Wednesday, May 18, 2022

जीरो माइल पटनाः बदलते शहर में समाज और विकास

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शहरों पर किताबें पहले भी लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं और आगे भी लिखी जायेंगी। कुछ किताबें शहरों का इतिहास बताती हैं, कुछ समाजशास्त्र और कुछ खास घटनाओं के उल्लेख के जरिये शहर की कहानी कहती हैं। लेकिन कवि-लेखक और पत्रकार संजय कुंदन की नयी किताब: जीरो माइल पटना (वाम प्रकाशन, 2254/2ए, शादी खामपुर, न्यू रंजीत नगर, नयी दिल्ली: 110008) एक पुराने-मशहूर शहर को बिल्कुल अलग अंदाज में पेश करती है।

इसमें शहर अपनी पूरी खासियत, खूबसूरती, ठहराव और बदलाव के अलग-अलग रूपों के साथ स्वयं एक जीते-जागते चरित्र की तरह उभरता है। किताब के बारे में उसके फ्लैप की यह टिप्पणी बिल्कुल सही है: ‘यह न तो शहर का इतिहास है, न संस्मरण, न ही समाजशास्त्रीय विवेचन, लेकिन इसमें तीनों की ताकत और रोचकता समाहित है। जीरो माइल पटना उस शहर को लिखा एक प्रेम पत्र है- और हर प्रेम पत्र की तरह इसमें प्यार भी है, शिकायत भी, दुलार भी है, अनबन भी।’

अच्छी बात है, वाम प्रकाशन ने शहरों पर ‘जीरो माइल’ शीर्षक से श्रृंखला शुरू करने का फैसला किया है। संजय कुंदन की किताब इस श्रृंखला की पहली किताब है। जीरो माइल पटना तीन उपखंडों में फैली छोटी-छोटी दिलकश टिप्पणियों का रोचक संकलन है। उपखंडों के शीर्षक भी दिलचस्प हैं और उत्सुकता जगाते हैं: खल्ली-सिलेट, आवारा अफलातून और सवालों का ब्लैकहोल। कुल 148 पृष्ठों की यह किताब शहर की बदलती सामाजिकता को बहुत मामूली दिखते प्रसंगों और दृष्टांतों के जरिये सामने लाती है। ‘भोज और कुकुरभोज’, ‘समेट दिये गये पर्दे’ और ‘फास्टफूड का डर’ शीर्षक कई छोटी-छोटी टिप्पणियों में बदलते शहर और उसकी सामाजिकता को दर्ज करने की अच्छी कोशिश की गई है। ‘लव इन पटना’, ‘फास्ट फूड का डर’, ‘किताबों का जुनून’ और ‘पानी-पानी होता शहर’ जैसी छोटी-छोटी टिप्पणियां शहर के सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप और बनावट को बहुत खूबसरत ढंग से पेश करती हैं।

संजय ने पटना के मशहूर गांधी मैदान पर भी एक टिप्पणी लिखी है। वह गांधी मैदान को पटना का आँगन कहते हैं। इसके लिए बहुत सारे दृष्टांत और साक्ष्य पेश करते हैं। इनमें ज्यादातर को मैंने भी गांधी मैदान में टहलते हुए देखा है। सचमुच, वह शहर में डेमोक्रेसी का एक विशाल आँगन या अंग्रेजी लहजे में कहें तो शहर के विशाल डेमोक्रेसी स्क्वायर के रूप में उभरता है। हमारे शासक और हुक्मरान आज जिस तरह भारतीय समाज को ‘आधुनिक’ बनाने के नाम पर कुंद करने पर तुले हैं, उसमें कोई नहीं जानता कि गांधी मैदान जैसे सोशल डेमोक्रेसी के ऐसे विशाल आँगन कितने समय तक और बचे रहेंगे?

दिल्ली के ‘आधुनिकीकरण’ और कथित हिन्दुत्वा स्थापत्य शैली में भवनों के नवनिर्माण की मौजूदा लहर में न जाने कितनी सारी खूबसूरत जगहें गायब हो रही हैं। कुछ ही समय बाद राजपथ और विजयचौक के आसपास की जगहों के निशान भी नहीं मिलेंगे। कई जगहें पहले ही गायब हो चुकी हैं। नयी पीढ़ी को तो अंदाज भी नहीं होगा कि कुछ ही दशक पहले दिल्ली के राजपथ और जनपथ की एक खास क्रॉसिंग के विशाल दायरे– बोटक्लब के पास देश भर से आने वाले लोगों का मशहूर ‘प्रतिरोध स्थल’ हुआ करता था। उस तरह का प्रतिरोध स्थल अब दिल्ली के पास नहीं है। पटना का गांधी मैदान सिर्फ रैली स्थल या सुबह-शाम का सैर-स्थल  ही नहीं, वह शहर का वास्तविक डेमोक्रेसी स्क्वायर है।

