारे बोलने लिखने सोचने पर आजादी थी, कोई हमें लिबटार्ड, सेखुलर, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, पाकिस्तानी जैसे बमबारी करते शब्द से नवाजता नहीं था, आज अपने ही देश में एक जहर बोया जा रहा है हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान, बंगलादेशी, रोहिंग्या के नाम पर और देश की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, लेबर लॉ, संवैधानिक संस्थाओं की पवित्रता, संविधान सभी को इसी बीच curtail करने से लेकर कुचलने और बदलने तक का कुचक्र चल रहा है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे दिखते हैं।

हमारे विरोध का कोई असर नहीं दिखता। जनता महंगाई, बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, भूख से मौत, अस्पतालों कि दयनीय हालत से सैकड़ों बच्चों की असमय मौतों, नोटबंदी और GST किसी से भी विचलित न होकर भक्ति भाव से और प्रचंड बहुमत उसी दल को दे चुकी है,जिसने ये सब जुल्म अत्याचार उस पर किये। तमाम तरह की समझ और सुझावों के बीच एक बात स्पष्ट दिखती है कि विपक्ष के पास कोई भी वैकल्पिक योजना नहीं थी, और न अब है। न उसके पास कोई वैकल्पिक आर्थिक विज़न है और सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर तो उसके पास पूरी तरह शून्यता है। हिन्दू राष्ट्रवाद के जिस घोल को पिछले कई दशकों से आरएसएस और उसके संगठनों ने समाज के विभिन्न हिस्सों में लगातार प्रचारित प्रवाहित किया, उसे सिर्फ नजरअंदाज किया गया पार्टियों द्वारा लेकिन व्यक्तिगत जीवन में कहीं न कहीं उन्हीं पिछड़े विचारों को पोषित किया।

इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कितनी आसानी से कांग्रेस, सपा, बसपा, बीजद, तृणमूल से टूट टूट कर बीजेपी को वटवृक्ष बनाने में इन दलों की महती भूमिका इस दौरान रही। और तो और बंगाल में हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण में तीन दशक से बंगाल में शासन करने वाले वाम दलों में से भी हिन्दू बचाने वाले कार्यकर्ता समर्थक और यहां तक कि विधायक निकले और पार्टी को भुई लुंठित कर चलते बने, लगा ही नहीं कि वाम विचार और दक्षिण विचार जैसा कुछ था इन तीन दशकों में। व्यवस्था एक संकट से निपटने के लिए नए संकट को जन्म देती है, समाधान समाज को ही निकालना होगा। अपनी पहाड़ यात्रा के दौरान दिल्ली के मित्र जगमोहन मलकोटी से पता चला कि हल्द्वानी में उत्तराखंड से जुड़े कुछ मित्र इकट्ठा हो रहे हैं और हल्द्वानी से ऊपर रामगढ़ के फल पट्टी पर कुछ नए प्रयोग किये गए हैं, उन सभी से मिलना और समझना अच्छा रहेगा।

हल्द्वानी में बैठक में पहाड़ से जुड़े पत्रकार, बुद्धिजीवी समाज का एक हिस्सा और दिल्ली, शाहाबाद हरियाणा से पहाड़ से जुड़े सदस्य और जैविक खेती के व्यावसायिक स्वरुप पर काम कर रहे स्थानीय युवा मौजूद थे। बातचीत बेहद अनजाने और अधिकतर लोगों के लिए पहली बार मिल रहे लोगों के बीच हो रही थी, जिन्होंने कभी एक दूसरे से पूर्व मुलाकात नहीं की थी। यह भी एक तरह से सोशल मीडिया के बेहतर उपयोग की सम्भावनाओं को बताता है। पहाड़ का पानी, जवानी और मनी सभी वहां के काम क्यों नहीं आ रही है, से शुरुआत करते हुए उत्तराखंड राज्य के बनते ही पलायन कि दुगुनी रफ़्तार पर चिंता करते हुए बात का सिरा इसी पॉजिटिव नोट से खत्म हुआ कि हमें ही इस ट्रेंड को बदलना होगा। सरकार के एजेंडा में पहाड़ के विनाश के सिवाय कुछ हो नहीं सकता।

पहाड़ से सरोकार को मजबूती से खड़ा करने के लिए, पहाड़ के अंदर ही रोजगार, खेती और बागवानी को प्रोत्साहन, खाद्य प्रसंस्करण से लेकर बैंक और क्रेडिट सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए संघर्ष करना और पहाड़ के उत्पाद की सप्लाई चैन को दिल्ली तक पहुंचाने के सवाल पर एक आम सहमति बनी। अगले दिन हम उस कर्मभूमि को देखने के लिए निकले जिसकी बुनियाद पर यह बैठक का आयोजन हुआ था।

