Wednesday, December 1, 2021

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‘हूल दिवस’ पर विशेष: आज झारखंड में जरूरत है एक और हूल की!

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भले ही ‘हूल दिवस’ (संताल दिवस) को बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक स्तर पर याद किया जाता हो, लेकिन झारखंड के आम आदिवासी हूल दिवस के औपचारिक ज्ञान से भी दूर हैं। मैंने लगभग 50 आम आदिवासियों से यह जानने की कोशिश की कि वे हूल दिवस के बारे में क्या और कितना जानते हैं? जिसमें मात्र तीन-चार लोगों को ही हूल दिवस के बारे में कुछ-कुछ जानकारी थी, पूरी जानकारी किसी को भी नहीं थी। जबकि आज भी जरूरत है एक और हूल की। लेकिन सवाल है कैसे? जब आम आदिवासी जानते ही नहीं अपने नायकों को।

अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह की जब चर्चा होती है, तो विद्रोह की पहली लड़ाई 1769 में झारखंड के रघुनाथ महतो के नेतृत्व में ‘चुहाड़ विद्रोह’ से शुरू हुआ। विद्रोह, 1771 में तिलका मांझी का ‘हूल’ से सफर तय करता हुआ, 1820-21 का पोटो हो के नेतृत्व में ‘हो विद्रोह’, 1831-32 में बुधु भगत, जोआ भगत और मदारा महतो के नेतृत्व में ‘कोल विद्रोह’, 1855 में सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में ‘संताल विद्रोह’ और 1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ ने अंग्रजों की नींद उड़ा दी थी।

इन विद्रोहों में जून का महीना झारखंड के लिए विशेष महत्व इसलिए रखता है क्योंकि इसी महीने के 30 जून को ‘संताल विद्रोह’ व ”हूल दिवस” के रूप में याद किया जाता है। जबकि 9 तारीख को पूरा झारखंड बिरसा मुंडा की शहादत को याद करता है। क्योंकि अंग्रेजों ने ‘उलगुलान’ के नायक बिरसा मुंडा को धीमा जहर देकर जेल में ही मार दिया था। तब उनकी उम्र केवल 25 वर्ष की थी। वहीं 30 जून 1855 को सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में अंग्रेजों और महाजनों के खिलाफ हूल (विद्रोह) हुआ था, जिसमें करीब 20 हजार लोग मारे गए थे।

वहीं ‘चुहाड़ विद्रोह’ के नायक रघुनाथ महतो का जन्म 21मार्च, 1738 को तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल (मानभूम) जिला अंतर्गत नीमडीह प्रखंड के एक छोटे से गांव घुंटियाडीह में हुआ था।

बता दें कि 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंगल, जमीन के बचाव एवं नाना प्रकार के शोषण से मुक्ति के लिए विद्रोह किया, जिसे चुहाड़ विद्रोह कहा गया। यह विद्रोह छोटानागपुर के जंगलमहल (मानभूम) के क्षेत्र में 1769 से 1805 तक चला।

यह बताना लजिमी होगा कि वर्तमान सरायकेला खरसावां जिले का चांडिल इलाके के अंतर्गत नीमडीह प्रखंड में स्थित रघुनाथ महतो का गाव घुंटियाडीह आज भी है, लेकिन रघुनाथ महतो के वंशज का कोई पता नहीं है। शायद रघुनाथ महतो पर जितना काम होना चाहिए था, नहीं हो पाया है।

जबकि 1750 में जन्मे तिलका मांझी ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध 1771 से 1784 तक लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा।

बताते चलें कि दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है, और भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में विद्रोही होने का श्रेय तिलका मांझी को जाता है, जिसने तत्कालीन राजमहल क्षेत्र के जंगल व पहाड़ों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। सबसे दुखद यह है कि तिलका मांझी के वंशज का भी आज कोई अता-पता नहीं है। जबकि तिलका मांझी के नाम पर बिहार के भागलपुर में ‘तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय भागलपुर’ है। जबकि सिद्धू-कान्हू और बिरसा मुंडा के वंशज की जानकारी है।

वहीं ‘हो विद्रोह’ के नायक पोटो हो और ‘कोल विद्रोह’ के बुधु भगत के वंशज का भी पता नहीं है। बुधु भगत के वंशज का पता इसलिए नहीं है क्योंकि इनके परिवार के 100 लोगों की हत्या अंग्रेजी हुकूमत ने कर दी थी।

उल्लेखनीय है कि 30 जून, 1855 को संताल आदिवासियों ने सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो के नेतृत्व में साहेबगंज जिले के भोगनाडीह में 400 गांव के 40,000 आदिवासियों ने अंग्रेजों को मालगुजारी देने से साफ इंकार कर दिया था। इस दौरान सिद्धू ने कहा था- अब समय आ गया है फिरंगियों को खदेड़ने का। इसके लिए “करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो” का नारा दिया गया था। अंग्रेजों ने तुरंत इन चार भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया। गिरफ्तार करने आये दारोगा की संताल आंदोलनकारियों ने गर्दन काटकर हत्या कर दी। इसके बाद संताल परगना के सरकारी अधिकारियों में आतंक छा गया।