दशकों से वह डेमोक्रेसी की अलग-अलग किस्मों की जमीन मजबूत करने वाले आम और खास लोगों को जगह देता आ रहा है। मैंने इस मैदान में जयप्रकाश नारायण को अपनी खास शैली में हजारों के हुजूम को संबोधित करते देखा तो दशकों के भूमिगत जीवन से पहली बार बाहर आए नक्सली आंदोलन के बड़े दिग्गज नागभूषण पटनायक को धाराप्रवाह अंग्रेजी में बेहद काव्यात्मक भाषण करते भी सुना। मध्य बिहार के खेत-खलिहानों से आये बेहद गरीब खेतिहर मजदूरों और उत्पीड़ित समुदाय के अन्य लोगों के बीच उनके अंग्रेजी भाषण को दिल्ली से आया एक दुबला-पतला युवक उसी काव्यात्मक अंदाज में हिन्दी में पेश करता जाता था।

गांधी मैदान सिर्फ उन लोगों को ही मंच नहीं देता, जो अपने राजनीतिक-बौद्धिक विमर्श को जनता के बीच ले जाने की कोशिश करते रहते हैं। दुख और खुशी, विषाद और प्रेम की नितांत व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को भी यह मैदान भरोसेमंद जगह देता है। मुझे बरसों पहले की एक घटना याद आ रही है। उन दिनों मै देश के एक प्रमुख हिन्दी अखबार के बिहार संस्करण में संवाददाता था और पटना में रहता था। एक मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की युवा बहू रोज-रोज के झगड़ों से परेशान होकर एक दिन सुबह-सुबह घर से निकल गयी।

घरेलू महिला थी और उसका मायका किसी अन्य शहर में था। पटना से बहुत ज्यादा वाकिफ़ नहीं थी। उसकी काफ़ी खोज की गयी। वह मोबाइल फोन का जमाना नहीं था। परिवार आनन-फानन में पुलिस रिपोर्ट लिखाने से भी बचना चाहता था। पर लोगों को डर लग रहा था कि वह कहीं कुछ कर न बैठे! शहर का कोना-कोना छान डाला गया। परिवार और नजदीकी लोगों की अलग-अलग टीमें स्कूटरों से चक्कर लगाती रहीं। वह महिला दोपहर-बाद गांधी मैदान में मिली। गांधी मैदान को उसने अपने विरोध और शांति का मनपसंद स्थल पाया था।

संजय इस किताब में पटना की पहचान एक बड़े देहात के तौर पर कराते हैं। वह हिन्दी के सुपरिचित कवि अरुण कमल को उद्धृत करते हुए सन् 1987-88 के दौर के शहर की छवि पेश करते हैं। तब हमारा समाज मोबाइल-विहीन था। लोग किसी के घर कभी भी जा सकते थे। परिचितों के घर बैठकर चाय पीते हुए बतिया सकते थे। आज की तरह पहले से न वक्त लेना पड़ता था और न किसी मित्र या परिचित के यहां जाने के लिए उसकी सुविधा-असुविधा का ध्यान दिया जाता था। जब मन हुआ, चल पड़े।

उत्तर के हिन्दी भाषी राज्यों के ज्यादातर पुराने शहरों की तरह पटना बिल्कुल ऐसा ही था। लेकिन ऐसी बेफिक्री दिल्ली जैसे महानगर में तब भी नहीं थी। मुंबई में तो बिल्कुल ही नहीं। सन् 1992-95 के बाद महानगर और भी बदले। आर्थिक सुधारों की आंधी में जो कुछ बचा-खुचा था, वह भी बदल गया। रोजी-रोटी के लिए पटना से दिल्ली आ चुके कवि-पत्रकार संजय कुंदन को यह दिल्ली पसंद नहीं आयी। उनका पटना उन्हें बुलाता रहा। उन्होंने सोचा, क्यों न फिर पटना लौट चलें! लेकिन पटना के उनके दोस्तों और सीनियर्स ने बताया कि उनका वह पटना भी अब तेजी से बदल रहा है। वह पटना अब नहीं रहा, जिसमें वह रचे-बसे थे।

किताब के विभिन्न अध्यायों में संजय ने सन् 1975-95 के बीच के पटना को बहुत शिद्दत से याद किया है। अपने वर्णन में वह कहीं-कहीं नॉस्टेल्जिक भी नजर आते हैं। पर वह बदलाव के सच को समझने की कोशिश भी करते हैं। इसलिए वह पटना जैसे शहरों के रूप और रंग में आये बदलाव के सच को भी उसी शिद्दत से रेखांकित करते हैं। किताब पटना के इतिहास, समाज और उसके नागरिक-शास्त्र को भी बीच-बीच में बताती चलती है। शहर की समस्याओं और बदलती जीवन-शैली के बीच लोगों की मुश्किलों को भी वह सामने रखती है। वर्णन की प्रक्रिया में वे मुश्किलें अपने आप उभरती जाती हैं।

