Wednesday, February 8, 2023

एनडीटीवी का अधिग्रहण और पत्रकारिता का जनपक्ष

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एक नज़र, एनडीटीवी के अधिग्रहण पर।

० आरआरपीआर (राधिका रॉय प्रणय रॉय) होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड, जो  एनडीटीवी की प्रमोटर फर्म थी, अपनी इक्विटी पूंजी का 99.5% अडानी समूह को स्थानांतरित करती है।

० इसके बाद, प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने, जिसके पास न्यूज चैनल में 29.18% हिस्सेदारी है, आरआरपीआर के निदेशक पद से इस्तीफा दे देते हैं।

० अडानी समूह, 22 नवंबर 2022 से 5 दिसंबर 2022 के बीच, NDTV में 26% हिस्सेदारी के लिए एक खुला ऑफर देता है। बहुसंख्यक शेयर हासिल करने के लिए कॉर्पोरेट को इसमें से सिर्फ 21.82% शेयरों की आवश्यकता है।  

० सोमवार, 29 नवंबर 2022 को, शेयर बाजार बंद होने तक, अडानी ने, 168 लाख शेयरों में से, 53 लाख, यानी 31.78% शेयर की बोलियां, ओपन ऑफर में लगाईं।

यहां एक विरोधाभास है कि, जब, खुदरा शेयरधारकों के लिए ₹294 की खुली पेशकश की कीमत आज के बंद बाजार मूल्य ₹446.30 की तुलना में लगभग 34% कम थी, तब ऐसा लगता है कि एनडीटीवी के, शेयरों, खुदरा और कॉर्पोरेट दोनों – का अडानी समूह की ओर, एक नियमित प्रवाह था। 

० इस बीच, रॉय परिवार, जिसके पास एनडीटीवी, में, 32.26% हिस्सेदारी है, उसने, एनडीटीवी के बोर्ड से इस्तीफा नहीं दिया। हालांकि, गौतम अडानी ने, यह बात ऑन रिकार्ड कही थी कि, उन्होंने प्रणय रॉय को, एनडीटीवी प्रमुख के रूप में बने रहने के लिए खुद ही कह दिया है। 

लेकिन, यह सिर्फ यह बताने के लिए कि, एनडीटीवी, NDTV गंभीर वित्तीय संकट में नहीं है। वित्तीय वर्ष, 2022 में, एनडीटीवी ने ₹421 करोड़ का राजस्व दर्ज किया और साथ ही, ₹123 करोड़ का EBITDA, और ₹85 करोड़ का शुद्ध लाभ-नगण्य ऋण के साथ भी कम्पनी को हुआ। 

कॉर्पोरेट के क्षेत्र में, इस प्रकार के अधिग्रहण को, शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण (Hostile takeover) कहा जाता है। एनडीटीवी ने कर्ज लिया था और कर्ज के एवज में, उसने शेयर देने का वादा भी किया था, और एक ईमानदार कर्जदार के नाते प्रणव रॉय को, कर्ज समय पर चुकाना भी चाहिए था। आखिर यह कोई सरकारी बैंक द्वारा लिया गया कर्ज तो था नहीं, जिसे एक मेहरबान सरकार, एनपीए की आड़ में माफ कर देती !अतीत के इस एक कर्ज के परिणामस्वरूप, एनडीटीवी को, इस अधिग्रहण का, यह अवर्णनीय विस्फोट झेलना पड़ा। यह सब पूंजीवाद की अनिवार्य विसंगतियां हैं जिसे प्रोफेशनल हेजार्ड यानी पेशेवाराना खतरे कहा जा सकता है। एनडीटीवी को दिए गए,  एक ऋण के एवज में, जिसे अडानी ने चुपके से, उन शेयर के साथ, जो निवेशक ने, ऋण चुकाने के बदले में रखे थे, को अधिग्रहीत कर लिया। यहां पर रॉय परिवार को, हम अपना किला बचाने के अंतिम जद्दोजहद करते हुए देख सकते हैं। 

अडानी समूह ने जिस सफाई और चालाकी से ऑपरेशन एनडीटीवी को अंजाम दिया, उसकी प्रशंसा भी लोग करेंगे। एक क्रोनी कैपिटलिस्ट, जो खुद, एक विनाशकारी कर्जे में डूबा हुआ है, वह अपने कर्ज की वसूली के लिए, एक कंपनी का शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण, सिर्फ इसलिए कर लेता है, ताकि, एक विरोधी मीडिया हाउस को मैनेज किया जा सके ! लेकिन यह सब किसके इशारे पर हो रहा है और, सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी पत्रकारिता से, असहज कौन हो रहा है, यह बात, छिपी ढंकी नहीं है, बल्कि आम है। अडानी समूह को कर्ज देने वाले सरकारी बैंक, यदि आज इसी पैटर्न और मॉडल पर अपनी कर्ज वापसी के लिए सक्रिय हो जाएं तो, यह समूह भी पुनर्मूषको भव हो जायेगा। 

