Tuesday, December 7, 2021

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बाजारवादी समाजवाद के बाद साझा समृद्धि: अब कैसे दिखेगा चीन?

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चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की अगले महीने (8-11 नवंबर) एक विशेष बैठक होगी। खबरों के मुताबिक उसमें ‘इतिहास पर संकल्प-पत्र (resolution)’ को मंजूरी देगी। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि पार्टी के इतिहास में इस संकल्प-पत्र का वही दर्जा होगा, जो 1945 और 1981 में पारित दो विशेष प्रस्तावों को मिला था। उन दोनों प्रस्तावों के बारे में समझा जाता है कि उनसे पार्टी ने एक नई दिशा तय की। मोटे तौर पर उन दो युगों को माओ जे दुंग और देंग श्याओ पिंग के दौर के रूप में जाना जाता है। अब कहा जा रहा है कि अगले संकल्प-पत्र के साथ कम्युनिस्ट पार्टी शी जिनपिंग के युग को औपचारिक रूप से मान्यता देगी।

पार्टी ने 1945 में जिस प्रस्ताव को स्वीकार किया था, उसे ‘पार्टी इतिहास से संबंधित कुछ प्रश्नों पर संकल्प-पत्र’के रूप में जाना जाता है। इसके जरिए अतीत में पार्टी की ‘गलतियों’और ‘भटकावों’को परिभाषित किया गया था। इनसे संबंधित माओ की समझ और व्याख्या को तब पार्टी ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया था। 1981 में जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसे ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद के पार्टी इतिहास से संबंधित कुछ प्रश्नों पर संकल्प-पत्र’ के नाम से जाना जाता है। इसमें ‘सर्वहारा की सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान माओ की ‘गलतियों’ को स्वीकार किया गया। लेकिन इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि ‘बाद के वर्षों में माओ की गलतियों’को उनकी सफलताओं से अलग करके देखा जाना चाहिए। साथ ही माओ जे दुंग विचार को मार्क्सवाद-लेनिनवाद के समकक्ष रखते हुए उसे पार्टी के एक वैचारिक प्रकाश स्तंभ के रूप में स्वीकार किया गया।

देंग के युग में चीन ने बाजार अर्थव्यवस्था को अपनाया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की शब्दावली में यहां से ‘बाजार आधारित समाजवाद’ (market socialism) की शुरुआत हुई। तब से चीन अपनी व्यवस्था को ‘चीनी स्वरूप का समाजवाद’ (Socialism with Chinese characteristic) कहता आया है। देंग के दौर में जोर उत्पादक शक्तियों के विकास और अधिक से अधिक धन पैदा करने पर रहा।

अब बीते एक साल से शी जिनपिंग के नेतृत्व में पार्टी ने बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और चीनी समाज में सुधार की बड़ी योजना लागू की है। शी ने अपने दौर में ‘चीनी राष्ट्र के महान नवजीवन’ (great rejuvenation of Chinese nation) के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने ‘साझा संपत्ति’ (common prosperity) का विचार सामने रखा है। मकसद 2049 तक, जब कम्युनिस्ट क्रांति के 100 साल पूरे होंगे, चीन को एक ऐसा समृद्ध राष्ट्र बनाना है, जो अपेक्षाकृत अधिक समतापूर्ण भी हो।

आज दुनिया में common prosperity के विचार पर गहन विचार-विमर्श चल रहा है। आखिर इसका स्वरूप क्या होगा और अगर शी की योजना सफल हुई, तो चीन असल में कैसे समाज के रूप में दिखेगा, इस प्रश्न में गहरी दिलचस्पी पैदा हुई है।
चीन में मौजूद पर्यवेक्षकों के मुताबिक ‘साझा समृद्धि’का मकसद सिर्फ आर्थिक नहीं है। बल्कि इसके व्यापक उद्देश्यों में आम जन के जीवन स्तर को उठाना, सामाजिक समरसता को बढ़ाना, राजनीतिक स्थिरता को मजबूत करना और चीन के राष्ट्रीय नवजीवन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शामिल है।

