Subscribe for notification

प्राचीन भारत का नया भविष्य!

पिछले छह सालों में जबकि साबित किया जा चुका है कि आधुनिक पढ़ाई लिखाई और उच्च शिक्षा का तर्कशीलता, बुद्धि, विवेक और इंसानियत से कोई सीधा संबंध नहीं है तो हमें इस बात पर सहज गंभीरता से विचार करना चाहिए कि इस पर ज़्यादा ख़र्च किया ही क्यों जाए? मुझे खुशी है कि पिछले छह-सात सालों के अथक अबौद्धिक और सस्ते टिकाऊ शोध ने जो नतीजा निकाला है उस पर सरकार ने अमल भी शुरू कर दिया है। अच्छे दिन, कालाधन, नोटबंदी, लोकतंत्र और विकास जैसे अचूक प्रयोगों ने उसकी इस धारणा को पुख़्ता किया है कि भेड़ों को हाँकने के लिये चरवाहे को डंडे की ज़रूरत होती है ज्ञान की नहीं। शिक्षा महंगी होने से आम लोग इसके प्रति हतोत्साहित होंगे और बचपन से ही अपने पिछले जन्म के कर्मों के मुताबिक नियति को स्वीकार करने को प्रेरित होंगे। मैं तो हमेशा से मानता रहा हूं कि शिक्षा हम जैसे साधारण लोगों को डरा कर आक्रामक बनाती है।

वो हर वक़्त खुद नियम और क़ायदे क़ानून के फेर में उलझे रहते हैं और दूसरों की भी टाँग खींचते रहते हैं। बुद्धिजीवी बन कर हर बात पर सवाल उठाते हैं और ज़रूरत से ज़्यादा दिमाग़ लगाते हैं। उन्हें इस दैवीय सत्य का भी भरोसा नहीं होता कि हमारी सभ्यता और संस्कृति का पहिया पुरानी लीक पर चलाने को देवराज इन्द्र साक्षात नर रूप में अवतरित हुए हैं। इसलिए शिक्षा के मौलिक अधिकार को मौलिक शिक्षा के अधिकार में बदला जाना चाहिये। पढ़े लिखे होने का ही ये नतीजा है कि भारत को महा भारत बनाने के संकल्प से जब सरकार द्रोणाचार्य के कंधे का सहारा लेकर ईवीएम पर अँगूठा मांगती है तो तमाम एकलव्य सड़कों पर कूदने लगते हैं। महिलाएं शबरी और अहिल्या को भूल कर सबरी की माला जपने लगती हैं। गुरु वशिष्ठ ने कलियुग में आकर बौद्धिक गणित करना न शुरू किया होता तो आज के राम लला राज में सड़क पर पड़ी उनकी पार्थिव देह का बेहद सम्मानजनक अंतिम संस्कार हो सकता था।

मेरी नज़र में आर्थिक नज़रिये से कमज़ोर सामाजिक तबके के लिये शिक्षा होनी ही नहीं चाहिए क्योंकि ग़रीबों के लिये ज्ञान अभिशाप की तरह है जो उन्हें संतुष्टि जैसे अमूल्य खज़ाने से वंचित रखता है। साधारण तबके के लिये निजी गुरुकुलों का निर्माण होना ही चाहिए जहां आम लोगों को देश की रक्षा के लिये मल्ल युद्ध, गदा युद्ध और तीरंदाज़ी जैसी कलाएं सिखाई जा सकें। शाप की तीव्रता बढ़ाने और मॉब लिंचिंग के मद में महाभारत का चक्रव्यूह बनाने जैसे शोधकार्यों को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भविष्य के प्राचीन भारत में फिर से तर्कशास्त्र का जवाब बाणशास्त्र और अर्थशास्त्र का जवाब कुटिल शास्त्र से देने की शुरुआत की जाए।

हमारा एक ही नारा होना चाहिए, ‘लड़ेगा हिंदुस्तान तभी तो बढ़ेगा हिंदुस्तान’। हमें लोगों को पुरातन अस्त्र शस्त्र और कुतर्कों से सुसज्जित करके लाम पर भेजना होगा। जब हमारे देश की प्राचीन सीमाएँ सुरक्षित हो जाएंगी तभी तो हम आपस में परंपरागत तरह से लड़ सकेंगे। सच कहूँ तो मुझे भी अब लगने लगा है कि इतिहास खुद को दोहराता है। उम्मीद है कि कम से कम मेरा ये तर्क विपक्षी बुद्धिजीवियों के गले उतरेगा क्योंकि पटेल की तरह ये भी मैंने उन्हीं के वैचारिक खेमे से चुराया है।