एनडीटीवी का अधिग्रहण एक सामान्य कॉर्पोरेट अधिग्रहण नहीं है और न ही यह अडानी समूह का मीडिया में प्रवेश करने का कोई इरादा या मिशन। बड़े कॉर्पोरेट संस्थान, अखबारों और टीवी चैनलों में रुचि रखते रहे हैं पर उसका कारण उस अखबार या चैनल से, उनका लक्ष्य, मुनाफा कमाना उतना नहीं रहा है जितना कि एक दबाव ग्रुप और पीआर हब का निर्माण करना रहा है। दबाव ग्रुप का लाभ अन्य व्यावसायिक सौदों में लेना कॉर्पोरेट संस्थानों की एक सामान्य फितरत है। यह फितरत, कॉर्पोरेट की कार्यशैली का एक स्थापित अंग है। एनडीटीवी का अधिग्रहण एक ऐसे कॉर्पोरेट द्वारा किया गया है, जो पत्रकारिता और मीडिया हाउस के बिजनेस में, लगभग अनुभवहीन है। आगे चाहे जो हो, पर, एनडीटीवी का यह अधिग्रहण, एक उदार टीवी चैनल के अवसान के रूप में भी देखा जा सकता है। 

आज, ₹2000 में चिप, स्वर्ग की सीढ़ी, प्रधानमंत्री का अनवरत दुंदुभिवादन, जनता के जीवन से जुड़े असल मुद्दों पर शर्मनाक चुप्पी, सरकार को कठघरे में खड़ा करने के बजाय, उसके चौखट पर ही साष्टांग लेट जाने वाली ‘छद्म’ पत्रकारिता के इस स्याह काल में, एनडीटीवी का स्टैंड, तमाम व्यवसायगत मजबूरियों के बावजूद, एक उदार और प्रतिरोधी पत्रकारिता का रहा है।

व्यवसाय के अनेक अनिवार्य और मजबूरी भरे समझौतों के बीच भी, इस चैनल ने, जनता की आवाज को समय-समय पर उठाया है और सरकार को, जब अन्य टीवी चैनल ‘धन्य धन्य, साधु साधु’ के प्रशस्ति गायन से, मोह तंद्रा में, आनंदित कर रहे थे, तो, कुछ तो खलल, उनके ख्वाबगाह में, डाला ही है। सरकार को इस चैनल और विशेषकर एनडीटीवी के, प्राइम टाइम जैसे कुछ अन्य, कार्यक्रमों ने, अकसर असहज किया है और, ऐसी चर्चा है कि, उसी आंख की किरकिरी को, दूर करने के लिए, एक चहेते कॉर्पोरेट को, आगे किया गया और यह शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण का जाल बुना गया। 

मीडिया के इतिहास में, बहुत से नए टीवी चैनल शुरू हुए होंगे और बहुतों का अधिग्रहण भी हुआ होगा। पत्रकार भी बहुत से चैनल छोड़ कर अलग हुए होंगे और यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। पर एनडीटीवी के अधिग्रहण और रवीश कुमार के इस्तीफे पर, स्वतंत्र और जनोन्मुख पत्रकारिता के पक्ष में, जिस प्रकार की स्वयं स्फूर्त प्रतिक्रिया सामने आई है या, आ रही है, वह इस बात का सुखद संकेत है कि, उदारता और जनवादी संस्कृति को नष्ट कर देने के, इस फासीवादी उद्यम के बावजूद, अभी बहुत कुछ शेष बचा है। सबसे बड़ी बात एक जिजीविषा बची है। ख्वाब देखने और बुनने की आदत बची है। कवि, नीरज की एक पंक्ति याद आ रही है, “कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।”

मीडिया या पत्रकारिता में, जनता अपना स्वर ढूंढती है। वह चाहती है कि, उसकी मुसीबतों, समस्याओं, और उसकी बात सुनी और सुनाई जाए, पढ़ी और पढ़ाई जाए। सरकार तक उसकी गुहार पहुंचाई जाए। पर जब मीडिया अपने इस दायित्व से विमुख होने लगती है और पत्रकारिता, जनता के बजाय सरकार की बात, कहने सुनने लग जाती है तो, उस तिमिर में भी यदि, जनता को कहीं से, रोशनी की एक किरण फूटती हुई नजर आती है तो, वह उसे आश्वस्त करती है, साहस देती है, और हिम्मत बंधाती है। तमाम टीवी चैनलों के बीच एनडीटीवी की आवाज ऐसी ही आश्वस्त करने वाली रही है। 

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि, देश में जनपक्षधर पत्रकारों की कमी है। छोटे छोटे अखबारों से लेकर, स्वतंत्र पत्रकारिता करते हुए यूट्यूबर तक, अनेक प्रख्यात, ज्ञात, अज्ञात और अल्पज्ञात पत्रकार, जनता की बात सामने रख रहे हैं। सरकार इनसे भी असहज हो रही है और अब भी वह कोई न कोई ऐसा दांव सोच रही है, जिससे यह जुबाबंदी की जा सके। पर यह फिलहाल न तो संभव है और न ही, मुझे, उम्मीद है कि, भविष्य में ऐसा होगा। अंत में फैज अहमद फैज की अमर नज़्म की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है

जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल जो कुछ कहने है कह ले

बोल कि लब आजाद हैं मेरे !!

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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