जॉन रॉस पहले लंदन के मेयर कार्यालय में आर्थिक और व्यापार नीति विभाग के निदेशक थे। अब वे चीन की रेनमिन यूनिवर्सिटी के चोंगयांग इंस्टीट्यूट फॉर फाइनेंशियल स्टडीज में सीनियर फेलो हैं। उन्होंने हाल में Common Prosperity के विचार की व्याख्या करते हुए लिखा है- “साझा समृद्धि की नीति की मौलिकता को ठीक-ठीक समझने के लिए जरूरी है कि इसे एक आर्थिक नजरिए के साथ-साथ मार्क्सवादी सिद्धांत की निरतंरता के रूप में भी इसे देखा जाए। इस लिहाज से सबसे उपयोगी तरीका चीन की समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था से जुड़े मूल मुद्दों पर ध्यान देना होगा। तब इसे मार्क्सवादी अर्थव्यवस्था की दृष्टि से स्पष्ट देखा जा सकता है। साथ ही तब इसे आसानी से पश्चिमी अर्थव्यवस्था की समझ के अनुरूप भी समझा जा सकता है।”

रॉस और उनके जैसे नजरिए वाले जानकार यह स्वीकार करते हैं कि सोवियत संघ में 1929 के बाद और चीन में क्रांति के तुरंत बाद जो पूर्णतः राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्थाएं अपनाई गईं, वे बेशक अधिक समतापूर्ण थीं। लेकिन उनका तर्क है कि वे अर्थव्यवस्थाएं मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुरूप नहीं थीं। इसलिए कि ‘मार्क्सवादी विश्लेषण के मुताबिक समाजवादी क्रांति के बाद जो नया मॉडल अपनाया जाएगा, उसमें अधिक तीव्र गति से उत्पादक शक्तियों के विकास पर जोर होगा। अतः पूंजीवाद की तुलना में समाजावादी व्यवस्था में अधिक तीव्र गति से आर्थिक विकास होगा और लोगों का जीवन स्तर अधिक तेजी से ऊंचा उठेगा।’

कहा गया है कि सोवियत संघ और 1981 के पहले के चीन में समता अधिक थी, लेकिन उपरोक्त कसौटी पर ये व्यवस्थाएं विकसित पूंजीवादी देशों से आगे नहीं निकल सकीं। ऐसा पहली बार 1981 के बाद के चीन में हुआ, जब Market Socialism को अपनाया गया। लेकिन इस नई व्यवस्था के साथ चीन में आर्थिक विषमता और वैसी बहुत-सी दूसरी सामाजिक बुराइयां प्रचलित हुईं, जो पूंजीवादी देशों की पहचान रही हैं। धीरे-धीरे चीन दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया, जहां सबसे ज्यादा आर्थिक गैर बराबरी है।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का दावा है कि Common Prosperity की नीति उन्हीं भटकावों का उपचार है। इसकी शुरुआत पिछले साल की गई। लगभग उसी समय चीन में 14वीं पंचवर्षीय योजना को मंजूरी दी गई। इसमें एक खास बात यह कही गई कि चीन अब आर्थिक विकास की समझ बदलने की दिशा में जाएगा। योजना दस्तावेज में कहा गया- ‘ecological civilization के निर्माण की दिशा में बढ़ा जाएगा।… पर्यावरण अनुकूल कार्य और जीवन शैली को अपनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की जाएगी।’

जिस समय कम्युनिस्ट पार्टी 14वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज को मंजूरी देने की प्रक्रिया में थी, उससे कुछ पहले ही चीन में प्राइवेट सेक्टर पर लगाम कसने के कदम उठाए जाने लगे। अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में पश्चिमी विश्लेषकों ने इसे कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अपना नियंत्रण कसने की कोशिश बताया। लेकिन बाद में जब ये कार्रवाइयां बढ़ती गईं, तब इन कोशिशों को समग्रता से देखने और उनके मतलब समझने की कोशिशें शुरू हुईं।

मसलन, अमेरिका के थिंक टैंक ब्रुकिंग्स के कयास भरे एक विश्लेषण में कहा गया- ‘यह भी लगता है कि चीनी नेतृत्व यह संकेत दे रहा है कि भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए संसाधनों का आवंटन तय करने में वह अधिक भूमिका निभाना चाहता है। ऐसा नहीं लगता कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स, वीडियो गेम्स या फूड डिलिवरी सिस्टम में हुए सुधार से वह चकाचौंध है। इसके विपरीत वह चाहता है कि प्रतिभाएं और पूंजी उच्चस्तरीय मैनुफैक्चरिंग, ग्रीन टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर उत्पादन, इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े प्रमुख रणनीतिक क्षेत्रों में लगाई जाएं।’

