बीच बहस

हाहाकार के बीच दिल्ली के सांसदों ने अपने क्षेत्र से ‘सामाजिक दूरी’ बना रखी है!

देश के तमाम हिस्सों की तरह देश की राजधानी दिल्ली में भी कोरोना के कहर से हाहाकार मचा हुआ है। टेस्ट कराने वाला हर तीसरा आदमी कोरोना वायरस से संक्रमित निकल रहा है। देश के दूसरे किसी भी राज्य के मुकाबले संक्रमण की दर और मरने वालों की संख्या भी दिल्ली में ज्यादा है। दो करोड़ की आबादी वाले इस महानगर और केंद्र शासित राज्य में रोजाना 23 से 30 हजार तक संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं और 200 से 350 तक लोगों की मौत हो रही है। संक्रमित लोग अस्पताल में जगह पाने के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। ऑक्सीजन के अभाव में कई अस्पतालों से मरीजों के मरने की खबरें आ रही हैं। 

दिल्ली में कोरोना महामारी से मची तबाही का मंजर श्मशान घाटों पर लगातार देखने को मिल रहा है। स्थिति यह है कि लोगों को अपने परिजनों के शवों का दाह संस्कार करने के लिए श्मशान घाटों पर कतार में खड़े होकर 20-20 घंटे तक का इंतजार करना पड़ रहा है। नौबत यहां तक आ पहुंची है कि द्वारका सेक्टर-29 में बन रहे राज्य के पहले कुत्तों के श्मशान घाट का इस्तेमाल लोगों के अंतिम संस्कार के लिए करने का निर्णय लिया गया है।

इस पूरे सूरत-ए-हाल के लिए लगभग सभी टीवी चैनल और अखबार दिल्ली सरकार और उसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैलाने और किसी का भी चरित्र हनन के लिए कुख्यात भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल और उसकी ट्रोल आर्मी ने भी दिल्ली सरकार, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है।

भाजपा का आईटी सेल जो कर रहा है, उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, क्योंकि वह वही काम कर रहा है, जो उसे करना चाहिए, लेकिन टीवी चैनल और अखबार जिस शातिराना अंदाज में सिर्फ दिल्ली सरकार को निशाना बना रहे हैं, वह हैरान करने वाला है।

यह सच है कि दिल्ली में भारी-भरकम बहुमत से निर्वाचित आम आदमी पार्टी की सरकार है, इस नाते वह दिल्ली के मौजूदा हालात को लेकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकती, लेकिन यह भी सच है कि वह लगभग नख-दंत विहीन सरकार है। पिछले महीने संसद में केंद्र सरकार ने कानून बनाकर दिल्ली की चुनी हुई सरकार से सारे अधिकार छीन कर वास्तविक अर्थों में दिल्ली के उप राज्यपाल यानी एक रिटायर नौकरशाह को ‘दिल्ली सरकार’ बना दिया है, जो सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है।

लगातार दो बार मात खा चुके केंद्र सरकार के नेतृत्व की इस अलोकतांत्रिक कारगुजारी के बावजूद दिल्ली सरकार तो फिर भी कुछ न कुछ करती दिख रही है, लेकिन उप राज्यपाल के जरिए दिल्ली की सत्ता के वास्तविक सूत्र अपने हाथों में रखने वाला केंद्रीय गृह मंत्रालय क्या कर रहा है, किसी को नहीं मालूम। और तो और ऐसी भीषण संकटकालीन स्थिति में दिल्ली के निर्वाचित सातों सांसदों का भी कोई अता-पता नहीं है। दिल्ली की जनता को नहीं मालूम कि वे कहां हैं और क्या कर हैं?

दिल्ली के एक सांसद मनोज तिवारी हैं, जो दिल्ली में रह रहे पूर्वांचलियों के नेता माने जाते हैं। वे प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रहे हैं। मौजूदा समय में मुख्यमंत्री की अपील के बावजूद प्रवासी मजदूरों का पलायन नहीं रुक रहा है। ज्यादातर प्रवासी मजदूर पूर्वांचल के ही हैं, इसलिए मनोज तिवारी उन्हें समझाने और भरोसा दिलाने का काम प्रभावी तरीके से कर सकते थे, लेकिन पूरे कोरोना काल में वे लोगों के बीच नहीं दिखे और इस बार लॉकडाउन लागू होने और आपात स्थिति बनने के बाद भी उनका अता-पता नहीं है।

अलबत्ता दो सप्ताह पहले तक वे पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान हाथ रिक्शा खींचने की नौटंकी करते जरूर दिखे थे। इसके अलावा टेलीविजन पर दो शो में भी वे दिखाई दे रहे हैं। एक में अपराध कथा से जुड़े धारावाहिक में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं और दूसरे संगीत के एक कार्यक्रम में जज की भूमिका में दिख रहे है। दोनों कार्यक्रम उनके धंधे से जुड़े हैं, लेकिन सोचने वाली बात है कि जिस समय पूरी दिल्ली महामारी की चपेट में है, उस समय उसके एक सांसद का चेहरा टेलीविजन पर धारावाहिक और रियलिटी शो में दिखाई दे तो इससे ज्यादा अश्लील क्या हो सकता है?