बताया जाता है जब कभी भी आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और उनके जल, जंगल, जमीन को विघटित करने का प्रयास किया गया है, प्रतिरोध की चिंगारी भड़क उठी। 30 जून, 1855 का संताल विद्रोह इसी कड़ी का एक हिस्सा है। महाजनों, जमींदारों और अंग्रेजी शासन द्वारा जब आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया गया तब उनके खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा इतना परवान चढ़ा कि इस लड़ाई में सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव और उनकी बहन फूलो, झानो सहित लगभग 20 हज़ार संतालों ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। इसके पूर्व गोड्डा सब-डिवीजन के सुंदर पहाड़ी प्रखंड की बारीखटंगा गांव का बाजला नामक संताल युवक की विद्रोह के आरोप में अंग्रेजी शासन द्वारा हत्या कर दी गई थी। अंग्रेज इतिहासकार विलियम विल्सन हंटर ने अपनी किताब ‘द एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है कि अंग्रेज का कोई भी सिपाही ऐसा नहीं था जो आदिवासियों के इस बलिदान को लेकर शर्मिंदा न हुआ हो।

कहा जाता है कि अपने ही कुछ विश्वस्त साथियों ने विश्वासघात किया और सिद्धू और कान्हू को पकड़वाया। तब अंग्रेजी हुकूमत ने सिद्धू और कान्हू को भोगनाडीह गांव में सबके सामने एक पेड़ पर टांगकर फांसी दे दी।

भले ही ”हूल दिवस” (संताल दिवस) को सरकारी या कुछ सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा एक औपचारिकता के तौर पर याद किया हो, लेकिन झारखंड के आम आदिवासी के बीच यह हूल दिवस औपचारिकता से भी दूर है।

यह सामने तब आया जब मैंने यह जानने के लिए कि संथाल समाज के लोग अपने नायकों को कितना जानते हैं? के लिए बोकारो जिले के संतालों के एक गांव, जो बोकारो शहर से मात्र 15 किमी की दूरी पर अवस्थित है, जैना बस्ती में रहने वाले लोबेसर मांझी से सवाल किया कि हूल दिवस के बारे में आप क्या जानते हैं? तो उन्होंने पहले कहा कि बिरसा मुंडा को इस दिन याद किया जाता है। फिर जब मैंने पूछा- सिद्धू-कान्हू को जानते हैं? तो उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा नहीं, सिद्धू-कान्हू को याद किया जाता है। लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि किस महीने और किस तारीख को हूल दिवस मनाया जाता है। लोबेसर मांझी की उम्र 52 साल है।

इसी गांव के मनोज हेम्ब्रम 35 वर्ष, जो कि इतिहास से स्नातक भी हैं, से यही सवाल किया तो उन्होंने साफ कहा कि इस बारे में वे बहुत कुछ नहीं जानते हैं। वे इतना बता पाए कि भोगनाडीह के सिद्धू-कान्हू शहीद हुए थे। किस महीने में और किस तारीख को यह घटना घटी? यह जानकारी भी मनोज को नहीं है। वहीं स्नातक कर चुके 37 वर्षीय उपेन्द्र हेम्ब्रम को ‘हूल दिवस’ के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है।

जैना बस्ती निवासी बिसेसर मांझी जो क्षेत्र में सोखा के नाम से चर्चित हैं। सोखा मतलब ओझा, यानी भूत-प्रेत की बाधा दूर करने वाला तांत्रिक। सोखा के यहां दूर-दराज के आदिवासी ही नहीं कई गैर आदिवासी भी अपनी समस्या लेकर आते हैं। इनकी जीविका सोखागिरी से ही चलती है। सोखा को न तो ‘हूल दिवस’ के बारे में कोई जानकारी है न ही वह सिद्धू-कान्हू के बारे में कुछ जानते हैं।

जबकि दुमका जिले के रहने वाले महेश सोरेन जो डिप्लोमा करके रांची जिले के बुंडू प्रखंड में अनुबंध पर जूनियर इंजीनियर हैं। उन्हें हूल दिवस की कुछ-कुछ जानकारी है। उन्होंने मेरे सवालों का बहुत कुछ सही जवाब दिया। दूसरी तरफ गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड के खटोरी पंचायत के धरारी गांव के किशोर मुर्मू जिन्होंने मास्टर ऑफ रूरल डेवलपमेंट की शिक्षा ले रखी है। वे एक सामाजिक संस्था जन विज्ञान समिति के कार्यकारिणी सदस्य भी हैं। उन्हें इतनी ही जानकारी है कि सिद्धू-कान्हू वगैरह ने महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया था। उन्होंने घटना में अंग्रेजों का जिक्र नहीं किया, लेकिन उन्हें तारीख और महीना की जानकारी है।

