जन्मदिन विशेष: अमृत काल के नागरिक के लिए उत्पल दत्त के पॉलिटिकल थियेटर को समझना क्यों है जरूरी?

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हिंदी पट्टी की बहुधा आबादी उत्पल दत्त को एक हास्य कलाकार के तौर पर जानती है। उन्होंने ‘गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’, ‘रंग बिरंगी’, ‘शौक़ीन’ और ‘अंगूर’ जैसी फ़िल्मों में ज़बर्दस्त कॉमेडी की। एक इंक़लाबी रंगकर्मी के तौर पर वे उनसे शायद ही वाक़िफ़ हों। जबकि एक दौर था, जब उत्पल दत्त ने अपने क्रांतिकारी रंगकर्म से सरकारों तक को हिला दिया था। अपनी क्रांतिकारी सरगर्मियों की वजह से वे आजा़द हिंदुस्तान में दो बार जे़ल भी गए।

एक दौर था, जब वे देश की सबसे बड़ी थिएटर हस्तियों में से एक थे। आज़ादी के बाद उत्पल दत्त, भारतीय रंगमंच के अग्रदूतों में से एक थे। उन्होंने नाटककार, अभिनेता, थिएटर निर्देशक और थिएटर एक्टिविस्ट की भूमिका एक साथ निभाई। उत्पल दत्त ने प्रोसेनियम थिएटर, नुक्कड़ नाटक, पारंपरिक लोक नाटक और सिनेमा यानी प्रदर्शनकारी कलाओं के सभी माध्यमों में काम किया। अवाम पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा।

उनके लिखे और निर्देशित कई बांग्ला नाटकों ने हंगामा किया। ख़ास तौर पर नाटक ‘अंगार’, ‘कल्लोल’ और ‘बैरिकेड’ काफ़ी चर्चा में रहे। कहने को उनका नाटक ‘बैरिकेड’ जर्मनी के नाजी अधिग्रहण की कहानी कहता है, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर यह उन घटनाओं की ओर इशारा करता है, जो देश को इमरजेंसी की तरफ ले गईं। ज़ाहिर है कि इस नाटक ने अपने दौर में काफ़ी हलचल मचाई।

उत्पल दत्त ने बंगाल के लोक नृत्य ‘जात्रा’ में भी अपनी हिस्सेदारी की और इस लोक कला मंच के ज़रिए राज्य के गाँव-गाँव एवं शहर-शहर तक पहुंचे। उनका पहला जात्रा ‘राइफल’ था, जिसका लेखन और निर्देशन उन्होंने ही किया था। साल 1968 से 1972 के दरमियान उत्पल दत्त ने 17 जात्रा नाटक का लेखन और निर्देशन किया। आगे चलकर ग्रामीण और अर्धशहरी दर्शकों को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने ‘विवेक जात्रा समाज’ संगठन का भी गठन किया। इसके ज़रिए जात्रा प्रस्तुतियां दीं।

उत्पल दत्त ने अपने रंगमंच करियर का आग़ाज़ विलियम शेक्सपियर के ड्रामों से की। ‘ओथेलो’ में अदाकारी के साथ-साथ उन्होंने शेक्सपियर के एक और नाटक ‘रिचर्ड तृतीय’ में राजा का किरदार किया। इस रोल की उनकी दमदार अदाकारी को देखकर, जेनिफिर केंडेल के वालिदैन केंडेल दम्पत्ति जिऑफ्रे केंडल और लौरा केंडल ने उन्हें अपने चलते-फिरते थियेटर ग्रुप ‘शेक्सपियराना थियेटर कंपनी’ में शामिल होने का ऑफर दिया। ज़ाहिर है कि उत्पल दत्त की जैसे मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई।

उन्होंने साल 1947 से लेकर 1949 और फिर बाद में 1953-54 के दौरान भारत और पाकिस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों में इस थियेटर कंपनी के मार्फ़त शेक्सपियर के नाटकों को लोगों तक पहुंचाया। केंडेल दम्पत्ति के भारत से जाने के बाद, उत्पल दत्त ने खु़द का एक नाट्य ग्रुप ‘लिटल थियेटर ग्रुप’ बना लिया। इस ग्रुप के ज़रिए उन्होंने न सिर्फ़ शेक्सपियर के ड्रामे किये, बल्कि इब्सन, बर्नाड शॉ, टैगोर और गोर्की के नाटकों की अंग्रेज़ी प्रस्तुतियां कीं।

साठ के दशक में उत्पल दत्त का झुकाव बांग्ला साहित्य की ओर हुआ। उन्होंने बांग्ला की मूल और अनूदित कृतियों के मंचन की शुरुआत की। यहां भी वे कामयाब रहे।