चीन से कई पश्चिमी समाचार माध्यमों के लिए रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार चांग चे ने बीते सितंबर में उन क्षेत्रों की एक लिस्ट बनाई थी, जिन्हें विनियमित (regulate) करने के कदम साल भर के अंदर चीन में उठाए गए हैं। चांग ने ऐसी 18 कार्रवाइयों को अपनी सूची में शामिल किया था।
इनके अलावा इसी समय चीन में डेटा संरक्षण के नए कानून का एक ड्राफ्ट भी जारी किया गया है, जिसके बारे में विशेषज्ञों ने कहा है कि यह पश्चिमी देशों के लिए भी एक मॉडल का काम कर सकता है।

डेटा पर बड़ी टेक कंपनियों का नियंत्रण आज सारी दुनिया की समस्या है। इससे जहां आम नागरिकों की निजता के लिए खतरा पैदा हुआ है, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा और कारोबारी प्रतिस्पर्धा के समान धरातल के लिए भी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ये बात उल्लेखनीय है कि अपनी व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित लोकतंत्र बताने वाले पश्चिमी देश अब तक डेटा प्रोटेक्शन और कंपनियों पर लगाम के लिए कारगर नियम लागू करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं कर पाए हैं। जबकि चीन ने इस मामले में एक महत्त्वपूर्ण पहल की है।

आर्थिक गैर-बराबरी पश्चिम और तमाम पूंजीवादी देशों में भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। इसकी वजह से इन देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं में आम इंसान की भूमिका संकुचित होती जा रही है। ये आम शिकायत है कि धन के संकेद्रन के साथ लगातार मजबूत हो रहे तबके व्यवस्था पर अपना पूरा शिकंजा जमाते जा रहे हैं। लेकिन पश्चिमी देश इसे नियंत्रित करने की कोशिश तो दूर, ऐसी इच्छाशक्ति दिखाने में भी अब तक नाकाम रहे हैं। जबकि चीन में इस समय जो प्रयोग हो रहा है, उनके बारे में खुद पश्चिमी मीडिया में अब कहा जाने लगा है कि शी जिनपिंग ने समाजवादी चीन बनाने की दिशा में जो वामपंथी बदलाव किए हैं, वे वास्तविक हैं। यानी चीन में सचमुच कुछ बदल रहा है।

इस अंतर को इसी रूप में समझा गया है कि चीन में अर्थव्यवस्था राजनीति (कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी सरकार) से निर्देशित होती है, जबकि पश्चिम में हालात ऐसे बन गए हैं, जिसमें अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले वर्ग ने राजनीति को अपने नियंत्रण में ले लिया है। इसलिए वहां की सरकारें ऐसी पहल करने में फिलहाल अक्षम हो गई हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था के ढांचे में ऐसा कोई बड़ा बदलाव आए, जिससे पूंजीपति और धनवान लोगों के हित पर चोट पहुंचेगी।

चीन में चूंकि सत्ता वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है, इसलिए वह अपनी सोच के मुताबिक अर्थव्यवस्था और पूरे समाज को ढालने में सक्षम बनी हुई है। 1949 में पार्टी ने पीपुल्स रिपब्लिक की स्थापना के साथ अधिकतम समता की नीति अपनाई। 1981 के बाद उसने समाज में धन पैदा करने को प्राथमिकता दी। इस कोशिश में उसने वर्गीय और क्षेत्रीय विषमता को बढ़ने देने का जोखिम उठाया। अब वह उनके अवांछित परिणामों को नियंत्रित करते करते हुए socialism with Chinese characteristics में एक नया प्रयोग कर रही है। इसी प्रयोग को common prosperity का नाम दिया गया है।

समाजवाद की चर्चा आते ही जिस सामाजिक मूल्य पर सर्वाधिक प्रमुखता से ध्यान केंद्रित होता है, वह बेशक वह समता ही है। 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति होने के बाद से लेकर दुनिया के जिन देशों में समाजवादी व्यवस्थाएं कायम हुईं, वहां सबसे ज्यादा जोर इसी मूल्य को यथार्थ बनाने पर रहा। सोवियत खेमे के देशों से लेकर आरंभ में चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम, क्यूबा आदि सब अपने सिस्टम को इसी तर्क से बेहतर बताते रहे कि उनके यहां अधिक समता है। हालांकि इस बीच कम्युनिस्ट देशों में पूंजीवाद की तरफ जाने की प्रवृत्तियां भी उभरती रहीं, लेकिन हमेशा ही उसे आलोचना की नजर से देखा गया। इसे उन व्यवस्थाओं का भटकाव समझा गया।

