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Categories: बीच बहस

गांधी को ठेंगा दिखा रहा मॉब लिंचिंग के खिलाफ पीएम को पत्र लिखने वाली शख्सियतों पर देशद्रोह का मुकदमा

गजब खेल चल रहा है देश में। एक ओर देश गांधी जी की 150वीं जयंती मनाकर अहिंसा का संदेश दे रहा है वहीं दूसरी ओर जो लोग अहिंसा की पैरवी कर हिंसा के खिलाफ प्रधानमंत्री को सचेत कर रहे रहे हैं उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया जा रहा है। इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा, फिल्मकार मणिरत्नम और अपर्णा सेन समेत 50 शख्सियतों का बस यही अपराध था कि उन्होंने गांधी जी की विचारधारा पर चलते हुए देश में हो रही मॉब लिंचिंग के खिलाफ प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया। वह भी तब जब खुद प्रधनामंत्री अच्छे शासन के लिए जनता से सुझाव मांगते रहते हैं।

यह अपने आप में विडंबनापूर्ण है कि इन लोगों पर देश की छवि को खराब करने का आरोप लगाया गया है। इन्हें अलगाववादी प्रवृत्तियों का समर्थक करार दिया गया है। यह प्रकरण पूरी की पूरी न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर रहा है। यह अपने आप में प्रश्न है कि किसी हिंसा के खिलाफ प्रधनामंत्री को पत्र लिखने से देश की छवि कैसे बिगड़ रही है या फिर देश के प्रधानमंत्री को व्यवस्था पर पत्र लिखने से अलगाववादी प्रवृत्ति कहां से दिखाई दे रही है? वह भी तब जब वह प्रधानमंत्री जनता से चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा चुना गया है।
इसे किसी सोच को लेकर चल रही सरकार का बंधुआ गुलामी ही कही जाएगी कि बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थानीय एडवोकेट सुधीर कुमार ओझा ने तकरीबन दो महीना पहले मॉब लिंचिंग के खिलाफ पीएम को पत्र लिखने वाली इन शख्सियतों के खिलाफ चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की कोर्ट में याचिका दायर की और कोर्ट ने भी एफआईआर दर्ज करने का यह आदेश पारित कर दिया।
‘दि हिंदू’ के हवाले से आयी खबर के मुताबिक एडवोकेट ओझा ने बताया कि ‘मेरी याचिका स्वीकार करने के बाद सीजेएम ने यह आदेश 20 अगस्त को पारित किया था। उसके बाद 4 अक्तूबर को पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गयी’।
यह अपने आप में एक सोच को लेकर मोदी सरकार के पक्ष में चलाया गया अभियान प्रतीत हो रहा है कि याचिका में 50 हस्ताक्षरकर्ताओं का नाम दिया गया था। यह मोदी सरकार की चाटुकारिता में किया गया समर्थन नहीं तो और क्या है। एडवोकेट के मुताबिक मॉब लिंचिंग पर पीएम को पत्र लिखकर न केवल देश की छवि को खराब की गई है बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के शानदार प्रदर्शन पर भी सवालिया निशान लगाया गया है? वकील का कहना था कि इस तरह के पत्राचार से अलगाववादी प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा मिलेगा। मतलब देश में हो रहे गलत काम को लेकर सरकार की जवाबदेही याद दिलाना अलगाव प्रवृत्ति है?

देश में धर्म और जाति के नाम पर नंगा नाच होता रहे और लोग चुप रहें। किसी देश के प्रधानमंत्री को हिंसा को लेकर पत्र लिखने पर देशद्रोह, धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने और उसे अपमानित करने और भड़काने के जरिये शांति को भंग करने संबंधी धाराएं लगाई गई हैं। पत्र इसी साल जुलाई महीने में लिखा गया था। पत्र लिखने वालों में इन सभी के अलावा गायिका शुभा मुद्गल भी शामिल थीं। इसमें कहा गया था दलितों, मुसलमानों और सभी अल्पसंख्यकों की लिंचिंग पर तत्काल रोक लगायी जानी चाहिए। इसके साथ ही इसमें कहा गया था कि बगैर असहमति के कोई लोकतंत्र नहीं होता है। इसमें इस बात को बिल्कुल साफ-साफ कहा गया था कि ‘जय श्रीराम’ इस समय युद्ध का नारा बन गया है।
मॉब लिंचिंग के खिलाफ पीएम को पत्र लिखने वाले वकील, एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने वाली कोर्ट के साथ ही इन शख्यिसतों पर कार्रवाई के समर्थकों को इस ओर भी ध्यान दे लेना चाहिए कि हमारे देश में सेना को सबसे अधिक सम्मान दिया जाता है। इन सेना के 100 पूर्व सैनिकों ने 2017 के जुलाई महीने में पीएम को पत्र लिखकर मॉब लिंचिंग की निंदा की थी और कहा था कि असहमति को देशद्रोह करार नहीं दिया जा सकता है।