भवाली मुक्तेश्वर रोड पर मुक्तेश्वर से 6 किलोमीटर पूर्व बाईं और यह घाटी और इसके तीन गांवों में वह प्रयोग हुए जो सफलता और असफलता के बीच सिर्फ कुछ लोगों की इच्छाशक्ति और लगन का नतीजा साबित हुई। रामगढ़ मुक्तेश्वर वैसे भी फल पट्टी के रूप में मशहूर है। लेकिन पिछले दशक से जलवायु परिवर्तन और इस पूरे इलाके में भू माफियाओं द्वारा लगातार जमीन की खरीद फरोख्त, होटल, रिसोर्ट और विला बनाकर बेचने की बाढ़ सी आ गई है। नतीजा जल के स्रोतों पर होटल और रिसोर्ट ने ऐन केन प्रकारेण कब्ज़ा कर ही लिया। उसके खिलाफ संघर्ष भी स्थानीय लोगों ने लगातार किये लेकिन सबको पता है, विकास की इस अंधी दौड़ में ग्रामीण आबादी की जरूरतों के बारे में सत्ता क्या सोचती है।

नतीजा यह हुआ कि परम्परागत जल स्रोतों के समाप्त होते ही बेल्ट में बागवानी को बचाने का संकट पैदा हो गया। ऐसे में स्थानीय जनता के बीच लोकप्रिय समाजसेवी बच्ची सिंह बिष्ट और उनके बचपन के साथियों महेश और महेश गलिया ने पहले से स्थापित (1992) जनमैत्री संगठन के जरिये जो गल्ला से लेकर पाटा गांव तक वहां के सवालों पर समय समय पर मुखर रहा था, ने जल संचय और संवर्धन की मुहिम जन जन तक चलाने का निश्चय किया। इसी बीच राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन नामक NGO की जल संचय मुहिम का हिस्सा बनकर इस इलाके में वर्षा ऋतु में असमय नौले और गदेरे में बह जाने वाले पानी को बचाने का विचार गांवों के खेतों में ही जगह जगह गड्ढे बनाकर बचाने का विचार आया। लेकिन समस्या थी कि इन गड्ढों में पानी को लम्बे समय तक बिना कंक्रीट की दीवार बनाकर रोका कैसे जाए?

NGO के पास जल संचय का एक सीमित कोष था और उस कोष से पर्याप्त पानी की जरुरत को पूरा करना नाकाफी था। ऐसे में जन मैत्री संगठन ने एक अभिनव प्रयोग की ठानी। इन 8-10000 लीटर के गड्ढों को सीमेंट और गारे से बनाने की बजाय इसे परम्परागत मिट्टी से लीपकर प्लास्टिक की शीट बिछाकर पानी को बचाए रखने के आईडिया को लागू करने की सोची गई। सरकारी सहयोग भी गांवों को इसके लिए मिलता है, लेकिन उनके नियम और गड्ढों के आकार और उसे अनुमति देने और प्रधान पटवारी तहसील के परम्परागत चक्करों से जो जल संचय के सरकारी कार्यक्रम होते हैं, वे कभी भी खानापूर्ति और अपनी अपनी जेब भरने से आगे नहीं जाते। बिना स्थानीय जन और जन जागरण की मुहिम के कभी भी कोई योजना साकार नहीं होती। इन तीनों गावों के जल संकट से यहां के स्थानीय लोग परेशान थे ही, जन मैत्री की इस मुहिम में इन तीन गावों के मित्रों की सामूहिक मुहिम ने साल भर मीटिंग कर लोगों को इसके महत्व के बारे में और NGO से प्लास्टिक शीट मुहैया कराने की जिद के आगे राजी कर ही लिया।

इस मुहिम में सबसे बढ़कर साथ दिया परम्परागत रूप से पहाड़ की आत्मा से जुड़ी महिला सदस्यों ने और उन्होंने इसे अपना मिशन बना लिया। देखते ही देखते तीनों गांवों में साल भर में कुल 350 गड्ढे सीढ़ीनुमा खेतों में अलग अलग जगह बन गए। जिसमें 8-10000 लीटर पानी को संरक्षित किया जा सकता था। ग्रामीण तकनीकी से गड्ढों की लिपाई-पुताई का 3-4 बार काम किया गया, और 2 mm की प्लास्टिक शीट को बिछाकर पानी को उन गड्ढों में भरने का काम शुरू हुआ। इसके बाद तो वर्षा जल के अलावा नौले और नल से अतिरिक्त पानी के संचय के काम को भी इन जलाशयों में भरने के लिए लम्बी लम्बी पाइप लगाकर किया गया। सामूहिकता की इस मुहिम में जहां सबके अलग अलग खेत हों, और बिना चकबंदी के सभी के खेत गांव के अलग अलग जगह बंटे हों, बिना सामूहिक प्रयास और सांझे हितों में ही अपने हित ने हर गड्ढे को लबालब भरने में मदद ही की। नतीजा वहां पर बात करते हुए स्पष्ट दिखता है। एक किसान से बात करते हुए पता चला कि जो मटर के एक पौध में पहले 4 से 10 दाने ही बिना समुचित सिंचाई के मिलते थे, अब उसी पौध से आधे से लेकर एक किलो तक मटर की फली का पैदावार सुनिश्चित हो रहा है। सेव, खुबानी, नाशपाती और आड़ू की पैदावार भी दुगुनी तिगुनी हुई है।