हम पिछले छह सालों में ये भी साबित कर चुके हैं कि दुनिया जिसे विज्ञान का नाम देकर लोगों को भ्रमित कर रही है, वो हमारे ही देश का प्राचीन ज्ञान है। यानी हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों के ज्ञान को धूमिल करने के लिये षड्यंत्र के तहत विज्ञान को खड़ा किया गया है। विज्ञान एक जटिल विषय होने के कारण समझ में भी नहीं आता और साथ ही हम में दूसरे तथाकथित विकसित देशों से कमतरी का अहसास भी कराता है। हमें इस भावना को मिटाने के लिये अपने जीवन से विज्ञान को हटाना होगा और राजनीति जैसी कला को समझने की कला विकसित करनी होगी। जिस दिन हम सब देशवासी अपने पुरातन ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ मान लेंगे उस दिन हम स्वयं विश्वगुरु बन जाएंगे।

हमें खुद को जल्द से जल्द सबसे तेज़ विकसित देश घोषित कर अपने ऊपर से बौद्धिकता के आडंबर का आवरण हटा लेना चाहिए क्योंकि इससे भौतिकता का बोध होता है। हम तो ठहरे सांसारिक मोह माया से परे लोग जिनके लिये अपने साधु संन्यासियों का कारोबारी महात्म्य ही अध्यात्म का साकार रूप है। विज्ञान ने तर्कबुद्धि नाम के दानव के बल पर हमारी जिन परम्पराओं को मृतप्राय कर दिया है उन्हें पुनः जीवंत किया जाना चाहिए ताकि पुरातन सभ्यता और संस्कृति की रक्षा हो सके। सरकार ने चंद्रदेव को भेजे अपने रॉकेटनुमा संदेश से पहले नारियल फोड़ कर इसका अहसास करा भी दिया है कि वो इसके लिये कितनी गंभीर है।

पिछले छह सालों में ये भी निश्चित रूप से महसूस किया गया है कि देवताओं की दूर से ही मन की बात जान लेने या देखने यानी ‘अंतर्नेत्र’ की कला को ही आज विज्ञान के समर्थकों ने ‘इंटरनेट’ के नाम से फैला दिया है। नारद मुनि ने ही अपनी मायावी शक्ति से मोबाइल में परकाया प्रवेश किया है और आज उनकी आभासी पहुँच जन धन तक है। हमारे इस प्राचीन मौलिक ज्ञान का लाभ उठाते हुए सरकार ने भी अश्वत्थामा हतो हतः जैसे छल मंत्र की तर्ज़ पर पुरातन और सनातन शिक्षा के कई आभासी विश्वविद्यालय खड़े किये हैं जो हमें ये आभास कराने में सफल रहे हैं कि हम विकास की उस ऊंचाई को फिर से छूने वाले हैं जहां डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ होंगी और दूध की नदियाँ बहती होंगी।

हम एक बार इस दृश्य की मरीचिका में खो जाते हैं तो फिर स्वप्न से बाहर निकलने का दिल नहीं करता। हमें इस आभास का भी अहसास हुआ कि प्राचीन भारत की तरह उच्च शिक्षा पाने का अधिकार भी केवल धनकुमारों और धनकुमारियों को ही होना चाहिए। वैसे भी प्राचीन भारत में आम लोगों के लिए ऐसी शिक्षा और डिग्रियों का क्या काम? इससे तो केवल सर्टिफाइड निकम्मों की संख्या ही बढ़ती है।

हाल फिलहाल मौलिक शिक्षा प्राप्त जन प्रतिनिधियों ने आम जनों में आधुनिक शिक्षा की निरर्थकता को स्वीकारते हुए जिस तरह खुद प्राचीन ज्ञान को बाँटने का बीड़ा उठाया हुआ है वो प्रशंसनीय है। इससे लोगों को काफी लाभ हुआ है। चिकित्सा के पुरातन आयामों के खुलासे ने योग और भोग के संतुलन को प्रेरित करने के अलावा फेफड़ों के ज़रिए हवा साफ़ कर रहे लोगों को राहत की सांस दी है। महानुभावों और आभासी विश्वविद्यालयों के सामूहिक प्रयासों से धीरे धीरे आम लोगों के लिये बड़े विश्वविद्यालयों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी और बहुसंख्यक देशवासी ज्ञान के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएंगे।

हमारी इस कामयाबी से जल कर दुनिया हम पर भले ही हँसे लेकिन हमें अपना दावा न छोड़ते हुए विश्वगुरु की तरह धीर गंभीर बने रहना है। याद है ना वो प्राचीन घटना जब देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान विष भी निकला था। पुरातन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच इस भविष्य मंथन से भी जो विष निकलेगा उसे आने वाली पीढ़ियाँ ज़िंदा रहीं तो आपस में बाँट ही लेंगी। हम रहें न रहें हमारा देश हमेशा प्राचीन बने रहना चाहिए। प्राचीन बन कर ही हम चीन से बड़े हो सकेंगे। जय हिंद।

(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

Share