एक दूसरे सांसद हैं पूर्वी दिल्ली से निर्वाचित गौतम गंभीर, जो इन दिनों अपने क्षेत्र और राज्य की जनता को छोड़ कर क्रिकेट के आईपीएल तमाशे में व्यस्त हैं। वे आईपीएल मैचों में विशेषज्ञ बन कर टिप्पणी करते दिख रहे हैं। गौतम गंभीर का भी यह काम उनके पेशे से जुड़ा हैं। ऐसे ही तीसरे सांसद हैं हंसराज हंस, जो उत्तर-पश्चिमी दिल्ली से निर्वाचित हैं। वे हालांकि अपनी किसी व्यावसायिक गतिविधि में सक्रिय नहीं दिखे हैं, लेकिन अपने क्षेत्र और प्रदेश की जनता के बीच भी नहीं दिख रहे हैं।

हालांकि ऐसा नही है कि फिल्मी कलाकार से सांसद बने मनोज तिवारी, क्रिकेटर से सांसद बने गौतम गंभीर और गायक कलाकार हंसराज हंस ही अपने क्षेत्र से नदारद है, जो अन्य सांसद मूलत: राजनीतिक कार्यकर्ता या राजनीतिक परिवार से हैं, वे भी अपने निर्वाचन क्षेत्र के पीड़ित लोगों की मदद के लिए सामने नहीं आ रहे हैं। ऐसे सांसदों में पश्चिमी दिल्ली से निर्वाचित और पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे परवेश वर्मा भी हैं, जो पिछले साल दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता कानून के खिलाफ ऐतिहासिक धरने पर बैठी महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां करने और दिल्ली में सांप्रदायिक दंगा भड़काने वालों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे।

इसके अलावा नई दिल्ली से निर्वाचित मीनाक्षी लेखी और दक्षिण दिल्ली से निर्वाचित रमेश विधूड़ी भी जनता के बीच से पूरी तरह नदारद हैं। अलबत्ता मीनाक्षी लेखी लंबे समय बाद शुक्रवार को टीवी चैनलों पर जरूर प्रकट हुईं, यह मांग करने के लिए कि अरविंद केजरीवाल सरकार को बर्खास्त कर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए।

बहरहाल ये सभी सांसद अपने क्षेत्र के लोगों को फोन पर भी उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। यानी सभी सांसदों ने कोरोना संक्रमण के चलते अपने क्षेत्र की जनता से भी ‘सामाजिक दूरी’ बना रखी है। चांदनी चौक क्षेत्र के सांसद डॉ. हर्षवर्धन चूंकि केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं, इस नाते वे जरूर कभी-कभार टीवी चैनलों पर अपनी सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालते हुए, प्रधानमंत्री मोदी का स्तुतिगान करते हुए या उल-जुलूल दावे करते हुए दिख जाते हैं, लेकिन अपने क्षेत्र की जनता से वे भी ‘सामाजिक दूरी’ बनाए हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने भी इन सभी सांसदों से इस बारे में चर्चा करने के लिए संपर्क करने की कोशिश की लेकिन किसी से संपर्क नहीं हो सका।

हालत यह है कि दिल्ली के आम लोग ही नहीं, बल्कि भाजपा के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी जरूरी मदद के लिए युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी और आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडेय से मदद की गुहार लगा रहे हैं। ये दोनों नेता उनकी भी मदद कर रहे हैं, लेकिन मीडिया में इस बात का भी कहीं जिक्र नहीं हो रहा है। पिछले सप्ताह ही दिल्ली के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के बेटे और भाजपा के वरिष्ठ नेता हरीश खुराना ने युवक कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास को उनके ट्विटर हैंडल ‘श्रीनिवासआईवाईसी’ पर टैग करके एक मरीज के लिए मदद मांगी और चार घंटे के भीतर श्रीनिवास ने मदद उपलब्ध कराई।

यह सोशल मीडिया का जमाना है और कहीं भी कोई नेता, अभिनेता, कारोबारी या कोई आम आदमी किसी की मदद करता है तो वह सोशल मीडिया में तुरंत चर्चा में आ जाता है, लेकिन सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर भी दिल्ली के सातों लोकसभा सदस्य नहीं दिखाई दे रहे हैं। इन सांसदों की जिम्मेदारी को लेकर कोई टीवी चैनल या अखबार सवाल नहीं उठा रहा है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on May 1, 2021 1:38 pm

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