इससे उत्साहित होकर जन मैत्री संगठन के संस्थापक सदस्य महेश गलिया जी जिनका अनुभव सेव की विभिन्न प्रजातियों के बारे में जानने और समझने का रहा है, ने नर्सरी के जरिये सैकड़ों किस्म के सेव के किस्मों में से कम ऊंचाई के पहाड़ों में कम शीत ऋतु में भी बेहतर सेव की वैरायटी वाले पौध का रोपड़ इस इलाके में करना सम्भव बनाया और उसे अन्य लोगों की जानकारी में भी लाया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि दो तीन साल में ही फल देने वाले छोटे-छोटे सेव के पेड़ों की वैरायटी इस फल पट्टी में दिखाई देने लगी है, जिसके शुभ परिणाम जल्द ही दिखने लगेंगे। अभी यह शुरुआत है, एक छोटी शुरुआत। यह शुरुआत है सामूहिकता की। सामूहिक हित और भाईचारे की। इस भाईचारे और पहाड़ की महिला के जल जंगल और जमीन से जुड़ने की। इस मुहिम के साथ ही स्थानीय जंगल के स्रोतों को बचाने, संवर्धन की मुहिम भी चलाई जा रही है, जिसके सुखद परिणाम भी आने लगे हैं। वो कहावत है कि संघ में ही शक्ति है। यह संघ बना है जाति, सम्प्रदाय, भेद भाव के विपरीत स्थानीय जल जंगल जमीन और पारिस्थितिकी असुंतलन को समाप्त कर प्राकृतिक संसाधनों के सकारात्मक उपयोग को अधिक से अधिक बढ़ाने की सोच से।

इस असुंतलन को बिगाड़ने वाले बाहरी तत्वों की विनाशकारी भूमिका से असहज, असुन्तलित और पहाड़ों से पलायन में ही एकमात्र रामबाणी इलाज को रोकने के लिए। आधुनिकतम तकनीक को इसी सामूहिक दायित्व बोध से जोड़ने के लिए। अभी यह शुरुआत है, अभी इसमें महती प्रयोग की प्रचुर सम्भावना है। लेकिन इसकी आंतरिक शक्ति ग्रामीण समुदाय के सामूहिक हित से अभिन्न रूप से जुड़ी है, जिसे जातीय, नस्ल भेद, पूंजीवादी व्यक्तिगत लाभ हित और खाद, बीज और कीटनाशक कम्पनियों के हितों, मंडी के वणिक समुदाय के एकाधिकार, किसानों के फसल के उचित दाम और फलों सब्जियों के अधिक समय तक संरक्षण और बेहतर दामों की गारंटी जैसे अनेक संकटों से निपटना बाकी है। एक शुरुआत हुई है, जैसे किसी पौधे को किसी नवजात को सहेज कर बड़ा किया जाता है ठीक उसी तरह इस नवजात प्रयोग को बचाने बढ़ाने और उसके संवर्धन की जरुरत है। यह मुहिम एक जगह पर शुरू हुई है, आशा है यह विभिन्न अंचलों को प्रेरणा देगी और ऐसे सैकड़ों प्रयोग भारत के विभिन्न हिस्सों में होंगे, एक दूसरे को मदद करेंगे। शहरों में पलायित लोग भी अपनी सकारात्मक सोच को ही लाकर इसमें नई जान फूकेंगे।

(पहाड़ की मूल पृष्ठभूमि से जुड़े रविंद्र सिंह पटवाल का यह लेख उनकी हाल की अभी पहाड़ की यात्रा से संबंधित है।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

1 COMMENT

Latest News

पैंडोरा पेपर्स: ओसवाल की बीवीआई फर्म ने इंडोनेशिया की खदान से कोयला बेचा

पैंडोरा पेपर्स के खुलासे से पता चला है कि कैसे व्यक्ति और व्यवसाय घर पर कानून में खामियों और...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.