Subscribe for notification

साझी शहादत- साझी विरासत के नायाब उदाहरण हैं शहीद वारिस अली:इंसाफ मंच

मुजफ्फरपुर। शहीद वारिस अली का नाम स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के उन चंद शहीदों की सूची शामिल होने का गौरव हासिल है जिन्होंने सबसे पहले कुर्बानी दी थी। यह पहले बिहारी योद्धा थे जिन्हें अंग्रेजों ने 6 जुलाई 1875 को देशद्रोह के आरोप में फांसी पर लटकाया। वारिस अली को मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार कर दानापुर छावनी में ले जाकर फांसी की सजा दी गयी थी।

छह जुलाई को उनके जन्मदिन के मौके पर स्थानीय ब्रह्मपुरा किला चौक पर इंसाफ मंच के बैनर तले शहीद वारिस अली की शहादत दिवस पर इंसाफ मंच बिहार के उपाध्यक्ष जफ़र आज़म की अध्यक्षता में शहादत समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में शिरकत कर रहे सैकड़ों लोगों ने 2 मिनट का मौन रख कर अपनी श्रद्धांजलि देते हुए देश की साझी विरासत-साझी शहादत के नारे को बुलंद किया।

शहीद वारिस अली अंग्रेजी हुकूमत में पुलिस विभाग में कार्यरत थे। वह तिरहुत प्रमंडल जिले के बरूराज थाने में जमादार के पद पर थे लेकिन उनकी वफादारी दिल्ली की सल्तनत के साथ थी और उन्हें ही वह देश का शासक मानते थे। अंग्रेजों के बारे में उनकी धारणा थी कि वह लोग जबरन हमारे देश पर कब्जा किए हुए हैं।

इस मौके पर लोगों ने नीतीश सरकार एवं जिला प्रशासन से मांग किया कि शहर में शहीद वारिस अली स्मारक का निर्माण हो ताकि लोग अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा ले सकें।

शहादत समारोह में पत्रकार मोहम्मद आफाक आजम द्वारा लिखी पुस्तक ‘शहीद वारिस अली’ का विमोचन भी किया गया जो इंसाफ मंच के द्वारा प्रकाशित किया गया है।

इस पुस्तक के लेखक मोहम्मद आफाक आजम ने बताया कि साहित्यकार रामचंद्र रहबर से लेकर विनायक दामोदर सावरकर तक ने अपनी किताब में शहीद वारिस अली के बारे में लिखा है।

इंसाफ मंच बिहार के प्रवक्ता असलम रहमानी ने शहीद वारिस अली की शहादत पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि 14 मई 1855 को मुजफ्फरपुर जेल में बंद क़ैदी उस समय लड़ने के लिए उठ खड़े हुए जब कैदियों से धातु का लोटा और बर्तन छीनकर उन्हें मिट्टी का बर्तन पकड़ाया गया। मिट्टी का बर्तन एक बार शौच के लिए इस्तेमाल हो जाए तो अपवित्र माना जाता है और अंग्रेज़ ये बात समझने को तैयार नहीं थे; उनको डर था कि धातु के लोटे और बर्तन को गलाकर हथियार और जेल तोड़ने का सामान बनाया जा सकता है।

क़ैदी बहुत नाराज़ हो गए तो मजिस्ट्रेट ने डरकर गोली चलवाई तो बात और बढ़ गई। जेल के कै़दी अधिकतर गांव के किसान थे। जेल के पास अफ़ीम वालों का एक गोदाम था, जहां 12 हज़ार किसान अपने-अपने काम से आए हुए थे। जेल में हो रही कार्यवाही की ख़बर फैली, तो वे तमाम किसान जेल की ओर दौड़े। उनके आने से क़ैदियों का हौसला भी बढ़ गया। हालांकि इस पूरे वाक़ये में कैदी और किसानों का बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन आग अन्दर ही अन्दर सुलगती रही। इस पूरे वाक़ये को ‘लोटा तहरीक’ के नाम से जाना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के लिए वारिस अली को ज़िम्मेदार ठहराया गया। उन पर ये आरोप था कि उन्होंने हज़ारों किसानों को जेल का घेराव करने में सहयोग किया था।

‘तारीख़ ए बिहार’ और ‘नक़्श ए पैदार’ जैसी किताबें लिखने वाले उर्दू के मशहूर शायर और लेखक शाद अज़ीमाबादी ने भी ‘लोटा विद्रोह’ को वारिस अली की ही दिमाग़ी उपज बताया है, जो ख़ुद को मुग़ल ख़ानदान के फ़र्द मानते थे। जो बरुराज पुलिस चौकी में जमादार की हैसियत से तैनात थे।

एक सरकारी अफ़सर का विद्रोहियों का साथ देना सरकार की नज़र में बग़ावत था, इस लिए सरकारी आदेश पर उनके मकान को घेर लिया गया, उस समय वे गया के “अली करीम” नाम के एक अज़ीम क्रांतिकारी को ख़त लिख रहे थे। इस छापे में उनके घर से बहुत आपत्तिजनक पत्र प्राप्त हुए। पर ट्रायल के दौरान एैसा कोई भी पत्र पेश नहीं किया जा सका।

असलम रहमानी ने कहा कि किताब के अनुसार बरुराज पुलिस चौकी के पास उनके निवास से अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था। तिरुहुत के मजिस्ट्रेट एएच रिचर्डसन को नीलहों से शिकायत मिली थी कि वारिस अली विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं। गिरफ़्तारी के बाद वारिस अली को मुजफ़्फ़पुर के पुरानी बाज़ार नाका में तीन दिनों तक रखा गया था और उसके बाद उन्हें सुगौली (चम्पारण) मेजर की अदालत में पेश किया गया। मेजर ने इस आधार पर कार्रवाई करने से इनकार किया कि इनके ख़िलाफ़ सबूत अपर्याप्त हैं। इसके बाद उन्हें पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर की अदालत में पेश किया गया। 6 जुलाई 1857 को  को दानापुर छावनी में फांसी दे दी गई

शहादत समारोह में आइसा के जिला सचिव दीपक कुमार, इनोस के जिला सचिव राहुल सिंह, इंसाफ मंच के जिलाध्यक्ष फहद जमां, माले कांटी बलाॅक के प्रभारी कामरान रहमानी, राज्य उपाध्यक्ष जफर आजम, अजय कुमार, असलम रहमानी, पत्रकार माजिद भाई, अकबर ए आजम, मोहम्मद तौहीद अहमद, इंजीनियर रियाज खान मुन्नवर ए आज़म, इंसाफ मंच राज अध्यक्ष सूरज कुमार सिंह, मोहम्मद काशिफ, मोहम्मद फैसल आदि मौजूद थे।

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

Share
Published by