इस तरह मैंने लगभग 50 आम आदिवासियों से यह जानने की कोशिश की कि वे हूल दिवस के बारे में क्या और कितना जानते हैं? जिसमें मात्र तीन-चार लोगों को ही हूल दिवस के बारे में कुछ-कुछ जानकारी थी, पूरी जानकारी किसी को भी नहीं थी। कहना ना होगा कि राज्य के आदिवासी समुदाय का आम आदिवासी अपने नायकों से पूर्ण परिचित नहीं है तो इसकी कई वजहों में एक वजह अशिक्षा है।

अंग्रेजों के खिलाफ झारखंड के नायकों द्वारा जो लड़ाई छेड़ी गई थी, वह अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के साथ-साथ जल—जंगल-ज़मीन की लड़ाई थी। यह मात्र एक विद्रोह नहीं बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था। इन नायकों ने सूदखोर-महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया, ये महाजन गांवों के दलितों, आदिवासियों व अन्य सामाजिक व आर्थिक स्तर से पिछड़ों को कर्ज़ देते बदले में उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे। जो आज भी अपने बदले हुए रूप में झारखंड में मौजूद है। इनके इस विद्रोह में समाज का वह हर तबका किसी न किसी रूप में शामिल रहा, जो अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था से प्रभावित था। लेकिन आज नेतृत्वहीनता के आभाव में झारखंड का आदिवासी समाज शोषण के बदले हुए रूप को झेलने को मजबूर है।

बता दें कि अलग राज्य गठन के 20 वर्षों में झारखंड, 11 मुख्यमंत्रियों सहित तीन बार राष्ट्रपति शासन को झेला है, जो शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी राज्य की यह पहली घटना है। मजे की बात तो यह है कि इन 11 मुख्यमंत्रियों में रघुबर दास को छोड़कर दस मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय के रहे हैं, बावजूद इसके राज्य के आम आदिवासियों के जीवन से जुड़े, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ पा रहा है। कहना ना होगा कि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा केवल भाषणों और किताबों तक सिमट कर रह गयी है।

कारण साफ है, जिन्हें भी सत्ता मिली, वे केवल अपनी कुर्सी बचाने के ही फिराक में लगे रहे। उनमें झारखंड के विकास के प्रति संवेदना का घोर अभाव रहा। इनमें सत्ता लोलुपता की पिपासा इतनी रही कि वे भूल गये कि राज्य को इनके किस कदम से नुकसान होगा, किस कदम से फायदा, इसका इन्हें जरा भी एहसास नहीं रहा।

बताना जरूरी होगा कि राज्य गठन के बाद 2010 में राजनीति ने ऐसी करवट ली कि विरोधाभाषी चरित्र के बावजूद झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा में 28-28 माह के सत्ता हस्तांतरण के समझौते के बाद अर्जुन मुंडा को 11 सितंबर 2010 को झामुमो के समर्थन से मुख्यमंत्री बनाया गया। परन्तु यह समझौता बीच में इसलिए टूट गया कि भाजपा, झामुमो को सत्ता सौंपने को तैयार नहीं हुई। अत: 18 जनवरी 2013 को झामुमो ने अपना समर्थन वापस ले लिया और अल्पमत में आने के बाद अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा दे दिया। काफी जोड़ घटाव के बाद जब किसी की सरकार नहीं बनी, तो 18 जनवरी, 2013 को राष्ट्रपति शासन लागू हुआ जो 12 जुलाई 2013 तक रहा। क्योंकि कांग्रेस के समर्थन पर हेमंत सोरेन 13 जुलाई, 2013 को मुख्यमंत्री बनाए गए, जिनका कार्यकाल 23 दिसंबर 2014 तक रहा।

दिसंबर 2014 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के चुनाव जीत कर आए आठ विधायकों में से छ: विधायकों को तोड़ कर अपनी ओर मिला लिया और सरकार बना ली। रघुवर दास ने 10वें मुख्यमंत्री के रूप में 28 दिसंबर 2014 शपथ ली, जो राज्य के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बने, जो दिसंबर 2019 के चुनाव में अपनी भी सीट नहीं बचा पाए और 29 दिसंबर 2019 को हेमंत सोरेन की गठबंधन की सरकार बनी। आज बाबूलाल मरांडी भाजपा का पल्लू थामकर भाजपा विधायक दल के नेता बने हुए हैं।                             