किताब की ‘सुन ल पुकार हे छठी मइया’ शीर्षक टिप्पणी में संजय ने अब पूरे देश में विख्यात हो चुके बिहार की त्योहारी-पहचान वाले पर्व छठ की चर्चा की है। बहुत सुंदर वर्णन है। बिहार में किस तरह छठ की तैयारी काफी पहले शुरू हो जाती है! पटना क्या संपूर्ण बिहार में छठ के मौके पर जैसी सफाई होती है, वह बेमिसाल है। गंगा के घाट हों या किसी तालाब के, उन सबको साफ कर सुंदर बना दिया जाता है। सड़कें, गलियां और चौराहे, हर जगह सफाई होती है। छठ की तैयारी के इस वर्णन से मुझे ख्याल आया कि सालों भर पटना के अधिकतर इलाके गंदगी से भरे रहते हैं।

निजी भवन हों या सरकारी दफ्तर, हर जगह थूक और पान की पीक फैली होती है। कुछ विशिष्ट आवासीय इलाकों को छोड़कर ज्यादातर मोहल्लों की सड़कों और गलियों के इर्दगिर्द हर तरफ कूड़ा और पेशाब की बदबू फैली होती है। आखिर छठ में पटना और पूरे बिहार में इतनी साफ-सफाई रखने वाले लोग साल भर साफ-सफाई के बीच क्यों नहीं रहते? पढ़े-लिखे परिवारों में भी मैंने देखा, अपने घर का कूड़ा अनेक लोग पहली या दूसरी मंजिल से यूं ही नींचे फेक देते हैं। चंद दिनों की सफाई और सालों भर गंदगी के इस अनोखे मनोविज्ञान और ‘नागरिक-शास्त्र’ को कैसे व्याख्यायित किया जाए? किताब में पटना के समाज और नागरिक जीवन के इस अंतर्विरोध को लेकर कोई सवाल नहीं नजर आया।

इसी तरह, जाति-वर्ण के आग्रह-पूर्वाग्रह के अतिशय प्रकोप की भी किताब में कहीं चर्चा नहीं दिखी। पटना के सामाजिक और नागरिक जीवन का यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे बाहर से जाने वाला हर व्यक्ति कदम-कदम पर महसूस करता है। जातिवाद से कमोबेश पूरा देश आक्रांत है। इसकी जड़ें ‘हिन्दू वर्ण-व्यवस्था’ में हैं। उत्तर के हिन्दी भाषी राज्यों में हर जगह यह समस्या बहुत प्रभावी है। लेकिन पटना की सामाजिकता हो या बौद्धिकता, राजनीति हो या नौकरशाही; हर जगह जाति-वर्ण का बोध और उस पर आधारित परस्पर विद्वेष अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद है। किराये के मकान की तलाश का वक्त हो या ट्रेन में यात्रा करने का; लोगों के नाम में जातिगत सरनेम नहीं है तो उससे निश्चय ही जात पूछी जायेगी। पटना के जनजीवन की ढेर सारी खूबसूरत बातों का किताब में सुंदर वर्णन है तो इन कुछ प्रमुख बदसूरत पहलुओं का जिक्र भी जरूर होना चाहिए था।

‘सवालों का ब्लैक-होल’ शीर्षक उपखंड की छोटी-छोटी टिप्पणियों और आब्जर्वेशन में लेखक ने नये पटना और उसके नागरिक समाज से उभरती कुछ बेहद सकारात्मक और सृजनात्मक तस्वीरों को भी पेश किया है। पटना में एक समय इंडियन काफी हाउस हुआ करता था। पर दशकों से वह नहीं है। इधर कुछ वर्षों से पटना में कैफे कल्चर की शुरुआत हुई है। यही नहीं ‘पटना रिपब्लिक’ की दीवार भी है। ‘सरगम और वुमनिया’ भी हैं। पटना का शाहीन बाग भी नजर आता है। यही नहीं, गरीब और बेहाल घरों की महिलाओं की बड़ी आबादी के मद्देनजर ‘सैनिटरी नैपकिन बैंक’ भी चल रहा है। किताब के आखिर में यह सवाल भी हैः कितना बच पायेगा शहर?

सिर्फ बिहार या पटना वालों को ही नहीं, किसी भी संवेदनशील पाठक को यह किताब अच्छी लगेगी। दूसरे शहर और प्रांत के लोगों को भी अपने शहर के बारे में सोचने और कुछ लिखने की प्रेरणा देगी ‘जीरो माइल पटना!’

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और लेखक हैं।)

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