खुद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने 1950-60 के दशक में ऐसे भटकाव को संशोधनवाद कह कर ऐसी दिशा में जाने वाली पार्टियों या सरकारों की समाजवादी वैधता पर सवाल खड़े किए थे। इससे कम्युनिस्ट विमर्श में एक नया शब्द जुड़ा था। लेकिन उसी चीनी पार्टी से दशकों से जुड़े रहे नेता देंग श्याओ पिंग ने 1978 के बाद सैद्धांतिक तर्क के साथ अपने देश में निजी पूंजी, निजी उद्यम, और मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने की शुरुआत की। इस तरह market socialism कम्युनिस्ट विमर्श में नया शब्द जुड़ा।

देंग के समर्थकों की आज भी यह दलील है कि 1929 में सोवियत संघ और 1949 में चीन में जो पूर्णतः राज्य नियंत्रित व्यवस्था अपनाई गई, वो उन्नत जीवन स्तर की कार्ल मार्क्स की समझ के अनुरूप नहीं थीं। इसके विपरीत वह निम्न जीवन स्तर का समान बंटवारा थी। इसलिए चीन ने तीव्र गति से आर्थिक विकास की राह पकड़ी। अब उसके आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दुष्परिणामों को दूर करने के लिए साझा समृद्धि का विचार सामने लाया गया है।
अर्थशास्त्री ब्रैंको मिलानोविच ने चीन में हो रहे वर्तमान प्रयोग को ‘लंबी अवधि की नई आर्थिक नीति’कहा है। सोवियत संघ में नई आर्थिक नीति के प्रणेता व्लादीमीर लेनिन थे। उस नीति के तहत किसानों को जमीन का मालिक बनाया गया था। यानी राज्य नियंत्रण के साथ-साथ निजी पूंजी की जरूरत को स्वीकार करते हुए एक मिश्रित व्यवस्था अपनाई गई थी।

जोसेफ स्टालिन भी अपने शासनकाल के शुरुआती वर्षों में इस नीति के समर्थक थे। बल्कि उन्होंने इस नीति के आलोचकों को ‘अधपका मार्क्सवादी’बताया था। लेकिन कहा जाता है कि 1929 के बाद नाजी जर्मनी और अन्य पूंजीवादी देशों की तरफ से हमले के बढ़ते खतरे के बीच उन्होंने पूर्ण राजकीय नियंत्रण वाली व्यवस्था अपना ली, ताकि तेज गति से सोवियत संघ को बड़ी सैन्य शक्ति बनाया जा सके।

ये बातें आज चीन में जो प्रयोग हो रहे हैं, उसके मद्देनजर प्रासंगिक हैं। ये बात बेहिचक कही जा सकती है कि समाजवाद का कोई एक ऐसा मॉडल आज तक सामने नहीं आया है, जिसे सारी दुनिया में उसी रूप में अपनाया जाए। असल अनुभव यह है कि यह देश और समय के तकाजों के बीच लगातार विकसित होने वाली एक अवधारणा है, जिसके मॉडल को परखने की एकमात्र कसौटी संभवतः यह है कि उस व्यवस्था के केंद्र में आम जन हैं या नहीं।

देंग के दौर में अपनाई गई नीतियों से ये बहस खड़ी हुई थी कि क्या अब भी चीन की नीतियों के केंद्र में आम जन हैं? लेकिन गरीबी खत्म करने के मोर्चे पर वहां मिली सफलता, तीन दशकों से सभी तबकों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार, और अर्थव्यवस्था की दिशा एवं प्राथमिकताओं पर सरकार के नियंत्रण ने अब इस बारे में एक ठोस एवं स्पष्ट समझ पेश की है। इसीलिए साझा समृद्धि के विचार में अब दुनिया भर में दिलचस्पी पैदा हुई है। ये दिलचस्पी खास कर उन लोगों में अधिक है, जो समाजवाद के आदर्श में यकीन करते हैं और इसके दुनिया में अब तक हुए प्रयोगों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। आने वाले समय में common prosperity का लक्ष्य कितना और किस रूप में चीन में हासिल होता है, इसे देखने में ऐसे तमाम लोगों की रुचि रहेगी। इस प्रयोग के बाद चीन एक कैसे समाज के रूप में उभरता है, लोग उसे देखना चाहेंगे।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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