उत्पल दत्त को अभिनय के साथ-साथ पढ़ने का भी शौक़ था। वे बेहद पढ़ाकू थे। इक्कीस साल की उम्र होने तक उन्होंने मार्क्स, दिदेरो, रूसो, हीगल, कांट, लेनिन, पुश्किन, दास्तोएव्स्की, ट्राट्स्की और बुख़ारिन आदि को पढ़ लिया था। उनकी मार्क्सवादी समझ सतही नहीं थी। अध्ययन के अलावा उन्हें ज़मीनी तर्जुबा भी था। जो उनके विचारों में झलकता था।

उत्पल दत्त एक सच्चे मार्क्सवादी थे और उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा और प्रतिबद्धता को कभी नहीं छिपाया। उनका इस बारे में साफ़ कहना था, ‘‘मैं तटस्थ नहीं, पक्षधर हूं। और मैं राजनीतिक संघर्ष में विश्वास करता हूं। जिस दिन मैं राजनीतिक संघर्ष में हिस्सा लेना बंद कर दूंगा, मैं एक कलाकार के रूप में भी मर जाऊंगा।’’

साल 1950-51 के दौरान उत्पल दत्त ‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन’ यानी इप्टा से जुड़े। उस वक़्त वे अंग्रेज़ी ज़बान के नाटकों में पूरी तरह से डूबे हुए थे। शेक्सपियर और बर्नाड शॉ के नाटकों को करते-करते उनके मन में एकरसता का भाव पैदा हुआ। जो उन्हें इप्टा की ओर ले गया। निरंजन सेन, जो उस वक़्त इप्टा के महासचिव थे, ने उत्पल दत्त से इप्टा में शामिल होने का कहा। जिसे उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी मंज़ूर कर लिया।

इप्टा से जुड़ने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि ‘‘आम अवाम ही अकेली ताक़त है, जो नाट्यकर्म में जीवन का स्पंदन पैदा कर सकती है।’’ यह वह दौर था, जब कोलकाता में इप्टा का सेंट्रल स्क्वॉड काम कर रहा था। जिसमें नुक्कड़ नाटक के जन्मदाता पानू पॉल, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, काली बनर्जी, संगीतकार हेमंग विश्वास, सलिल चौधरी, निर्मल घोष, बिजन भट्टाचार्य जैसे दिग्गज शामिल थे।

पानू पॉल के साथ उत्पल दत्त ने कई नुक्कड़ नाटक किए। उनका पहला नाटक ‘चार्ज़शीट’ (साल 1951) था। यह नाटक उन कम्युनिस्ट नेताओं के ऊपर था, जो उस समय बिना मुक़दमे के ज़ेलों में बंद थे। यह नाटक बंगाल भर में मज़दूरों और कामगारों के बीच खेला गया। ‘चार्ज़शीट’ का विषय और कलाकारों की अदाकारी इतनी प्रभावशाली थी कि नाटक ख़त्म होने के बाद जनता कम्युनिस्ट लीडरों की रिहाई के ज़ोरदार नारे लगाती थी।

इस नाटक की कामयाबी के बाद उत्पल दत्त ने दो दर्जन से ज़्यादा नुक्कड़ नाटक लिखे और खेले। जिन्हें जनता ने खूब पसंद किया। उत्पल दत्त ने नदी-नाविक मज़दूरों, महेशटोला के दर्जियों और उत्तरपाड़ा के आटोमोबाइल मज़दूरों के बीच नुक्कड़ नाटक खेले। पानू पॉल के साथ उन्होंने जो दूसरा नुक्कड़ नाटक किया, वह भी राजनीतिक था। महेशटोला के दर्जियों के बीच उन्होंने इस नाटक के कई प्रदर्शन किए।

उत्पल दत्त ने बाद में यह तस्लीम किया, ‘‘महेशतल्ला के उस दौर ने मुझे पूरी तरह से बदल दिया। मैं एक सबसे कटे हुए, एकाकी बुद्धिजीवी से एक व्यक्ति में, एक जिंदा इंसान में संघर्षशील अवाम के हिस्से में बदल गया।’’

साल 1959 में उत्पल दत्त ने नाटक ‘अंगार’ किया। जो कोयला मज़दूरों की संघर्षमय ज़िंदगी पर केन्द्रित था। इस नाटक में दर्शाया गया था कि किस तरह एक कोयला कंपनी अपने कोयले को आग से बचाने के लिए ख़दान में पानी भर देती है और दूसरे सिरे पर मज़दूर डूबकर मर जाते हैं। यह नाटक भी ख़ासा सफल रहा। जिसके 1100 से ज़्यादा प्रदर्शन हुए।