पूर्व सैनिकों द्वारा लिखे गये इस पत्र में कहा गया था कि ‘हमने देश की सुरक्षा के लिये अपना जीवन दिया है। हम सब किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित नहीं है और हमारा एक ही मकसद है कि हम देश के संविधान का सम्मान करें’। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते…..हमारी अनेकता एकता ही हमारी शक्ति है। मतभेद देशद्रोह नहीं हो सकता है। सच कहें तो ये लोकतंत्र का मूल तत्व है। यह बात भी गौर करने वाली है कि सैनिकों ने यह पत्र तब लिखा था जब मुस्लिम युवा जुनैद की भीड़ द्वारा हत्या करने के बाद दिल्ली समेत देश भर में प्रदर्शन हुए थे। पत्र में कहा गया था कि ‘मुस्लिम और दलितों को निशाना बनाए जाने की हम निंदा करते हैं…… मीडिया संस्थानों, व्यक्तियों, सिविल सोसाइटी ग्रुप, विश्वविद्यालयों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के बोलने की आज़ादी पर हो रहे हमले और उन्हें राष्ट्रविरोधी करार दिये जाने की भी निंदा करते हैं’। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गोरक्षा के नाम पर हो रहे हमलों की निंदा की थी और कहा था, ‘गौ रक्षा के नाम पर लोगों की हत्या करना स्वीकार नहीं किया जा सकता है’।
यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद अच्छे शासन के लिए लोगों से सुझाव मांगते रहते हैं। 29 सितम्बर को तो जब उन्होंने आकाशवाणी से मन की बात कार्यक्रम में देश-विदेश के लोगों के साथ अपने विचार साझा किए तो अरुणाचल प्रदेश से एक नन्हीं बच्ची के पत्र को विशेष रूप से शामिल किया गया। इस बच्ची के सुझाव को पीएम मोदी ने आदेश मानते हुए उसे पालन करने की बात कही। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने 30 सितंबर को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के दीक्षांत समारोह में शामिल होने से पहले सुझाव मांगे थे।

यहां उन्होंने विद्यार्थियों व अन्य मौजूद लोगों को संबोधित भी किया । इस संबोधन के लिए उन्होंने लोगों से सुझाव आमंत्रित किए थे। इन सुझाव को लेकर प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा था ‘कल मैं आईआईटी मद्रास के दीक्षांत समारोह के लिए चेन्नई में रहूंगा। वहां भारत के कुछ प्रतिभाशाली व उज्ज्वल विद्यार्थियों से मिलने के लिए उत्साहित हूं। मैं चाहूंगा कि आप सभी, खास कर आईआईटी में पढ़ रहे व पढ़ चुके छात्र-छात्राएं मेरे भाषण के लिए कुछ आइडिया साझा करें। आप नमो के ओपेन फोरम पर मेरे साथ अपने आइडिया साझा कर सकते हैं। एक ओर प्रधानमंत्री सुझाव मांगते हैं, दूसरी ओर यदि मॉब लिंचिंग मामले में देश के बुद्धिजीवियों ने पत्र लिख दिया तो मामला न केवल कोर्ट तक पहुंचा बल्कि उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हो गया।

(चरण सिंह राजपूत पत्रकार हैं और आजकल नोएडा से निकलने वाले एक राष्ट्रीय दैनिक के प्रकाशन का कार्यभार संभाले हुए हैं।)

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