आजादी के 74 वर्षों बाद भी झारखंड के आदिवासियों के विकास में कोई बेहतर प्रयास नहीं किये गये। उल्टा नक्सल—उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों को उनके जंगल—जमीन से बेदखल करने का प्रयास होता रहा है। आए दिन उनकी हत्यायें हो रहीं हैं। विकास के नाम पर कारपोरेट घरानों का झारखंड पर कब्जे की तैयारी चल रही है। मजे की बात तो यह है कि जिन लोगों ने सत्ता की इस मंशा का पर्दाफाश करने की कोशिश की उन्हें माओवादी करार देकर उन पर फर्जी मुकदमे लाद दिए गए। तो दूसरी तरफ जिस अवधारणा के तहत झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ वह हाशिए पर पड़ा है। 

बिरसा मुंडा की तीर चलाती तस्वीर।

झारखंड अलग राज्य गठन के 20 वर्षों की काली तस्वीर इस कोरोना काल में सामने आ गई। झारखंड से दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी के लिए पलायन किए मजदूरों की संख्या चौंकाने वाली साबित हुई है। सरकारी आंकड़े ही इन मजदूरों की संख्या ग्यारह लाख से ऊपर बताते हैं, जबकि लाख से अधिक मजदूर अपने बूते जो वापस लौटे हैं उनका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। दूसरी तरफ उन लड़कियों और महिलाओं की संख्या शामिल नहीं है जो विभिन्न महानगरों में घरेलू कार्यों के लिए पलायन की हुई हैं। इसके साथ ही ईंट भट्ठों और मौसमी पलायन करने वाले श्रमिकों की संख्या भी शामिल नहीं है, जो लाख पार है। आज भी राजधानी रांची सहित अधिकांश शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों से रोजाना काम की तलाश में हजारों मजदूर चौक चौराहों पर पहुंचते हैं।

बता दें कि 29 जून, 2020 को हेमंत सरकार ने भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा-41, 42 एवं 76 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड राज्य में वनोपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए वर्ष 2004 में अधिसूचित झारखंड काष्ठ एवं वन उत्पाद (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2004 को निरस्त करते हुए वनोपज के अभिवहन के विनियमन करने के लिए झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2020 की स्वीकृति दी गई। जिसे अमरेंद्र प्रताप सिंह, प्रधान सचिव, झारखंड सरकार ने 29 जून 2020 को राज्यपाल, झारखंड सरकार के ‘आदेशानुसार’ का हवाला देकर लागू कर दिया। जिसके तहत अब आदिवासियों को जंगलों से जलावन समेत अन्य वनोपज लाने का भी टैक्स देना पड़ेगा।

इस अधिसूचना के बाद जहां एक तरफ चाटुकार मीडिया ने सरकार की इस अधिसूचना की तारीफ के पुल बांधी, वहीं कइयों ने सरकार की जमकर खिंचाई की और खुलकर लिखा कि जंगल के मालिक आदिवासियों से टैक्स लेना उन्हें जंगल से बेदखल करने का पहला कदम है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे वन अधिकार अधिनियम 2006 की अवमानना बताया। इसे लेकर राज्य सरकार पर कई सवाल खड़े किये गये।

इसके बाद 10 जुलाई, 2020 को अमरेन्द्र प्रताप सिंह प्रधान सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने एक प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में संशय दूर करने का मुख्यमंत्री से मिले निर्देश के बाद राज्य सरकार झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में कुछ बदलाव करेगी तथा ग्रामीणों को जलावन लकड़ी अथवा अन्य निजी कार्य हेतु उपयोग की गई लकड़ी पर कोई अनुज्ञा पत्र नहीं देना होगा और न ही किसी तरह का शुल्क लगेगा।

इसके बावजूद यह बताना जरूरी होगा कि विभागीय अफसरों से साठगाँठ कर वन माफिया अरबों रुपये की इमारती लकड़ियों का अवैध कारोबार करते हैं, पर सरकार को उसका चौथाई हिस्सा भी राजस्व नहीं मिलता है। राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार ने बालू, कोयला, खनिज, वनोपज आदि सब पर टैक्स लगा दिया है। परंतु इसका फायदा सरकार कम और माफिया ज्यादा उठा रहे हैं। गरीब आदिवासी जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं, पर सरकार एक-एक करके झारखंडियों से सारे अधिकार छीनती जा रही है।

ऐसे कानून आदिवासियों को जंगलों से दूर रखने की साज़िश हैं, ताकि जंगल माफिया और भ्रष्ट सरकारी अफसर दोनों मिलकर वन संसाधनों को लूट सकें।

ऐसे में जरुरत है अब एक और उलगुलान और हूल की। लेकिन सवाल यह है कि जब राज्य का आम आदिवासी ही अपने नायकों को बेहतर से नहीं जानते, तो फिर एक और हूल या उलगुलान की संभावना बनेगी कैसे?

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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