इप्टा से जुड़ने के बाद उत्पल दत्त ने जो भी नाटक किए, उनमें एक सियासी पैग़ाम है। जनता को जागरूक करने के इरादे से ही यह नाटक तैयार किए गए। इन्हें राजनीतिक नाटक कहें, तो ग़लत नहीं होगा। देश में जब इमरजेंसी लगी, तो उत्पल दत्त ने इसका रचनात्मक विरोध किया। इमरजेंसी के ख़िलाफ़ उन्होंने उस वक़्त तीन नाटक ‘बैरीकेड’, ‘सिटी ऑफ नाइटमेयर्स’, ‘इंटर द किंग’ लिखे।

सरकार ने उनके इन तीनों नाटकों को बैन कर दिया। लेकिन जहां भी यह नाटक खेले गए, लोगों ने इन्हें खूब पसंद किया।

उत्पल दत्त एक सजग बुद्धिजीवी थे। देश की अहम समस्याओं पर उनकी हमेशा नज़र रहती थी। अपने तईं वे इन मुद्दों पर वाज़िब हस्तक्षेप भी करते थे। किताब ‘टुवर्ड्स ए रिवोल्यूशनरी थिएटर’, क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत उनकी एक अहम किताब है। जिसमें उन्होंने अपनी तमाम मुद्दों पर बेलाग राय पेश की है।

एक जगह वे लिखते हैं, ‘‘भारत का पूंजीपति, जो अज्ञानी है तथा मध्ययुगीन अंधविश्वास में डूबा हुआ है, अपने मुनाफ़ों के लिए ख़तरा देखता है, तो वहशी बन जाता है और पड़ोसी देशों के साथ युद्ध करना, एक तरह से उसकी सालाना तिकड़म है, जिसका सहारा लेकर काल्पनिक दुश्मनों के ख़िलाफ़ भारतीय अवाम का ध्यान मोड़ा जाता है और अवाम के बीच पाशविक कट्टरता को जगाया जाता है और उसे कम्युनिस्टों, जनतंत्रवादियों तथा शांतिवादियों के ख़िलाफ़ मोड़ दिया जाता है।’’

उत्पल दत्त की इस बात की प्रासंगिकता मौज़ूदा दौर में भी विद्दमान है। देश में आज हम आये दिन इस तरह की हिंसक प्रवृतियों को देख रहे हैं। उत्पल दत्त सरमायेदारी के कट्टर मुख़ालिफ थे। सरमायेदारी को वे हर समस्या की जड़ मानते थे। फ़िल्मों और कला में आज पूंजी का जिस तरह से दखल बढ़ा है, इस पर उनका ख़याल था, ‘‘पूंजीवादी व्यवस्था के आदेश पर निर्मित कला कभी भी कचरे के स्तर से ऊपर नहीं उठ सकती है।’’

उत्पल दत्त ने हिंदी फ़िल्मों में भी काम किया। मशहूर फ़िल्मकार और लेखक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने फ़िल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ (1969) में उन्हें पहली दफ़ा अभिनय करने का मौक़ा दिया। उसी साल फ़िल्मकार मृणाल सेन ने अपनी हिंदी फ़िल्म ‘भुवन सोम’ में उन्हें मुख्य किरदार के लिए चुना। इत्तिफ़ाक़ से मृणाल सेन की भी यह पहली हिंदी फ़िल्म थी। ‘भुवन शोम’ में उत्पल दत्त की अदाकारी ख़ूब सराही गई। यहां तक कि उन्हें इस फ़िल्म में अभिनय के लिए वर्ष 1970 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

आगे चलकर उत्पल दत्त ने डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी की अनेक फ़िल्मों में काम किया। उन्हीं की फ़िल्म ‘गोलमाल’, ‘नरम गरम’ और ‘रंग बिरंगी’ के लिए उत्पल दत्त को कॉमेडी का फ़िल्मफेयर पुरस्कार हासिल हुआ। उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर में 100 से ज़्यादा फ़िल्में कीं। सत्यजित राय की आख़िरी फ़िल्म ‘आगुंतक’ में अदाकारी के लिए उत्पल दत्त को ‘बंगाल फ़िल्म पत्रकार संघ पुरस्कार’ मिला।

यही नहीं साल 1990 में थियेटर में बेमिसाल योगदान के लिए उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप’ से भी सम्मानित किया गया। सरकार ने उत्पल दत्त की दीर्घ कला साधना का सम्मान करते हुए उनकी स्मृति मे डाक टिकट जारी किया। 19 अगस्त, 1993 को उत्पल दत्त ने ज़िंदगी के रंगमंच पर आख़िरी भूमिका निभाई और हमेशा के लिए विदाई ले ली।

(ज़ाहिद ख़ान वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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